Friday, 22 August 2014

आज अजय ५८ वर्ष के हो गये ,कल ही तो कान्हा का जन्मोत्सव मनाया था और आज अजय का। क्या हुआ वो मेरे पास नहीं हैं तो ,कान्हा भी तो मेरे मन में ही हैं न। तुम हो हमारे साथ अजय ;आज भी कल भी हमेशा , मन के झरोंखों से झांकते ,हर सुख में खिलखिलाते हर दुःख में गले लगाते ,देख तो पाते हो तुम हमें ऊपर से ,बस हम ही ढूंढते रह जाते है तुम्हें , श्रधान्जली अजय ,जन्मदिन की बधाई ,तुम तो कान्हा के पास चले गये मेरी भी अर्जी आई है उसे भी देख लेना ---
( हर क्षण सपना ;सपने में बस तुम )
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सपनों के उपवन में जब भी तुमसे मिलती हूँ ,
किसलय के अधरों की आभा सी बन खिलती हूँ .
सपनो के मनहर झुरमुट ,सघन वन ये मानस मेरा,
यादों के ढहते पर्वत , नयनों से झरते झरने।
मैं जीवन से हार रही या मन निर्मल होना चाहे ,
आत्म हवन अविरल अकम्पित ,
श्रृंगार शून्य तन ,दुःख व्रती मन।
पर ,नहीं हारती ;सूने पथ की राही हूँ ,
मैं रोती नहीं !वारती -मानस मोती हूँ।
जब उपवन में दिख जाता है कोई काँटा ,
दुःख दर्द विरह की कसक और बढ़ जाती है ,
चुपके से आकर, कानों में कुछ कह जाते तुम !
अपने प्रांतर में कांटे ही क्यूँ देखूं मैं ?
हर डाली मैं मुस्कान तुम्हारी आली है
हर क्यारी में पद- चिन्ह तुम्हारे दिखते हैं
शीतल शबनम की बूंदें प्यास जगाती हैं .
सवप्न सरित की लचकीली लहरों
 से
मन प्रांगण का उपवन सिंचित हो जाता है
शांत किन्तु गंभीर वह नि:स्वन तेरा ,
भ्रमरों सा गुंजित होता है मन में मेरे ,
बन कली हवा में झूम-झपक इठलाती मैं
तितली सी खिलती औ पंछी सी गाती हूँ।
जो पौध कीचकों की रोपी थी- संग तेरे ,
बंसी की धुन सी बजती है अब उपवन में
अनियंत्रित भावों से हृदय निनादित होता है ,
सपनों के उपवन में मैं जब तुमसे मिलती हूँ।
दृग युगल सींचते हैं मेरी इस बगिया को
अवसादों के पारिजात गलीचा बुनते हैं
मधुर समीर मह- मह महका देता आंगन
वेदना विदग्ध सपनों को बहलाती हूँ।
मेरा प्रेम नहीं सम्मोहन की हाला
ये प्रेम नहीं विरह -कटु -रस का प्याला
मैं चढके नभ की ऊँची चोटी पर ,
व्यथित चित्त को बोध युक्त कर पाती हूँ
मैने आतप हो जान लिया
विरहा में जल ज्ञान लिया
तन -मन का वह पावन नाता
वह अंतिम सच पहचान लिया
मैने आहुती बन कर देखा
यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है
मिलने के पल दो चार यहाँ
तप यज्ञ कल्प तक चलता ह
सपनों के उपवन में मैं ;जब भी तुमसे मिलती हूँ
हर किसलय के अधरों की आभा सी बन कर खिलती हूँ। ------आभा --

Wednesday, 13 August 2014

                     {(पड़ोसन)}
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***एक बेहद जरुरी ,व्यर्थ सी चर्चा | पड़ोसन; पती की भाभीजी -पत्नीकी मुंहबोली बहन ( कभी छोटी, कभी बड़ी ) | पड़ोसन ; गोलगप्पे के   खट्टे -मीठे पानी के चटकारे सी कभी तीखी ,कभी मीठी महसूस होती हुई |पड़ोसन ;जो घर की बगिया से  बेधडक हरी सब्जी तोड़ले और आपके पती भी इस कार्य में उसका योगदान दे के अपने के खुशनसीब समझें | पड़ोसन ; कभी जी को जलाती कभी खुश करती हुई सी  बिलकुल सोलह साल की उम्र की भांति जो अपनी होते हुए भी कभी  अपनी नहीं होती पर सब से प्रिय होती है | पड़ोसन ;दरवाजों और खिडकियों के पीछे से झांकता एक पवित्र और आवश्यक रिश्ता |
***पड़ोसन ;पत्नी द्वारा  एप्रूवड वो सुन्दरी जिसके आने से घर की नैतिक ईंटें खिसक जायेंगी ये डर किसी पत्नी को नहीं होता |
***कान से समाचार जानने की कस्बाई संस्कृति अब समाप्त हो चुकी है अब तो टीवी है सोसियल मीडिया है पर फिर भी पड़ोसन ने इस संस्कृति को गंवई-गाँव से लेकर शहरों और महानगरों की बड़ी सोसाइटियों में भी सहेज के रखा है | पड़ोसन ;जो चौबीस घंटे में किसी भी समय आपके घर की घंटी बजा सकती है और यदि दरवाजा उढ़का हुआ है तो धडल्ले से खोल के भीतर आ सकती है |मेरी पड़ोसनें ,मेरी सखी से अधिक मेरे पती की भाभीजी  रही हैं | अपने घर परिवार की अन्तरंग बातें और समस्याओं के समाधान सब  अपने इस देवर से ही मिलते थे इनको ,मैं तो केवल चाय पिलाने तक ही सिमित थी |वैसे हमारे घरो की ये पुरानी  परम्परा और संस्कार हैं की पड़ोसन को पूरा सम्मान देना है | पड़ोसनों की उम्र या  रूप रंग नहीं देखे जाते ,इनके तो कानों और इनके शब्दों से ही इनकी पहचान होती है | जितने बड़े और स्वस्थ कान होंगे उतनी ही खबरें झरेंगी मुंह  से |मेरी एक पड़ोसन तो बहुत ही निराली थीं ---कुछ ऊंचा सुनती थीं - मध्यम स्वर में बोलती थीं  पर जाने कैसे जमाने भर के घरों की अन्तरंग बातें उन्हें मालूम होती थीं | मुझे बहुत -बहुत गर्व रहा कि मैं उनकी पड़ोसन रही |
***पर कुछ पड़ोसनें मेरी तरह की भी होती हैं जिन्हें किसी के घर की अन्तरंग बातों में कोई- कोई रूचि नहीं होती ,किसी के घर में घुसने की आदत नहीं होती ,जिन्हें  किसी की बातें सुनके भी उनके बीच में छिपा अर्थ समझ नहीं आता और जिनके लिए इशारे तो काला अक्षर भैंस बराबर होती हैं | ऐसी  पड़ोसन की कहीं कोई पूछ नहीं होती ,जो  कोई चुगली ,छुईं न  खाती  हो ,गप्पी -झप्पी न हो ,तो उसके घर कोई भी पड़ोसन क्यूँ आये  ? आएगी  जी ,हर पड़ोसन आएगी  ! बस हमें कुछ आकर्षण पैदा करना पड़ेगा ,सिलाई ,कढ़ाई,बिनाई ,पाक-कला ,व्रत- त्यौहार ,और गाने बजाने नाचने के गुर सीखने और सिखाने के लिए तैयार रहना पड़ेगा |नये नये मौसमी और ट्रेडीशनल व्यंजनों से पड़ोसिनों का स्वागत करना पड़ेगा |कुछ धार्मिक ,दार्शनिक और साहित्यिक बातें जो आपको हटके बनायें , सबसे बड़ी ट्रिक -हम जैसे नीरस लोगों को सबकी मदद के लिये हर वक्त तैयार रहना पड़ेगा , पड़ोसन बहनें  किसी भी पार्टी या उत्सव के लिए हमारी नयी वाली साडी और ज्वैलरी मांगे तो ख़ुशी -ख़ुशी देने को तैयार रहना पड़ेगा ; तभी, मेरी जैसी नीरस पड़ोसिनों को भी चटखारे वाली पड़ोसिनें मिलेंगी | अन्यथा महानगरों की चाल में तो आप निपट अकेले हो जायेंगे ,कौन पूछेगा आपको | तो ये शब्द  जो पड़ोसन कहलाता है बहुत ही सुंदर और उपयोगी रिश्ता है |पर यदि कालचक्र उल्टा घूमे और आपकी ग्रह-चाल ख़राब हो इस रिश्ते के कोप से अपने को बचाना बहुत मुश्किल होता है |आपको अपनी सारी समझदारी उड़ेल देनी पड़ती है वरना तो इस रिश्ते के पास आपके सारे राज होते हैं --- मेरा तो  मानना है - पड़ोसन को अपनी प्रिय सखी मानें ,उससे सारी  खबरें बड़े मनोयोग  से सुनें पर उन्हें पचा  जाएँ , अपने कोई भी राज या कमजोरी अपनी इस सखी के  हाथ न लगने दें ,वरना तो महिमा घटी समुद्र की रावण बस्यो पडोस !आपको पता है श्रवण -मनन और निविध्यासन द्वारा साक्षात्कार का सामर्थ्य प्राप्त होता है पड़ोसिनों को | ये खबरनवीस आसपास  की  खबरों का  संकलन और संचालन करते -करतेभावातीत अवस्था में रहा करती हैं | अपने स्व को भूल के ,खबरों का अहर्निश जाप करते हुए मधुमय आनन्द को प्राप्त रहती हैं हर वक्त | ऐसी पड़ोसनों को साधने का एक ही गुर ,लो प्रोफाइल , कभी भी उन्हें ये न महसूस होने दो कि तुम उनसे बीस हो हमेशा सोलह ,बारह या दस पे ही दिखाओ अपने को, चाहे- स्त्री सुलभ डाह आपको कितना ही कष्ट क्यूँ न दे ,जरा सी चूक हुई ,सावधानी हटी और दुर्घटना घटी  | असल में समय पे तो पडोसी ही काम आता है ,वास्तव में दान ,पुन्य ,यश ,नाम धन सब फीका है एक अच्छी पड़ोसन के आगे | पर  पड़ोसन से अपनी रक्षा भी जरुरी है |वो बेचारी आपसे प्रेम करती है ( चाहे दिखावेका ) और खबरची का रोल बड़ी पवित्रता से निभाती है |वह माया का ही एक रूप है ,निर्गुण फांस लिए कर डोले ,बोले मधुरी बानी | कितने मकान  बदलने ,कई  सोसाइटियों  में रिहायश पे कई विभिन्नताओं के मध्य एक ही समानता रही-  मिलती जुलती पड़ोसनें |कमोबेश एक जैसे स्वरूप वाली ,समता और न्याय का निरूपण करती सी |  जीवन क्षण भंगुर है पर उसमें एक अदद पड़ोसन की सख्त जरूरत है ,तो आज ही खटखटाइये अपने पड़ोस का दरवाजा और जान - पहचान  बढाइये अपनी  पड़ोसन से |वरना तो आज रिश्ते सड़ी सुपारी की मानिंद हो गये हैं जरा सा सरौता लगा नहीं और कट के गिर पड़े |  ***आभा ***

Friday, 27 June 2014

हसीन तस्सवुर सामने हो ,ख्यालों में चढ़ ही जाता है                        कल्पना का जादू
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 ये कौन चित्रकार है  ? क्या मानव की कूची इतने सुंदर रंगों को उकेर सकती है  ? समुद्र की सम्पदा_______ सौन्दर्य ,चटकीले रंग ,अल्हड़ चाल ,नटखट अंदाज ,भोलापन और शातिर जिजीविषा सभी कुछ तो है यहाँ |   कुदरत के इस हुस्नों- इश्क के बागीचे में सैर करने निकलने  पे  अक्सर अक्ल बारीक हो जाती है ,दृश्यों की शाब्दिक आहट कान पहचानने लगते हैं बेजुबान आँखें ,बेजुबान कान प्रकृति के हर रूप का ,हर बार  , पहले प्यार की पहली   छुवन सा अहसास करवाते है |बहुत मुश्किल होता है अपने अंतर्जगत के भावों को कैनवास पे उकेरना | कहीं न कहीं कुछ छोड़ना ही पड़ता है  पर कुदरत ने इसमें कहीं कोई कमी ही नहीं छोड़ी ,जल ,जंगल ,आसमान सभी तरफ उस नटवरनागर की तूलिका से हुई  रंगों की बौछार को हम प्राची में सूर्योदय से सायं दिवस के अवसान तक अनुभव करते हैं |
     इंसान उस चित्रकार की सबसे अद्भुत कलाकृति | बस ऐसे ही बैठे-बिठाये यादों के झरोखों में अपनी कुछ यात्राओं में कुदरत के हसीन नजारों में टहल रही थी तो विचारों ने उछल कूद शुरू की | सोचने लगी  ये वादियाँ ,ये सुबह ,ये शाम ,ये बेइंतहा खुबसूरत कुदरत के नजारे इन्हें देखने ,समझने और सराहने की सही शुरुआत उम्र के किस पडाव से शुरू होकर यहाँ तक पहुँचती है | हर उम्र के अपने अहसास होते है ,आज जो मैं इस कुदरत के समक्ष बेजुबान ,नतमस्तक हूँ, क्या  ? बचपन में भी  ऐसा ही था ; शायद नहीं |
    इस  हसीन तस्सवुर की  रूमानियत का अहसास होता है कब ! शायद सोलहवें साल की बंदिशों  वाली उम्र आने को होती है तब ,जब खुद की शख्शियत , खुद से ज्यादा हसीन और किसी को नहीं देखना चाहती  | जब बिना किसी कारण ही , पढते -लिखते  ,खेलते  -कूदते  और माँ का हाथबटाते हुए एक नशा सा रहता है हर बढ़ते बच्चे पे |,बंदिशें ,लड़कों पे कम लड़कियों पे ज्यादा  | और इसी बहाने यादों के जुगनू टिमटिमाने लगे मन के जंगल में जो शायद कमोबेश सबकी यादों में एक से ही जगमगाते होंगे |
  सोलहवें साल का वो नाजुक सा दौर ,जो सबसे ज्यादा अपना होते हुए भी अपना नहीं होता | दरवाजों और खिडकियों के पीछे से चुगली करने वालों जैसा , चुपके से सुनना  और मुहं फेर लेना लापरवाही से हर आहट पे बेवजह ही चौंकने  और अनजान आने वाले का इन्तजार करता जैसा  ,बस ऐसा ही चोरी छिपे का रिश्ता होता है अपने साथ | पिता से सहमा हुआ ,माँ से छुपता हुआ ,बेख़ौफ़ पर सहमा हुआ; मन में उठता हुआ काव्य संसार ,सृजन की उत्कंठा | ये उम्र भी तो प्रकृति के सब रंगों में सबसे जुदा ,सबसे चटकीला ,सबसे खूबसूरत रंग है , तभी  तो कुदरत के साथ तार इसी उम्र में जुड़ते है | कहानियाँ ,कविताएँ लिखी जाती हैं और फाड़ी जाती है ,ताकि कोई देख न ले और पढाई के वक्त उटपटांग करने के आरोप में डांट न पड़े | हाँ ! कभी प्रतियोगिता हो तो आप कुछ अच्छा सा लिखने के लिय फ्री होते है --जैसे ''पंछी मुझको भाते हैं ,चूं चूं चूं चूं करते हैं ,मंगल गाना गाते हैं ""  ये उम्र होती है जब चाँद -सितारों को जल चढाने का नहीं छूने का मन होता है  आंगन  में जगमगाते जुगनुओं को अनायास ही झोली में भरने का मन होता है | और मेरे  जैसे कुछ जन्मजात कलाकार ( अब तक का सबसे बड़ा जोक ठीक स्टैंडिंग कॉमेडी जैसा ) जो पहाड़ों , नदी झरनों , या समुद्र के किनारे  रिहायश पा जाएँ इस उम्र में तो समझिये प्रकृति और कलाकार में अंतर करना ही मुश्किल हो जाता है दोनों का एक दूसरे में निरूपण हो जाता है महादेवी की इन पंक्तियों की मानिंद _____
           सिन्धु का उच्छ्वास घन है ,
           तड़ित तम  का विकल मन है ,
          भीति क्या नभ है व्यथा का ,
          आंसुओं से सिक्त आंचल !
स्वर प्रकम्पित कर दिशाएँ ,
मीड,सब भू की शिराएँ ,
गा रहे आंधी प्रलय ,
तेरे लिये ही आज मंगल !
काश उस नटवर नागर ने मुझे भी थोड़ी सी कलाकारों वाली नाजुकी अंदाज दिया होता |शायद उसको जान पाती अधिक और अधिक ,पर जो भी उसने दिया खूब दिया और कह दिया  बाकी बचा हुआ प्रकृति में तलाश |आभा |










   

Friday, 20 June 2014

                      (एक मूर्खता पूर्ण व्यंग उट्र-उट्र ___)
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 कालिदास का मूर्ख से विद्वान बनना , वो भी संस्कृत के महा पंडित ,कवि ,नाटककार ,कहानी कार  और महाकाव्य के रचयिता के रूप में ,  महज कुछ ही वर्षों के अंतराल में ! मेरी मूर्खता ये कभी भी नहीं पचा पाती है| तब  भी नहीं जब मैं पढ़ते हुए  ,कालिदास को अपने रगों में बहते हुए महसूस कर सकती हूँ |   विद्योत्मा को नीचा दिखाने के लिए, पंडितों की कुचाल  के कारण, कालिदास जैसे मूर्ख (जो जिस डाल पे बैठा था उसे ही काट रहा था ) का प्रादुर्भाव साहित्य जगत में हुआ | जो शादी के बाद मूर्खता का भेद खुल जाने  और लताड़े जाने पे विद्वान् बनने चल दिया | स्त्री द्वारा लताड़े जाने पे तो सूर और तुलसी भी प्रसिद्ध हुए पर वे जन्मजात मूर्ख नहीं थे | कलिदास ठहरे निपट मूर्ख फिर उम्र के इस पड़ाव पे आके कुछ गिने चुने सालों में इतने विद्वान कैसे हो गये ! क्या  विद्योत्मा ने ही   किसी खूबसूरत से अंडरग्राऊंड महल में  कालिदास को छिपा दिया कुछ समय के लिए ,और ओवरहालिंग करके पंडित सा दिखने लायक बनादिया जैसे आजकल कई संस्थानों में  पुस्तक  की सहायता से मन्त्र पढ़ के शादी ब्याह ,हवन और कथा करवाने वाले पंडित हो जाते हैं ,और हम इन मूर्ख भाड़े के पंडितों   के पैर छू के आशीर्वाद भी लेते हैं , जो हमे धोखा दे रहे हैं !  पर प्रश्न ये उठता है कि केवल काम चलाऊ पंडित बने कालिदास   तो इस अतुलनीय  साहित्य का रचयिता कौन था ? क्या सही में ऐसे चमत्कारों का काल था वो कि निपट मूर्ख ( जैसा कि उनको दिखाया गया था पंडितों से मिलने से पहले ) कुछ ही समय में प्रकांड पंडित बन महाकाव्यों का रचयिता बन जन -जन के मन पे छा जाए |या फिर ये भी हो सकता है कि कालिदास विद्वान हों और उन्होंने विद्योत्मा के समीप जाने के लिए मूर्ख होने का स्वांग रच के उस वक्त के प्रकांड पंडितों को मूर्ख बनाया हो | या फिर , एक बार शादी होने पे और पती की मूर्खता का भांडा फूटने पे बदनामी के डर से और पंडितों को नीचा दिखाने के लिए कालीदास के कहीं चले जाने की अफवाह उड़ाकर ,उनको पंडित बनाकर पेश किया गया और उनके नाम से कई ग्रन्थों की रचना विद्योत्मा ने ही की , नेपथ्य में रह के | राजघराने में विदूषी स्त्री सब कुछ करने में सक्षम थी !  बात कुछ भी रही हो पर हमें तो मेघदूत ,रघुवंशम  ,अभिज्ञानशाकुन्तलम,विक्रमोर्यवशियम्,मालविकाग्निमित्र,कुमारसंभव ,ऋतुसंहार जैसे महाकाव्य ,खंडकाव्य ,नाटक ,कविता और कहानियाँ मिलीं और साथ ही मिला पुरुरवा - उर्वशी यक्ष ,शकुन्तला ,अलकापुरी जैसे नामो का सानिध्य जो मन के किसी कोने में हमेशा के लिए अंकित हो गये  | मेघ और यक्ष के  वार्तालाप में जंगल ,नदी पर्वत सागर गाँव ,पनघट शहर के ऊपर  उड़ते  बादल को सही दिशाबोध करवाना शायद  अपने तरह का सबसे पहला टूरिस्ट -गाइड या नक्शा रहा होगा जो गूगल मैप से भी अधिक पारदर्शी है| एक ओर  पनघट पे आयी सुमुखियों के भी दर्शन करता चलता है तो दूसरी ओरदिशा और दूरी का सही आकलन करवाता है | पर प्रश्न यही है कि एक निपट मूर्ख इतना विद्वान कैसे बन गया या उस कालखण्ड में भी आज के नेताओं की तरह  अपने को बुद्धिजीवी और विद्वत दिखाने की ललक में राजवंश भाड़े के लेखक और साहित्यकार रखा करते थे लेकिन दूसरे की रचना में वो आत्मा की शुद्धता और अहसासों की गहराई कैसे हो सकती है | कैसे बिना अपने अनुभव के कोई इतना महान साहित्य दे सकता है और फिर वही ' इंगणी-मिगणि मेरा बाखरा की तिन्नी सिंगणि ' कोई निपट मूर्ख कैसे कूछ समय में इतना विद्वान् हो सकता है ,चाहे कितना भी परिश्रम कर ले -एक निश्चित स्तर तक ही सफलता मिलेगी | ये सही में शोध का विषय है | बचपन से सोचते -सोचते मैं तो इसी निर्णय पे पहुंची हूँ कि कालीदास  मूर्ख नहीं थे | --- मेरी ये रचना केवल उन साहित्य प्रेमियों  को  समर्पित जो कालिदास की रचनाओं की बारिश में भीग चुके हैं  और समय -समय पे उनका स्नेह लेते रहते है ,क्यूंकि वही मेरे प्रश्न का मर्म समझ पायेंगे |-----मेघदूत और बाल्मीकि रामायण में बहुत समानतायें हैं प्रस्तुत है एक छोटी सी बानगी ------मेघदूत में यक्ष ने  यक्षणी के  नेत्रों को  मछली के उछलने से हिलते, नील कमल के सदृश उपमा  दी है यथा '' त्वय्यासन्ने नयनमुपरिस्पन्दि शङ्के मृगाक्ष्या ,मीनक्षोभाच्चलकुवलय श्रीतुलामेष्यतीति॥'' यही उपमान वाल्मीकि ने रामायण में विरह विधुरा सीता के लिए प्रस्तुत करवाया है यथा ___ 'प्रास्पन्दतैकं नयनं सुकेश्या मीनाहतं पद्मममिवातिताम्रम।'' ___दोनों एक ही कोटि के कवि थे | लेकिन दोनों के उत्थान की कहानी का विरोध भास शायद जन मानस को भ्रमित करने के लिए ही है क्यूंकि वाल्मीकिजी ने  अपने परिचय में ,अपने को प्रचेताओं का पुत्र बताया है ,तो डाकू वाली कथा ख़ारिज हुई और कालिदास तो मूर्ख हो ही नहीं सकते ये मेरा मानना है | इति शुभम | कभी कभी जासूसी पिक्चर देख के साहित्य में घुस के जासूसी करने का मन होता है तो मैं मन को नहीं मारती हूँ क्यूँ कि अनर्गल प्रलाप करने वालों के कारण ही तो मनोविज्ञान और मनोवैज्ञानिक का जन्म हुआ || आभा ||






Thursday, 22 May 2014

'' आज बैठे ठाले का फितूर -बेमतलब की बकवास                नहीं गीता से स्नेह लेने की इच्छा ''
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"गिरते हैं जब खयाल तो गिरता है आदमी ,जिसने इसे संभाला वो ही संभल गया " | और आदमी को संभालने के लिए गीता से इतर और कुछ हो सकता है क्या ? गीता कथाओं का ग्रन्थ नहीं है ये तो चिंतन है ,दर्पण में अपने को देखने की प्रक्रिया | ये माँ गंगा की भांति पतित पावनी -"कृष्ण कृपा संजीवनी " है |
कृष्ण अपने कई रूपों में ,जीवन के हर  पल और हर कर्म के लिए हमारे साथ हैं पुत्र से धर्म-प्रवर्तक   समाज-सुधारक तक | श्रृंगाररस  के संयोग वियोग दोनों पक्षों में  पूरा जीवन समाहित है और वहां प्रत्येक स्थान पे कृष्ण मौजूद हैं हमारे साथ | गीता के  स्पर्श  मात्र से ही कान्हा  की समीपता का अहसास होता है -हर श्लोक माँ के सामान बच्चे की ऊँगली थाम के जीवन की कठिनाइयों से पार ले जाता सा प्रतीत होता है |
तनाव से बाहर निकलने को ,अशांति को शांत करने को ,गीता को पढना ,समझना और जीना ही एक मात्र साधन है |  दूसरे अध्याय का ४८ श्लोक -----
   योगस्थ: कुरू कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय |
   सिद्धयसिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ||_____से यदि दिन का प्रारम्भ हो इसे  प्रात:काल पढ़ के जीवन में उतारा जाय तो मजबूत दिनचर्या का मांगलिक आधार बन जाएगा एक प्रबोधात्मक प्रेरणा ,पुरुषार्थ के प्रति जागरूकता ,जहाँ योग शब्द को प्रभु ने मन की समता से जोड़ा है ,कर्म  के अहंकार से दूर ,कृपा भाव से कर्म  , मैं इस कर्म को या कर्म से क्या दे सकता हूँ न कि मुझे क्या मिलेगा |यही गीता की दिव्यता है जो भी कर्म कुशलता और निष्ठा से किया जा रहा है  वो योग है तुझे कर्म के कर्तव्य की दृष्टि हो देने वाला तो मैं हूँ | सुबह सवेरे अपने कर्मों को प्रारम्भ करने से पहले का श्लोक --फिर किसी भी गलती की सम्भावना ही नहीं |
 भोजन से पहले का श्लोक ____यज्ञशिष्टशिनसंतो मुच्यन्ते सर्व किल्बिषे |
        अध्याय ३ का १३ _______  भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पच्न्त्यात्मकारणात् ||
                                                                      और
       अध्याय ४ का २४ -_______ब्रह्मार्पणम् ब्रह्म ह्यविरब्रह्माग्नो  ब्रह्मणा हुतं |
                                                 ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं  ब्रह्मकर्म समाधिना     ||______और अधिक नहीं इन दो श्लोकों को ध्यान करके यदि भोजन का इंतजाम हो और भोजन किया जाए तो कोई भी भूखा न रहे | कोमल कन्हैया कठोर वाणी में आदेश देते हैं कि केवल घी और आहुति के होम को ही यज्ञ नहीं कहतेहैं ,यद्यपि ये भी यज्ञहै  अपितु खिला के खाना और परोपकार की भावना ही असली यज्ञहै   ,गो ग्रास , श्वान के लिए ,पक्षी के लिए यहाँ तक किसांप के लिए दूध  भी क्यूंकि वो भी प्रकृति का शोधक तत्व है तेरे निवाले से जाना चाहिए | समत्व भाव ,परोपकार ,प्रकृति संरक्षण और जितना चाहे बस उतना ही लो प्रकृति से -अपरिग्रह ,सब भोजन यज्ञ में ही निहित है | "त्वमेव वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पयेत " आस्था ,श्रधा ,विश्वास ,समर्पण --यदि गोविन्द को समर्पित करके खाओगे तो भक्ष्य ही खाओगे जो तुम्हारे लिए अमृत होगा ,चिन्तन में श्याम सलोना होगा , तो मीरा के विष की तरह हर पदार्थ अमृत हो जाएगा |दुराग्रह की स्थिति नहीं ,चिन्तन की स्थिति यदि केवल भाव बदलने से प्रभाव बदल जाए तो क्या बुराई है ईश्वरी भाव होगा तो विराट उदारता होगी ,शुद्धता होगी और फिर मन और देह का सारा कूड़ा कचरा बह  जाएगा |''आहारौ शुद्धौ सत्य शुद्धि ,जैसा मन वैसा अन्न '', भीतर सात्विक भाव तो आरोग्यता ,तो हुई न गीता भोजन से पहले आचमन करने वाली गंगा | गीता में कार्य स्थल पे जाने से पहले से लेकर दिन भर के कार्यों के विश्लेष्ण तक के सभी श्लोक हैं जो जीवन के लिए मन्त्रों का कार्य करते हैं और निष्काम कर्म,जागरूकता और कर्तव्य निष्ठा से जीवन को  सुगम बनाने का मार्ग प्रशस्त करते है | आवश्यकता है गीता को एक बनिया के बहीखाते ,एक शिक्षक के हाजिरी - रजिस्टर या एक शेयर ब्रोकर के शेयरों की तरह प्रति दिन देखने की |
 और पूरे दिन भर की भाग दौड़ ,आपा-धापी और थकन के बाद रात्रि में बिस्तर पे जाने से पहले कान्हा का दुलार तो देखिये वे कहते हैं ___------
                                                 सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणम् व्रज |
                                                 अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि  मा शुच: ||
कितना दुलार ,कितना लाड करते है कन्हैया ,कोई भी भूल है उसे अपना तनाव न बना तू तो बस मेरी शरण में आजा पगले ,'मा शुच':., मैं देखूंगा तेरे सब पापों को ,५०१५० वर्ष पूर्व कहा गया ये वाक्य किसी मत ,सम्प्रदाय या पन्थ का नहीं है | ये तो उस विराट परमात्मा की एक प्यारी सी ममत्व भरी लाडली वात्सल्यमय पुकार है |वो कह रहा है मेरे लाडले ,दिन भर के क्रिया कलापों में जो तेरे कर्तव्य नहीं थे ,जैसे ईर्ष्या ,राग द्वेष वो भी तूने अपने ऊपर लाद लिए उतार  फेंक इस कलुष को ,मुझ पे विश्वास  कर ,जैसे माँ कीचड़ में सने अपने बच्चे को धो के साफ़ करदेती है वैसे ही मैं भी तुझे अभय देता हूँ तू मेरी ये लाड़ली पुकार तो सुन ! मेरा तो बन !  मेरी शरण तो आ ! यह श्लोक दिव्य  आह्वान  है कान्हा का मानवता के लिए,' मा शुच' की लाडली पुकार ,अज्ञान के आवरण को उतारफेंक और मेरे पास आ ,जहाँ परमात्मा है वहां सत् है शुचिता है ,निर्भयता है और सुमति है
 मेरे जीवन को तो गीता का ही सहारा है ,कृष्ण मेरे प्राण हैं ,उनकी लाडली पुकार मेरे लिए अभय का संकेत है |
गीता निर्भय जीवन की प्रेरणा है ,जिज्ञासू को जागृत करती है ,खंडन नहीं परम्पराओं का प्रतिष्ठापन है सब कुछ भूल के गोविन्द की विराट गोद में विश्राम है |
 गीता हमे स्वयं पे विश्वास और क्षमा दोनों सिखाती है ताकि हमपे ताकत हो ये कहने की कि ____
 जिन्दगी का सफर मैंने यूँ आसां कर लिया ,
कुछ से माफ़ी मांग ली कुछ को माफ़ कर दिया ||आभा ||












Tuesday, 6 May 2014

    " बैठे ठाले का फितूर ,बेमतलब की बकवास "
                      (जिन्दगी की बाराखड़ी)
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बरसों ये सूरज चाँद सितारे जुगनू मेरे साथ जले ,चमके जगमगाये टिमटिमाये , आज भी सबकुछ वैसा ही है प्रकृति  उतनी ही हसीन है ,बस सांझ ढलने  पे अपनी  पोटली बांधने और चलने की तैयारी मैंने शुरू कर दी है | कितना कुछ है इस पोटली में शायद कुछ व्यक्त से अव्यक्त में भी साथ जाए अनन्त की यात्रा में |नदी, पहाड़, झरने ,जंगल, बाग़, बगीचे तितली, फूल, भंवरे, परिंदे और सागर; आज भी मन में वही तरंग जगाते हैं ,ताली बजाके उछलने का मन आज भी होता है कोई पागल समझे तो ये उसकी समझ का दोष है शायद हर उम्र में एक बच्चा तो इन्सान के भीतर रहता ही है जो बंधन में नहीं रहना चाहता है मन के किसी  कोने से  बाहर आने की कोशिश में रहता है और नकारने पे हमें खींच के बचपन की यादों के बागीचे में सैर करने को मजबूर कर देता है |  'ॐ नम: सिद्धम्  ' के साथ स्लेट या पुती हुई तख्ती पे  आड़ी तिरछी रेखायें खींचते हुये कब बच्चा बाराखड़ी और पहाड़ों के फेर में पड़ जाता है उसे पता भी नहीं चलता |और बस यहीं से ९९ के फेर में पड़ने का सिलसिला प्रारम्भ |
   हाँ ! ये जिन्दगी  भी तो बाराखड़ी की तरह ही है ;अ से प्रारम्भ होके सभी स्वरों को साथ लेते हुए व्यंजन और व्यंजनाओं में डूबती उतरती नैया की मानिंद ज्ञ तक का लम्बा रास्ता तय करती है | फुर्सत के क्षणों में चिंतन जब बीते हुए पलों में गोता लगाता है तो सारी यादें ,सारे बीते पल स्वरों और व्यंजनों की तरह उछल-कूद करने लगते हैं मन की कापी के पन्ने पे, कभी सपाट और कभी  करीने से खींची गयी लाइनों पे चलते से -अलग -अलग रंगों की स्याही से लिखी इबारत , हर पल ,हर घटना ,हर मूड का अपना सुलेख ! कहीं  मोती से उकेरे गये अक्षर हैं  मानो मानसरोवर में राजहंस तैर रहे हों और कहीं  लिखाई  आकाश में बिखरे  बादलों की  मानिंद -जहाँ किसी भी अक्षर का कोई आकार ही नहीं है -अपना ही लेख पढना समझना कुछ दिनों बाद मुश्किल |
जिन्दगी की बाराखड़ी के रस्ते में शायद   पूर्ण विराम नहीं है अव्यक्त से व्यक्त और अनन्त की यात्रा कभी प्रकाश तो कभी अंधकार -चरेवेति-चरेवेति एक राह से दूसरी राह एक चोले से दूसरा चोला --
''  वासांसि जीर्णानि यथा विहाय ,नवानि गृह्णाति नरोपराणी '' की निरंतरता | हाँ ! हलन्त् तो हम इसे बना ही लेते हैं ,जहाँ से आगे न बढ़ना हो ,किसी का साथ छोड़ना हो ,कहीं से मोड़ मुड़ना हो तो हलन्त् हमें खूबसूरत अंत सिखाता है ठीक वैसे ही जैसे सृज् धातु से सृष्टि बनी  पर वहां भी अव्यक्त से व्यक्त की यात्रा है, निरंतर;  पूर्ण विराम के स्थान पे हलन्त् ही है और मेरे जीवन को  तो हलन्त् ने ही  पकड़ रखा है ,आधी-अधूरी ख़ुशी ,पूर्ण निष्ठा और समर्पण के पश्चात भी कार्य न होना, सफल असफलताओं का अम्बार , ढेरों पूर्ण विराम थे जीवन के जो मैंने हलन्त् की खूबसूरती के साथ स्वीकार कर लिए ;जीवन का ककहरा सीखते हुए कैसे जिन्दगी कभी मूर्ध्यन्य हो गयी कभी तालव्य की तरह गोल-गोल घूमने लगी पर "ॐ तत्सत् " के साथ अपनाने से  किसी भी परिस्थिति में मिठास कम नहीं हुई |आधे को हलन्त् की खूबसूरती देके पूरे का अहसास और फिर चल पड़ना  दूसरी राह् ठीक वैसे ही जैसे अनजाने में तत्सम -तदभव् शब्दों में य र ल व् श स ष ह के साथ अनुस्वार के स्थान पर चन्द्रबिन्दु का प्रयोग वर्तनी की अशुद्धि है  पर अर्थ स्पष्ट है  | ऐसा नहीं है कि जीवन में हमेशा अनुस्वार की खूबसूरत सी बिंदी या चन्द्रबिन्दु का ताज नहीं रहा  ( माँ होने पे तो ये साथ -साथ ही चलता है ) अपितु असंख्यों बार तो विसर्ग ने  भी जीवन के सुलेख  में जुडके उसे खुबसूरत अर्थ दिया है  पर इसका आभास होने में समय लग गया  | दुःख में विसर्ग : ने जुड़ के उसे कितने सुन्दर शब्द में ढाल दिया  यदि दुःख में विसर्ग न होता तो दुख नग्नता का आभास देता | ये विसर्ग यदि समझ में आ जाए तो दुःख के पल सिमट जाते हैं मन के किसी कोने में विसर्ग की खुबसूरती लिए हुए वरना तो अनुस्वार कब खिसक के नीचे आ जाए और नुक्ता . बनके तालव्य को गले में जाने को मजबूर कर दे भान ही न हो |
  बच्चे को बाराखड़ी और वो भी ॐ नम: सिद्धम्  के साथ सिखाना ,सुलेख लिखना ,स्लेट पे बाराखड़ी लिखना फिर मिटाना फिर लिखना ,फिर तख्ती पे अभ्यास वो भी तख्ती की रंगाई पूताई के साथ फिर कलम की कत बना के सुंदर अक्षरों को उकेरने की प्रेरणा शायद जीवन  रूपी रंगमंच की घटनाओं का रिहर्सल ही होता है |संयम ,,धैर्य ख़ुशी ,खोना- पाना ,दुःख -सुख सारे रसों से बालपन में ही परिचय ताकि सनद रहे |
यूँ ही बैठे ठाले अ से ज्ञ तक घूम आयी और एक बार बाराखड़ी फिर से लिख ली फिर से तख्ती पोती ,कलम में कत बनाई ,होल्डर की निब घिसी और सुलेख के बाद अब बाग़ में तितली के पीछे क्यूंकि दिल तो बच्चा है जी || ....आभा ...