Friday, 19 August 2016



आज अजय ६० वर्ष के हो गये ! कभी जन्माष्टमी से पहले कभी बाद  में  शिफ्ट होता था तुम्हारा जन्मदिन , और फिर सितम्बर में दोनों बच्चों का --भादों  से अश्विन हमारे  घर  में  त्यौहार  ही त्यौहार  बसते थे !क्या  हुआ जो तुम  मेरे पास नहीं हो  तो ,कान्हा भी तो मेरे मन में ही हैं न ,और मैं तो तुम्हारी टाइमलाइन को ही संभाल रही हूँ '' बच्चों के आग्रह पे'' ; शून्य में होने पे भी इस जगह पे आती ही हूँ ,यहां तुम्हारा नाम जुड़ा है न । तुम हो हमारे साथ अजय ;आज भी कल भी हमेशा , मन के झरोंखों से झांकते ,हर सुख में खिलखिलाते हर दुःख में गले लगाते हुये। देख तो पाते हो तुम हमें ऊपर से ,बस हम ही ढूंढते रह जाते है तुम्हें।श्रधान्जली अजय ! जन्मदिन की बधाई ! तुम तो कान्हा के पास चले गये मेरी भी अर्जी आई है उसे भी देख लेना ---
( हर क्षण सपना ;सपने में बस तुम )
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सपनों के उपवन में जब भी तुमसे मिलती हूँ ,
किसलय के अधरों की आभा सी बन खिलती हूँ .
सपनो के मनहर झुरमुट ,सघन वन ये मानस मेरा,
यादों के ढहते पर्वत , नयनों से झरते झरने।
मैं जीवन से हार रही या मन निर्मल होना चाहे ,
आत्म हवन अविरल अकम्पित ,
श्रृंगार शून्य तन ,दुःख व्रती मन।
पर ,नहीं हारती ;सूने पथ की राही हूँ ,
मैं रोती नहीं !वारती -मानस मोती हूँ। ----ये पिछले वर्ष के उदगार हैं --आज भी कुछ लिखा तुम्हें अर्पण ----
<><><> मैं चिर चंचल ,विह्वल ,विरल ,
अचल ,अविचल ,अंजस , अनूक
क्रूर नियति के लेखों का फल
करुणा संवृत ,संध्या की सखि ;
मैं अनित्य , अव्यय अशेष
उषा निशा की मिलन स्थली
करुणा संवृत -संध्या की सखि
नियति के हाथो से फिसली ;
तोड़ क्षितज सीमांत बंधन
वो बवंडर आँधियों का ,
ले चला था , सब कुछ उड़ा के
हूँ उसी की धूलि का कण ;
उड़ रही नभ में धरा से !
नियति क्या औ ठौर क्या है ?
व्यथित मैं ,पर सहज भी हूँ
धूलि का फिर मोल क्या हो !
तम को जलाने -दृग दीप खोलूं
मोम की मैं करुण बाती
स्वर्ण सी ज्योती बिखेरूं
विश्वास की अनमोल थाती ;
मेघ के भीतर घटा बन
आज मैं फिर झर चली रे !
चाँद का टीका सजाये
आज फिर मैं मानिनी रे !
हवन यादों का पुनश्च:
अश्रु के स्नेह से है
औ उठा जो धूम अंबर
मधु कामना वो जन्म की है
श्रधान्जलि मम हृदय की है।। -आभा।।   ..... ..... .... तिथि  के  अनुसार  अजय का  जन्म हड़तालिका तीज  को  होता  है ,हमारे  गढ़वाल  में  करवाचौथ  जैसी  ही  मान्यता  है  हड़तालिका  की।  निर्जल व्रत  होता  है  पर  सीधी -साधी संस्कारी  गढ़वाली  महिलायें  सजना सँवरना  और  दिखावा  नही  जानती  थीं पहले [अब  तो बाजार  की  दस्तक  हर  घर  में है ] बहुत  कठिन होता  है  हड़तालिका का  व्रत , मैंने  भी  सारे  व्रत किये हड़तालिका ,करवाचौथ ,वटसावित्री ,सोमवार ,गौरातीज  ---पर  जिसकी  जितनी  साँसें  होती  है  उसे  ये  व्रत  नही  बढा  सकते  ,न  ही  कोई  चमत्कार  होता  है  ---हाँ  ये  व्रत आपको आत्मबल  देते  है ये मेरा मानना  है  --बाकी  तो जीवन  पानी  में लिखी लिखाई  ही  है ,कब लहर  आके  मिटा दे ये संयोग है  ---------------

Saturday, 2 July 2016

='' RIP -एक लेखिका के पैदा होते ही मौत की कहानी ''===[कल्पना ]
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----व्यंग लेखन ; वो भी कहानी -सोचा अपने प्रादुर्भाव की ही कहानी लिखी जाय । व्यंग भी फर्स्टहैण्ड होगा ,अनुभूत व् झेला -झिलाया हुआ।
---- वो एक समय था -जब मैं छोटी थी ,हालांकि बुद्धि का खजाना आज भी छोटा ही है पर तब कुछ कमसिन सी भी थी और ऐसी उम्र में कोई काम बुद्धि से नही होता। उस वक्त शौक चर्राया लिखने पढने का ,किताबी ज्ञान से इतर कुछ सार्थक । सर्व सुलभ -भक्ति , श्रृंगार ,वीर रस ,की कविताएँ चाटने की हद्द तक पढ़ डालीं ,जायसी बिहारी और अन्य रीतिकालीन कवियों को भी घोट डाला ,पर मन के खेत में भावों की फसल न उगी। भक्तिकाल तो समझने की उम्र थी ही नही ,रीतिकाल के कवि लेखक स्त्री सौन्दर्य में ही अटके थे। नख-शिख से लेकर स्त्री के हर अंग का ऐसा वर्णन --रहीम की एक बानगी इस कहानी का हिस्सा बनने को आतुर है ----
'' बर बांके माटी भरे ,कौरी बैस कुम्हारि।
द्वै उलटे सखा मनौ , दीसत कुच उनहारी।।''======ये रहीम ने कुम्हारिन के सौन्दर्य का वर्णन किया है कि उसका रूप बेमिसाल है और जब वो मूर्ति बनाने के लिए सांचों में मिट्टी भरती है तो उसके स्तन सुंदर सकोरों जैसे दीखते है।
अब ऐसा साहित्य और कमसिन उम्र ,कलम उठाई और श्रृंगार रस की कविता लिखने का मूड बनाने लगी ,इतने में ही माँ की आहट हुई और रहिमन उनके हाथ लग गये --गुस्से में लाल चेहरा -मुहं से गारियों का झरना अंतिम पंक्ति ''क्या जमाना आ गया है रहीम के इतने सारे दोहों में तुम्हें यही दोहे मिले पढने को --और जनाब रीतिकाल की एक आधुनिक कवियत्री पैदा होने से पहले ही फना हो गयी। रहीम तो उपर जा चुके थे वरना पूछती बाबा तुम तो लिख के चले गये पर क्यूँ लिखा ये भी बता दो।
--. -खैर मैंने अपनी सोच को वीर रस की ओर डाइवर्ट किया --भूषण पढ़ के मन हुआ वीर रस की कविताएँ ही ठीक रहेंगी ,तब लोंगोवाल की लड़ाई भी हुई थी और चहूँ और जोश ही जोश था पर ''मेरा रंग दे बसंती चोला '' , ''कहो माओं से दें बेटे ,कहो बहनों से भाई '' ,''ऐ वतन ऐवतन '' से इतर कोई सोच ही न बनती , दो चार तुक्के जड़े तो उनमे फ़िल्मी गानों की ही खुशबू आती ,माँ को खुश करने को उन्हें सुनाया तो फ़िल्मी है कहके नकार दिया --फिर एक घटना हुई , हम दो सखियाँ मन्दिर जा रही थीं , पीछे से एक मनचले ने फब्ती कस दी। माना कि साधारण सी बात थी और वो जमाना जब लड़की ने कोई रियकशन दिया तो उसके साथ-साथ माँ-बाप -खानदान और पुरखों तक की बदनामी हो जायेगी ,पर मेरे भीतर तो भूषण कुलाचें भर रहे थे -आनन-फानन में दिमाग की बत्ती -----
''तारा सो तरणी धूरी ,धारा मे लगत जिमि |
थारा पर पारा पारा वारा यो हलत है ||''----- जैसी जल बुझ होने लगी। तुरंत ही मियां मजनू का ---'ऐल फैल खैल भैल खलक मे गैल गैल , गजन की ठैल पैल ''--जैसा हाल करदिया , शब्द बाणों से और क्रुद्ध नजरों से। छोटा शहर -जाने पहचाने लोग तो जनाब पहाड़ी बरसाती गदेरे की तरह खबर घर तक बहती हुई पहुंच गई हमारे साथ -साथ ! (मोबाइल नहीं थे वरना साक्षात भूषण की कल्पना बनी लड़की ही घर पहुंचती ) सराहना तो हुई साहस के लिये पर कुछ उपदेशों के साथ तथा वीररस का भूत आज ही उतार फेंको --तो जनाब एक होनहार वीररस की कवियत्री का एक मजनू की क्लास लेने के कारण असामयिक निधन हो गया।
--- साहित्यकार बनने की लगन , क्या लिखूं कैसे लिखूं ,कहां से शुरू करूं।वर्षों पहले माँ से पूछ-पूछ के एक कविता लिखी थी ----
''पंछी मुझको भाते हैं ,
चूं -चूं -चीं -चीं करते हैं ''---कुछ दस पंक्तियों की लिखी थी ,और उसपे अपने स्कूल का साहित्य अकादमी पुरूस्कार भी मिला था ( और शायद वहीं से गफलत हुई थी अपने रचनाकार होने की )--पर उसकी हर लाइन माँ की ही थी ,और अब विषयान्तर का भी समय था ,गया बचपन अर आई जवानी वाला --
रचनाधर्मिता ने कहा ,उम्र का तकाजा है ,कुछ प्यार-व्यार पे लिख ,प्रसिद्ध हो जायेगी। वैसे भी ये विषय कभी पुराना नहीं होता ,नवजवानों की महफ़िल हो या अधेड़ों या बुजुर्गों की ,प्यार की गजल गाने को सभी बेताब रहते हैं, फिर यदि किसी कमसिन सुंदरी के भाव हों तो बूढ़े भी उछलने लगते हैं मुकर्रर कहते हुए।
तो निश्चित हुआ शेरो शायरी लिखेंगे , मियां ग़ालिब घर में आ गए ,मीर ,फैज ,साहिर सभी दबे छिपे तकिया के नीचे आ बैठे ,मधुशाला तो घर में थी ही ,मधुबाला भी आ गई --और --''तीर पे कैसे रुकूँ मैं आज लहरों में निमंत्रण ''--वाला हाल हो गया।
पता चला पढ़ने और लिखने में जमीन-आसमान का अंतर् होता है। क्या कभी जमीं आसमां भी एक हुए --जी होते हैं। वो उम्र ही ऐसी थी जहां असम्भव कुछ नहीं दीखता। क्या कहा ? ये गुगली न फेंको ; व्यंग को व्यंग ही रहने दो ,मिलन का झूठ पका के थाली में मत परोसो। नहीं जी ; खाना पकाना तो मेरा शौक रहा है ,वो क्या कहते हैं हॉबी। लड़की वाली ! जो होने से लड़की सुशील और होनहार कहलाती है --आलू को छिलके सहित अंगारों में भूना --ऊपर से थोड़ा सा छीला और एक चम्मच आइसक्रीम की टोपी रख चमचमाती प्लेट में छुरी कांटे के साथ पेश कर दिया --हो गई रचनाधर्मिता --पर साहित्य ; खाना है, बुद्धि का ,यहां जमीन आसमान कैसे एक करूं -सोच ही रही थी कि झमाझम बारिश हो गई ,लो जी हो गया जमीन आसमान एक-- रिमझिम करके बदरा बरसे ,बालमवा घर आ , भावनायें भीगने लगीं ,लेखनी कुलबुलाने लगी ,शब्द अक्षरों का सहारा ले उछल-कूद करने लगे - कागद रंगने के लिये ,जैसे मछलियां पानी की सतह पे आती हैं बार-बार सांस लेने को। मधुबाला ,रेखा सिम्मी ,हेमा ,नंदा ,वैजयंतीमाला न जाने कितनी हीरोइनों को आत्मसाध करने की कोशिश करने लगा बावरा मन। मोहिनी सूरत और कमसिन उम्र ,एक प्यार भरी कहानी जिसमे, शेरो शायरी का तड़का भी होगा , लिखने को मन मचलने लगा , पर अहसास कहां से आयें ,केवल बारिश से ! प्यार तो अभी जीवन में आया ही न था। अभी तो केवल वो स्टेज थी जब किसी को छुपके पर्दे के पीछे से देखने का मन होता है ,मासूम अल्हड़ पर सहमा बचपन। मन में सावन की घटाएं घुमड़ तो रही थीं पर , बरसें कहां!
छोटा सा शहर ,सभी पहचाने चेहरे , कभी कोई अच्छा भी लगा तो क्या ? मन की बात मेरे मन से न निकली और अहसास पैदा होते ही दफ़न हो जाते। सोचा चल कोई कमसिन साथी नहीं है तो कोई बात नहीं इतने सारे गाने हैं सुनो और प्यार का रिहरसल करो ,कुछ तो अहसास बनेंगे --कहानी बनेगी तो जब प्यार मिलेगा उसे सुनाना अपना ये रोमांस का अनुभव--- और ''चाँद आँहें भरेगा ,फूल दिल थाम लेंगे ,हुस्न की बात चली तो सब तेरा नाम लेंगे '' या गुलाबी आँखें जो तेरी देखीं ,शराबी ये दिल हो गया '' या ''तुम बहारों में अकेले न फिरो ,आजकल फूल भी दिल वाले हुआ करते हैं ,कोई कदमों से लिपट बैठा तो फिर क्या होगा '' जैसे गानों पे दिल आ गया ,बार बार सुनना -- सुहाना अहसास मानो धर्मेंद्र ,शम्मी ,देव सब मेरे लिये ही गा रहे हों --चल पड़ी कहानी ; बरखा बहार ,भीगती गाती जन्मों की प्यासी दो कमसिन आत्मायें , अपने में मग्न दुनियाँ से दूर --तभी माँ की आहट --पढ़ाई के समय ये क्या ? नाम खराब करना है क्या पिताजी का ,वो फलां का लड़का कितना पढ़ता है ,हटाओ ये सारी वाहियात किताबें --लो जी फिर हुई मौत एक रोमांटिक साहित्यकार की ; क्या है माँ ! तुम क्यों नहीं समझतीं ,पढ़ाई के साथ मन में कुलबुलाते विचारों को भी तो सहारा देना चाहिये। तुम कहती हो लिखो पर वाहियात विषयों पे नहीं . साहित्य समाज का दर्पण है तो मैं उसमे अपने मन को क्यों न देखूं ?
और बैठे बिठाए एक नाजुक सा दिल टूट गया --बाहर पिताजी गुनगुना रहे थे सहगल को '' इस दिल के टुकड़े हजार हुए कोई यहां गिर कोई वहां गिरा '' भीतर मैं उभरती हुई लेखिका ,शायरा ,कवियत्री --रेडिओ पे सुन रही थी --''शामें गम की कसम आज ग़मगीं हैं हम ,आ भी जा आ भी जा आज मेरे सनम '' पर कोई सनम कहीं होता तो आता , गलती माँ की भी नहीं थी -झूठ और कल्पना में प्यार करती लड़की भी रास नहीं आती थी उस वक्त समाज को ,संस्कारों का क्षरण दीखने लगता था ,तो साहेबान '; मैं कमसिन उम्र में ही विरहिणी हो गई। लिखने की आस मरी नहीं ,अब कारवां गुजर गया ,गुबार देखते रहे वाली स्थिति हो गई ,और दिलीप कुमार पसंद आने लगे ,ट्रेजडी किंग।
गोपियों का विरह पढ़ने लगी ,उद्धव के उपदेशात्मक पदों के अर्थ माँ -पिताजी से पूछती तो वो बड़े गर्व से समझाते ,उन्हें क्या मालूम ,ये बिटिया उस अनदेखे ,अनजाने श्याम के विरह में उद्धव को दुश्मन समझती है ,ये उम्र और इतनी शुष्क बातें ! ---
कहते हैं होनहार होके ही रहती है और एक दिन लाइब्रेरी में परसाई जी को पढ़ा। मन बल्लियों उछल गया। अब मिली सही राह। फिर तो परसाई ,शरद जोशी ,श्री लाल जी ,काका ,शैल जी --सभी के साहित्य से गुजरने लगी। ये विधा सभी को स्वीकार्य थी ,लड़की के भटकने का भी डर नही था और आश्चर्य देखिये कबीर भी समझ आने लगे --
जो तू बामन-बमनी जाया। आन द्वार काहे नहिं आया’।,
‘क्या तेरा साहिब बहरा है’,
‘कांकर पाथर जोरि कै मस्जिद लई चुनाय। ता चढ़ि मुल्ला बांगि दे क्या बहरा हुआ खुदाय’---सभी व्यंग मन के फाटक खोलने लगे ! --
पर क्या व्यंग लिखना आसान है , आँख कान हर वक्त खुले रखने पड़ते है ,चौकन्ना रहना पड़ता है ,कब कोई विषय मिल जाये ? हमें लेखिका बनने की छूट थोड़े ही थी ,ये तो केवल सांस्कृतिक कार्यक्रमों में वाहवाही लेने तक लिखने की छूट थी ,वरना तो पढ़ लिख के आफिसर बनो और अच्छे घर में शादी हो जाये ---- फिर व्यंग लेखन में यदि तर्क करने लगो तो बच्चों को कुतर्की कहके चुप करवादो ,कोई नाराज न होजाए तो ऐसा लिखना जो समाज में गलत अर्थ न जाये और इतनी बंदिशें इस उभरती लेखिका का नाजुक मन न सहन कर पाया और इस बार मैंने अपने भीतर की होनहार व्यंग लेखिका को स्वयं ही मार दिया ,किसी पे इल्जाम न आये ,अपनी आकांक्षाओं का गला घोट दो ,यही आम स्त्री है ,जो माँ-पिता ,पती ,बच्चों ,मायके ,ससुराल के लिए अक्सर अपने को भूल जाती है --यही है कहानी अधिकाँश स्न्नारियों की सदियों से सदियों तक।। आभा।।
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Monday, 30 May 2016

                                                  ''  अपनी  बीती  ''
                                                  ============
कैम्पस स्लैकशन  आज  का  ट्रेंड  है | सैंतीस -अड़तीस वर्ष पूर्व  डिग्री  लेने के  पश्चात अखबारों से  या जान-पहचान से  ही मालूम होता था कहाँ मिलेगी नौकरी ,''अपने पैरों पर खड़े होना'' तब भी ''टेढ़ी खीर''  ही  था |MSc के बाद  एक  महीना  घर में  बैठना इतना असहज होगा कभी सोचा भी न था ,ये वही तो घर है जहाँ पंछी  बनी उड़ती रही बचपन से अब तक ,फिर अब क्या हो गया ? शायद सभी को ऐसा ही कुछ अनुभव होता हो |ऐसे में टिहरी कन्या विद्यालय से राजमाता का बुलावा आया ,मैं टीचर बनना नही चाहती थी पर एक महीने में ही सारे  सपने ''गूलर का फूल  ''हो गये थे ,फिर पंतनगर में होमसाइंस  के डिप्लोमा को ठुकरा चुकी थी साइंस पढने के चक्कर में ,इसलिये कोई ''अटकल पच्चू '' नही चलाया और माँ के साथ  आ गयी उत्तरकाशी  से  टिहरी  TGMO की बस में सवार होके | हाय  री किस्मत ;  - महल में इन्टरव्यू होना था  पर  बाहर  ही  एक  आदमी  मिलगया राजमाता का फरमान लिये कि उनकी तबियत अचानक  खराब होने से उन्हें दिल्ली जाना पड़ा ,आज  बिटिया को विद्यालय घुमाया जाये |विद्यालय देखने की जिज्ञासा तो थी ही क्यूंकि कभी मेरी माँ भी यहाँ पढ़ी थीं और शिक्षिका भी रह चुकी थीं ,पर माँ से कहा हम आज ही लौट चलेंगे | बस में तब गेट सिस्ट्म था ,समय से ही बसें  छूटती थीं | इस बीच माँ ने अपने एक रिश्ते के भाई से मुलाकात करवाई ,वो बैंक मैनेजर थे ,लंच का समय था ,जब हम पहुंचे तो खाना खा रहे थे ,केवल एक दाल और रोटी ,बोले मैं कम से कम में गुजारा करता हूँ और जितना भी मेरे पास है  उससे  गरीब बच्चों को पढ़ाता हूँ ,परिवार में भी यही संस्कार हैं  ---वो मेरे जीवन का शुरूआती सबक था जो आज भी फ़ालतू खर्च नही करने देता ,मन पे अंकुश हम स्वयं ही लगा सकते हैं ,खुद खाया तो क्या खाया ,किसी के काम आये यही जिन्दगी ,कहना नही चाहिये पर अपनी कमाई  होने पे एक बच्चे की फीस तो देनी ही है --ये सीख लेकर मैं उठी वहां से और ईश्वर ने साथ  भी दिया संकल्प पूरा करने में |पहाड़ों का जुलाई का महिना --कब  झड़ी लग जाये  -और लो झड़ी लग गयी ,डुंडा तक आते आते  घना अँधेरा घिर आया और स्वाद में सुगंध  की तरह ये खबर कि सड़के बंद हो गयी है ,पहाड़ तीन जगहों पे टूट  चुके है मलबा आ गया  है | यदि आपने कभी पहाड़ी रास्तों में सफर किया हो तो आपको मालूम होगा यहाँ आपको सुविधा के नाम पे सड़क किनारे  चाय की दुकानें  ही  मिलेंगी  वो  भी  अँधेरा घिरते ही बंद हो जाती हैं --अब रात  भर कहाँ रुकें ,कई सारी  बसे  पर महिला यात्री  केवल  हम दो  | हमने निश्चय किया अठारह  मील  जाना  है  --पैदल  चलते  है  | कुछ दूर  तक  सह  यात्री  चले  पर  फिर  बारिश ,अँधेरे और ठंड  ने सभी के  हौसले  पस्त कर दिये | सभी  दुकानों की  बैंच पे बैठ गये | हम दोनों माँ बेटी चलती रहीं ,रात्री  का  अन्धकार  ,सड़क के एक ओर विशालकाय  काला पहाड़ ,दूसरी ओर खाई - नीचे बहती गंगा की सांय-सांय -वो भी बरसात की चढ़ी हुई गंगा ,झींगुरों का शोर ,बारिश की बौछार और  गिरते पत्त्थर --पिछले वर्ष तांबाखानी में पत्थर गिरने से मरे किस्णु की याद  आ रही थी  रह -रह के --लोग कहते हैं वो यहीं घूम रहा है  भूत  बनके ! रात का पक्षी  भी बोल रहा था ,और सड़क पे पड़ा मलबा दिखाई भी नही दे रहा था ,पैर गलत पड़ा तो सीधे गंगा शरण ! पर कहीं कहीं जुगनू भी थे जगमग करते ,जो मन को ढाढस  बंधा रहे थे हम हैं न साथ तुम्हारे --यूँ ही खतरों से खेलते हम ब्रह्ममुहूर्त में सवेरे चार बजे घर के किवाड़ खटखटा रहे थे | पिताजी को लगा इस वक्त  कैसे  आ  सकती  हैं  ये  ,कोई साधन  भी  नही ,बरखा भी तेज ,सड़क भी टूटी हुई ,जरुर बस'' ढंगार '' [खाई ] में  गिर  गयी  होगी ,जरुर  कोई  हादसा  हो गया है  --ये  उन  दोनों का  भूत  आवाज  दे रहा  है  ! और  हमें   देख  वो  अचंभित  रह  गये  खूब  डांट  भी  पड़ी  दुस्साहस के  लिये  पर  ''अंत भला तो  सब  भला ''| कई दिनों तक अस्थि पंजर ढीले  रहे ,हड्डियाँ कीर्तन  करती  रहीं ,पर  मन  प्रसन्न था  मनो  कोई  किला  फतह  किया  था |
जी ये मेरी ही ''आप  बीती '' | हाँ  ! माँ के साथ का  पहला  रोमांचक  अनुभव ,जिसने जीवन के आरम्भ में ही मुझे जीवट दिया ,विजय   ? जी  भूत ,भविष्य वर्तमान तो सब समय ही है ,उसपे और खुद पे भरोसा हो तो विजय ही विजय है ,विजय अपने को पाना ही तो है --हाँ  भूत  मुझे  तब  भी  नही  मिला  और  आज  भी  खोज ही रही  हूँ  --शायद  कभी  मिले  ||आभा||

''आज  मैं  दुःख को वरूँगी '''
-----------------------------
सुख दुःख दोनों मेरे अपने
सुख दुःख की निशा दिवा में
पनपे मेरा यह जीवन
झूम के नाचूं मै मयूर सी
और कभी आंसू  झम झम
हंसी रूदन मेरे संग  यूँ ही
 छाया साथ  ज्यूँ कदम - कदम
पूर्ण  कहाऊं तब  ही  जब
हंसती  रोती सी  दिखती  हूँ
कभी  बादलों  से ओझल चंदा
फिर चंदा से ओझल बादल
  हंसी रुदन मेरे  आंचल में
मैं इनको जीती  प्रति पल
बाबुल  के  आंगन की चिड़िया
नाचे  गाये  ,धूम मचाये
सौरभ  से  भर दे  अंगने  को
उषा  सांझ  की  लाली  बिखराये
प्रिय के नेह पगे आमन्त्रण ने
तारों सी जगमग चूनर पहना दी
कुमकुम   चूर्ण  उड़ा कर पी ने
केसर सा जीवन  महकाया
कैसा  कोमल मृदु स्पंदन
मेरे उर में धड़क रहा यह
मृदुल और हुई कुछ मैं
उदर में नन्ही  परी है ; सुनकर !
पर तुमने ये क्या कुचक्र रचाया
नन्ही  कली सांस न ले पावे
मुझको  ही  बंधक  बनाया ?
तोड़ती  हूँ  मैं  ये  बंधन ,
आज  मैं  दुःख को वरूँगी
 ये सृजन  अब  हक  है  मेरा
राह  कितनी  कंटकित  हों
मैं आज अभिशापों  को  वरूँगी
आज  मैं  विद्रोहिणी -
रो लिया  जितना  था  रोना
पोंछ  आंसू  धारणा की ,
जन्म लेगी बिटिया मेरी
मेरे सर का ताज  होगी ,
मेरे अंगने  के  हिंडोले
पे इसी का राज होगा
नाचती अर खिलखिलाती
जब वो  मुझे अम्मा  कहेगी
दुःख सभी  कपूर  होगें
अश्रु दुःख ज्वाला  हरेंगे  ||आभा ||
टिप्पणी ---हाल  ही  में   दिल्ली  में  दो  दिन  की  बच्ची  को  कोई  फेंक  गया सड़क पे   ,उसी वेदना का स्वर !

















Sunday, 8 May 2016

              ''माँ ''
सुनहरा  अक्षर
तेरी माँ -मेरी माँ -
मेरी माँ की माँ ,मेरे  पिता की माँ -
मैं  भी माँ -वो  भी  माँ--
  शहद  तो  कभी  नीम  सी  माँ  -
हमारे  जैसे  घरों  की  ,घर संभालती माँ -
रिश्तों की  माला  का  धागा -माँ -
आफिस जाती  माँ  --
दूसरे  के  घरों  में  काम  करती  माँ  --
जूठे  बर्तन मांजती -झाड़ू-पोछा  करती माँ -
मजदूरी  करती  माँ ,पत्थर  तोड़ती माँ -
सब्जी-फल ,चाय-पकौड़े  का ठेला लगाती माँ .
खेतों  में काम करती  माँ -
कारखानों ,खदानों  में  काम  करती  माँ -
घर में कोई  भूखा न  रहे - भूख नही है -
कहती माँ -
बच्चों के लिए -अपने को  भूलती माँ -
पिता को संभालती माँ -
लाल बत्ती  ,चौराहों  ,मन्दिरों  में  --
भीख  मांगती  माँ  --
ऐसी  माँ  वैसी  माँ  --
माँ ,आई  ,मम्मी ,मदर ,बई ,ईजा  -
न जाने  कितने  संबोधन  वाली  माँ -
राम की माँ , कृष्ण की माँ -
शहीदों  की  माँ  -
क्या  कहूँ  --
चकलों -जेलों  में   बच्चों  को  -
पढ़ाती  संस्कार  देती  माँ  ---
-माँ माआआआआआआआआआआ--
ॐ  की  भांति  ही  सृजन का  नाद  माँआआआआआआआआआअ
  शत-शत  नमन  -चरण वन्दन  --
या देवी  सर्व भूतेषु मातृ रूपेण संस्थिता ,
नमस्तस्ये नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ||












Saturday, 2 April 2016

और शनिदेव महाराज smile emoticon क्या हालचाल हैं जनाब wink emoticon , जीजनाब ही बोलते हैं न अदालतों में जज को ---क्या सोच रहे थे मीलार्ड ! कृष्ण भक्ति में पत्नी को नैगलैक्ट करके पत्नी के शाप के कारण जीवन भर यूँ ही मुहं नीचा किये बैठे रहोगे और कलयुग में भी पूछ होगी ? महाराज ये तो विज्ञापनों का समय है --यहाँ आप जैसे सज्जन की क्या औकात frown emoticon इसयुग के मीलार्ड -जीजनाब ,आप नही हो महाराज | इतने युगों तक स्त्रियों के साथ भेदभाव हुआ --आपकी पूजा अर्चना के सौभाग्य से वंचित रही हम नारियां ---क्या कहा ---ये भी एक नारी का ही किया धरा है ---तो प्रभु अब आपकी कोई दलील नही , अब तो आधुनिक दंडाधिकारी का फैसला आ चुका , हम स्त्रियाँ अब आपकी चरण वन्दना को बेताब हैं प्रभु ,सदियों की ''400 वर्षों ''की साध है ,संभल के बैठना प्रभु शनि देव | आप ब्लैक हो ,रिष्टपुष्ट हो ,नजर उठा के देख लो तो घायल कर दो --और आप सोचते हो इतने सजीले बांके पुरुष को आज की नारी छोड़ दे devil emoticon ---नही भगवन --- आपतो सर नीचे किये बैठे रहे और जमाना बदल गया ,आज तो सिनेमा के टेढ़े-मेढ़े तिलंगों के पीछे हम स्त्रियाँ हाय-हाय और हाउ स्वीट करती घूमती हैं --अफ्रीकन और नाइजिरियन माडल या गाने वालों पे चिल्ला चिल्लाके आई लव यू माईबन,माईहनी,माईबीयू,जैसेउटपटांग शब्दों का उच्चारण करके पगलैट होके चीखती रहती हैं upset emoticon तो आप जैसे विशुद्ध देसी -संस्कारी -विनयशील और स्त्रियों का सम्मान करने वाले ब्लैक ,हॉट ,वाओ और माफ़ करना भगवन unsure emoticon आज की भाषा में हॉट& स्वीट--खालिस मर्द को हमारी जाती कैसे छोड़ सकती है heart emoticon ,हमतो अब बच्चों के लिये भी हॉट&स्वीट टमाटरचटनी[सौस] लाती हैं प्रभु |
*** तो प्रभु ,कुछ ही समय बचा है इस सदियों की बिछुडन से निज़ात पाने का ---शनि देव महाराज आपके चरणों को हम स्त्रियाँ न पखार पायें --आपको तैल स्नान न करवा पायें तो इन दूसरी जाती के [पुरुष] लोगों ने वहां पे अपने जाने पे भी रोक लगादी tongue emoticon ---अब देखो भगवन ---पर अधिक दिनों की बात नही है --ये दूरी बहुत शीघ्र मिटेगी ,और आपको भी सर नीचे करके नही बैठना पड़ेगा --क्यूँ ! जी प्रभु देखोन दंडदेने का विधान तो तुम्हारा पर आज का मुकदमा आप पे ही --जी जनाब फैसला सुना चुके है ------- वैसे मुझे एक बात पूछनी थी प्रभु ,ये रोक स्त्रियों पे थी क्यूँ --आपको भी नही पता ---- grin emoticon --चलो कोई बात नही ---भारत माता की जय ,वन्देमातरम ----

Monday, 28 March 2016



खाली समय और बैठे ठाले ---मन के लड्डू खाना-----
श्रीमद्भागवतगीता,पराशरगीता,अनुगीता,मंकीगीता ,अष्टावक्रगीता, रामगीता---और भी कई ऋषि -महात्माओं केप्रवचन गीता रूप में ,और इनमें से अधिकतर का महाभारत के ही विभिन्न पर्वों में उल्लेख है | कुछ मैंने पढ़ीं हैं कुछ अभी मेरे सामने प्रकट नही हुयीं | पर जब एक सबसे छोटी गीता--कामगीता ; जिसमें श्रीकृष्ण ममता को त्यागने को ही सबसे महत्वपूर्ण बताते हैं ; का दर्शन हुआ --महाभारत परायण के वक्त तो जैसे मन को मजबूती मिली और मिली एक नई दिशा -------------------
भीष्म को जलांजलि देने के पश्चात ,धृतराष्ट्र शोक से व्याकुल होगये--बाकी सारे कार्य करने का भार युधिष्ठर पे डाल दिया ये कह के कि शोक तो केवल मेरा और गांधारी का है --तुम तो अब अपने भाइयों और सुह्रिद्यों केसाथ मनोवांछित फल भोगो --बस ये व्यंग भरे वचन सुनके युधिष्ठर भी ग्लानिर्भवति वाली स्टेज में आगये --शायद धृतराष्ट्र यही चाहते थे ,वो पांडवों को अब भी प्रसन्न नही देख पा रहे थे और इसी लिए उन्होंने सबसे कमजोर कड़ी युधिष्ठर पे शब्द बाण चलाए |
युधिष्ठर ग्लानि से भर उठे , वो अपने को सभी गुरुजनों , बन्धु-बांधवों का कातिल समझने लगे तथा राजा बनने की जगह संन्यास लेने की जिद पे अड़ गये --तब कृष्ण ने जैसे अर्जुन को युद्ध में गीतोपदेश दिया था वैसे ही युधिष्ठर को भी --कामगीता का उपदेश दिया ---बहुत छोटी सी गीता --पर जीने के लिये बहुत महत्वपूर्ण--यदि इसके सार को जान लें तो जीवन ही कृष्णमय हो जाये ---
एक दो श्लोक सभी की नजर --कहते हैं कुछ भी अच्छा मिले तो बांटने में कोताही नही करनी चाहिये---तो निज के जीवन में उतारने की कोशिस के साथ आज लिखने की भी धृष्टता--
----जब युधिष्ठर मरे हुए सम्बन्धियों के शोक में संतप्त होकर विलाप करने लगे तो कई धर्म को जानने वाले तत्ववेदा मुनियों ने उन्हें उपदेश दिए पर युधिष्ठर को तो धृतराष्ट्र के शब्दों ने मोह लिया था , वो मरने वालों के लिये विलाप किये जा रहे थे तथा समस्त कामनाओं से मुक्त होके संन्यास धारण की जिद लगा बैठे थे |अंत में व्यासजी ने भी हाथ खड़े कर दिए तथा उनको कहना पड़ा--युधिष्ठर-तुम दुर्बुद्धि और श्रद्धा विहीन हो गये हो --अब कृष्ण ने मोर्चा संभाला और बोले---
--''अत्र गाथा: कामगीता कीर्तयन्ति पुराविदा |''
प्राचीन लोग एक गाथा कहते है --जो कामगीता है और जिसे काम ने ही स्वयं को नष्ट करने के लिए सुनाया है --उसे सुनो ---
''यो मां प्रयतते हन्तुं ज्ञात्वा प्रहरणे बलम् |
तस्य तस्मिन् प्रहरणे पुन:प्रादुर्भवाम्यहम् ||''---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
''यो मां प्रयतते हन्तुं धृत्या सत्य पराक्रम |
भावो भावामि तस्याहं स च मां नावबुध्यते ||''
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-----------------------------------------काम कह रहे है --मुझे अस्त्र से मारोगे तो मैं तुम्हारी बुद्धि में अस्त्र चलाने की और नये नये अस्त्रों की कामना बन के बैठ जाऊँगा ,मुझे धैर्य से मारना चाहोगे तो मैं तुम्हारे भावों में घुलमिल जाऊँगा और तुम कब धैर्य धारण करने वाली बुद्धि की कामना करने लगोगे तुम्हें ,पता ही नही चलेगा | जो मुझे वेद-शास्त्र का स्वाध्याय करके मिटाने काप्रयास करता है ,मैं उसके मन में
'' स्थावरेषिवव भूतात्मातस्य प्रादुर्भ्वाम्यहम् ''
प्राणियों में जीवात्मा की तरह प्रकट होता हूँ | जो कठोर तपस्या करके मुझे मिटाने की कोशिस करता है --मैं उसकी तपस्या की कामना बन तपस्या में ही पैदा हो जाता हूँ |
''ततस्तपसि तस्याथ पुन: प्रादुर्भवाम्यहम् || ''
और तो और जो मोक्ष का सहारा लेके मेरे विनाश का प्रयत्न करता है --वह भी अपनी मोक्षविषयक आसक्ति से ही बंधा हुआ है --और उसके मोक्ष के विचार पे मुझे हंसी आती है और मैं ख़ुशी से नाचनेलगता हूँ --
-''तस्य मोक्षरतिस्थस्य नरित्यामि च हसामि च''||---
मैं काम [ कामना किसी भी रूप में] हीएकमात्र अवध्य एवं सदा रहने वाला हूँ --जो मरने पे भी साथ जाता हूँ ----मरे हुए लोगों की कामना से कुछ हासिल नही होगा | यहाँ धरा पे रह गये लोगों को उन चले गये लोगों की प्रतिष्ठा और कीर्ति बढ़ाने का यत्न करना चाहिये ,यहीसच्ची श्रद्धांजली है --
तो तुमतो अपने इस ''काम'' को प्रजा के हित में किये जाने वाले यज्ञों में लगा दो ,ऐसे यज्ञ करो जिनसे दीन-दुखियों को लाभ हो ,यश कीर्ति बढ़े ,किसी की हानि न हो ,समाज में पुण्य बढ़ें ,इसीसे ,तुम्हारी व् तुम्हारे पुरखों की भी यश कीर्ति बढ़ेगी और तुम शुभ कामना को लेकर इह लोक से परलोक गमन करोगे --
-'' त्स्मात्त्वम्पी तं कामं यग्यैर्विवधदक्षिनै: |
धर्मे कुरु महाराज तत्र ते स भविष्यति'' ||---
अपने काम को धर्म में लगाओ --धर्म ! केवल पूजा-पाठ संध्या-उपासना वाला नही अपितु कर्म करने वाला बुद्धि और विवेक से किया गया कर्म जिसमे समष्टि का लाभ हो --
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कृष्ण ने जीवनके हर पल के लिये उपदेश दिए | जीवन संग्राम में जब भी हम हारा हुआ महसूस करते हैं कृष्ण खड़े रहते हैं आस-पास ,दिलासा भी देते हैं और आगे केलिए तैयार भी करते हैं--निर्भर हमपे करता है क्या हम उन्हें सुनपाते हैं,देख पाते है ! कोशिस तो करनी ही होगी | ----- निठ्ल्ला चिन्तन आभा का ----

Thursday, 24 March 2016

 होली के अनोखे रंग ]
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टोली हुरियारों की आई
चलो चलें खेलें होली
रंग उधर मेज पे सारे
 मन -भावे का रंग चुन लें
रंग गुलाल से क्या होगा
ये भ्रष्टाचार का रंग चुनो
गर इस रंग में रंग जाओगे
नाती-पोते भी तर जायेंगे
साम्प्रदायिकता नाम है इसका
ये लाल हरा जो चमक रहा 
सेक्युलर तो टेसू सा छाया
वोट बहुत दिलवाता है
नेतागिरी चमकाता है
चाहते यदि नेता बनना
तो इससे ही होली खेलो
झूठ ,फरेब और धोखेबाजी
ये रंग थोड़े सस्ते हैं
आम आदमी चाहे इनको
महंगाई में भी ले सकता है
भौजी जो रंग तुमने है उठाया
नाम इसका नेता है
एक बार इसको लगवालो
फिर देखो कैसे---
 गिरगिट सा रंग बदलता है
और एक रंग इस जैसा ही
सफेद खून कहलाता है
चमचों और चालबाजों पे
ये रंग खूब सुहाता है
आतंकवादी का कहते हैं ,
कोई रंग नहीं होता 
पर हर आतंकवादी 
धानी धरती को लाल कर जाता है
पर भूख गरीबी के रंगों में 
रंग ,आओ मिल होली खेलें
टोली हुरियारों की आई
चलो -चलो होली खेलें .......आभा ....
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