Friday, 16 September 2016



न जाने क्यूँ मुझे लग रहा है मैं बारहसींगा बन गयी हूँ ....कई सारे सींग सर पे एक -साथ उग आये है . कितने सींग,और हर एक के सिरे पे एक दिमाग और उतनी ही आँखें ...कई उलझनों को एक साथ सुलझाता दिमाग और लक्ष्य को देखती आँखें...परेशानियां आदमी को बारहसींगा ही बना देता हैं .. परेशानी के जंगल में भटकते हुए कहीं से भी असावधानी हुई तो दुर्घटना घटी यानी उलझ जाओ बेचारे बारहसींगा के सींगों की मानिंद उलझनों के जंगल में .... मारीच विद्वान् था शायद इसी लिए सोनेका बारहसींगा नहीं बना ! क्यापूछते हो क्यूँ ? अरे भई फिर तो खुद ही उलझ जाता न ! जंगल में राम को बहुत दूर न ले जा पाता,,,फिर सीता -हरण भी न होता और सुंदर -कांड भी न होता ,,,सबसे बड़ी बात हम कलयुग वासियों के संबल हनुमानजी भी न होते तो जब हम डरते तो क्या करते ?और .....बूढ़ भये ,बलि ,मेरिहि बार ,की हारि परे बहुते नत पाले || ....किसे उलाहना देते ... हर घटना की और हर पात्र की अपनी एक अहमियत है तो शायद मैं जो ये अपने को बारहसींगा समझने लगी हूँ इसकी भी कोई न कोई अहमियत तो होगी ही .....पर काश मैं सोने का मृग होती ..इतने सारे सींगों पे उग -आयीं आँखें और दिमाग ओरिजनल पे भारी तो न पड़ते . कुछ नहीं बस सर पे थोडा सा दर्द था .....आभा .........
खाना पकाना और खिलाना |आज जब ये मायें और पत्नियाँ काम करने बाहर भी निकल चुकी है -तब भी व्रत पूरी निष्ठा और अनुष्ठान से करती हैं | बेटे के लिए व्रत जब वो शादी के बाद माँ को भूल चुका हो | उस पति के लिए व्रत जो उसे शराब पी के रोज नारकीय जिन्दगी जीने को मजबूर करता हो और रोज कम से कम एक बार अवश्य मूर्खा घोषित करता हो | हर व्रत की कई आंचलिक कहानियाँ और अलग अलग विधियाँ जो चाहे अपनाओ पर संकेत एक ही जिस स्त्री का व्रत टूटा उसके पति- पुत्र और परिवार पे भयानक संकट ! कितना ही आधुनिक हो जाएँ हम और कितना ही पढ़-लिख लें पर इन व्रत-उपासनाओं को छोड़ ही नहीं पाती हैं |शायद परिवार की खुशहाली ही सबसे बड़ी ख़ुशी होती है स्त्रियों के लिये और यही भावना उर्जा भी देती है इन सब अनुष्ठानों को निबाहने की , वरना उम्र तो इन्सान लिखवा के आया है सभी को भान है |
आज जीवितपुत्रिका व्रत है जो आश्विन कृष्णा अष्टमी को पड़ता है ,कई कहानियाँ और कई विधियाँ मनाने की | सुबह सरगी पारायण ,फिर निर्जल व्रत, दूसरे दिन मुहूर्त पड़ने पर व्रत पारायण | एक बात जो मुझे आज ही पता चली कि बनारस में या यूँ कहिये पूरब में इस जियुतिया व्रत के लिए स्त्रियाँ दाहिने हाथ की चूड़ियाँ अनन्तचतुर्दशी के दिन ही निकाल देती है ,नहीं तो पुत्र के प्राण संकट में पड़ जायेंगे , और आश्चर्य ये कि मेरी मेड ने भी चूड़ियाँ उतार दीं और कई प्रोफेसरस की पत्नियों ने भी | यहाँ तक कि एक तो खुद भी डाक्टर हैं |वो स्त्रियाँ जो चूड़ी न पहनने को अपशकुन मानती हैं ,पुत्र की लम्बी उम्र के लिए उन्हें उतारने में भी संकोच नहीं करतीं और इस सारी कवायद से मेरा मकसद भी यही है की पुत्र जब अपनी जिन्दगी में आगे बढ़ गया तो उसके पास माँ के लिए समय नहीं होता है ,रोज फोन पे आवाज सुनने को तरसती माँ को ये कहा जाता है की क्या बात करूँ रोज की रोज | मैं कई माओं को देख रही हूँ जो कई कई दिनों तक बच्चों से बात न होने के कारण बीमार रहने लगीं है ,पर आज भी हर व्रत कर रही हैं चाहे पति के लिए हो या बच्चों के लिए और यही ममतामयी माँ- स्त्री- बेटी -बहन , दोयम दर्जे की नागरिक है और उसके अहसासों को समझने का समय किसी के पास नहीं है चाहे वो एक मेड है या डाक्टर या टीचर ---वो परिवार की खुशहाली के नाम पे अपनी आहुति देती रहेगी क्यूंकि वो धरती है सृजन का दर्द सहने वाली |आभा |
श्राद्ध पक्ष का एक स्वरूप ये भी --सांझी --एक लुप्त होती जा रही परम्परा।
भाद्रपक्ष की पूर्णिमा से १६ दिनों का उत्सव सांझी का। जब सारे मंगल कार्य ,खरीददारी ,शकुनों के गाने बजाने बंद हों। कुवारी कन्याओं द्वारा मनायेजाने वाला त्यौहार ,''सांझी ''अपनी अलग ही रंगीनी लेके आता है। हरियाणा ,यू पी ,उत्तराखंड के कुछ भागों में ,बुंदेलखंड ,मालवा ,महाराष्ट्र के कुछ भागों में और राधा रानी की ब्रज भूमी में सांझी खेली जाती है। कुवारी कन्याएं गोबर से दीवाल लीपती हैं और फिर उसमे रंगों से सांझी देवी की मूर्ति बनाती हैं। कन्याओं की प्रतियोगिता भी रखी जाती है जिसकी सांझी सबसे अच्छी होगी उसको पुरूस्कार। लडकिया फूल ,किनारी ,गोटा ,सितारे ,कुमकुम ,कौड़ियां ,कांच के रंगबिरंगे टुकड़े ,लाल पीली चमकीली पन्नियाँ ,बिंदियाँ मोर पंख ,आदि जिसके पास जो भी सजावट का सामान हो उससे सांझी देवी को सजाती हैं ,गेरू ,दाल की पीठी ,रोली हल्दी ,रंग ,सभी प्रयोग में लाती है सांझी के साथ ,दही हांड़ी ,माला ,मोर ,घोडा ,बिंदी ,हाथी ,स्वस्तिक ,ॐ जैसे और कई चित्र भी उकेरे जाते हैं और दीवार पे एक बड़ा सा कोलार्ज बन जाता है।
एकम को सांझी ,दूज को बिजौला ,तीज को तराजू ,चौथ को चौपड़ ,पंचम को पांच कुंवारे ,सातम को स्वस्तिक ,आठम को आठ पंखुड़ियों वाला फूल ,नवमी को डोकरा डोकरी ,दशमी को पंखा ,ग्यारस को किलकोट ,और फिर अमावस तक किला कोट की साजसज्जा ----कंगूरे ,बेलें ,ढल तलवार ,बैलगाड़ी ,घुड़सवार ,चाँद -सूरज ,कंगन ,बूंदे ,हार पाजेब ,लड्डू ,फल ,सब्जी ----अंगड़ाई लेते कुंवारे मन की साजसज्जा का त्यौहार। कन्याओं की भावनाओं को वाणी देता है ---संध्या समय सांझी देवी की आरती होती है। कन्याएं छेद वाली मटकी में दीप जलाती हैं ,इसे झाँझी कहते है जिसकी शोभा संध्या समय देखते ही बनती है। और फिर गान मुहल्ले की कन्याओं का समूह गान नृत्य।
असल में सांझी एक बाल लोकोत्सव है। कन्या संरक्षण और संवर्धन से भी जुड़ा है ये त्यौहार।
पितृपक्ष में कन्याओं के महत्व को बताते हुए फिर ही नवरात्रि आती है। लोक संस्कृति ----बाल सुलभ रचनात्मक प्रवृतियों का पारम्परिक मूर्त रूप ले लेती है सांझी में --आपके घर में कन्याएं होंगी तबही सांझी की रंगीनी बिखरेगी। आज हरियाणा में लिंग अनुपात सबसे कम है वहां कभी सांझी बड़ी धूमधाम से मनाया जाता था।
ब्रज में तो ये राधा कृष्ण के रास का त्यौहार भी है ,साँझ को जब कृष्ण गैया चराके लौटते थे तो सभी गोपियाँ अपने गली द्वार सजा देतीं थी। आज भी ब्रज में मंदिरों में प्रतिदिन आश्विन प्रतिपदा से अमावस तक सांझी सजती है।
साँझा के कई लोक गीत हैं। अपनी अपनी जगह के अपने अपने लोक गीत। ---सूरदास की सांझी ----''श्यामा संग रंग सो राधे ,रचना रची सुहाई।
सेवा कुञ्ज सुहावनी किन्ही ,लता पता छवि पायी।
मरकट मोर चकोर कोकिला ,लागत परमसुखराई।
----चित्र विचित्र बनाव के चुनि -चुनि फूले फूल ,
सांझी खेलहिं मिल जुल सखी सब ,नव जीवन समतूल।
----खेल खेल में कलात्मक गतिविधियों द्वारा बच्चों को कैसे संस्कारित करना यह लोक समुदाय अच्छी तरह समझता था। शायद तभी कुछ ऐसे अवसर जुटायें गये जिन पर बालक बालिकायें अपनी सृजनात्मक प्रवृत्तियों को तुष्ट भी कर सकें और उन्हें अपनी परम्पओं का भान भी हो सके।
सांझी तेरे फूल
पचासी तेरे डोढ़ा
मोरे भैया गोरे
बुन्देल भैया गोरे
भइयाजी की पीढरी
बेलना अनबेली
भाभी जी के नैन
क झकझोरे
भाभी की गोद भतीजो सोके
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सेंझी के आस पास रहे चमली को झूला
मेरी मां जशोधा पटिया पारे
भाभज मांग संवारे
पैरोतुम पेरो मोमबत्ती बाई जीना
तेरे बाप बडेन ने बैठे गढाए
भैयन ने पेहराए
बार बार में मोती गाए लए
सिन्दूर भर लई मांग
से घाला के आसे पासे रहे चमेली कोझूला----------------------
पौराणिक कथाओं में ब्रह्मा के मानस पुत्र पीललम ऋषि की पत्नी 'सांझी' थी, जिसे मां दुर्गा भी कहते हैं। सांजी, संजा, संइया और सांझी जैसे भिन्न-भिन्न प्रचलित नाम अपने शुद्ध रूप में संध्या शब्द के द्योतक हैं।
एक लोक मान्यता के अनुसार- 'सांझी' सभी की 'सांझी देवी' मानी जाती है। संध्या के समय कुंआरी कन्याओं द्वारा इसकी पूजा-अर्चना की जाती है। संभवतः इसी कारण इस देवी का नाम 'सांझी' पड़ा है।---------अब धीरे धीरे ये लोक त्यौहार विलुप्ति के कगार पे है। एक तो अब बच्चों के पास समय ही नहीं है। फिर गोबर मिटटी भी कहां उपलब्ध है शहरों में ,लेकिन कुछ मंदिरों या घरों को छोड़ दें तो गाँवों में भी अब सांझी देवी नहीं बिठाई जाती।
गौ वंश का संवर्धन ,कन्या का महत्व,बालसुलभ रचनात्मकता को खेल खेल में मूर्त रूप देना ,छोटे छोटे गाने लिखना और गाना --कितना कुछ तो है इस त्यौहार में --क्या साँझा देवी की पुनर्स्थापना --सांझे रूप में नहीं हो सकती।
मेरी माँ दीपावली में बनाती थी ये सब चित्र ,गेरू से लेप के दीवारों को ,चावल की पीठी से संझा देवी और उसके चाण -बाण। पर अब हम बाजार कागज की खरीद लाते हैं और उसी पूजन में थक जाते हैं ,हम प्रगतिशील हो चले हैं आधुनिक ------
------आज माँ से बनवाई हुई संझा देवी की तस्वीर [जो अपने लिए बनवाई थी ,ताकि जब मैं बनाऊं तो गड़बड़ न हो [मिल गयी तो यादें ताजा हो गयीं

Thursday, 15 September 2016

 गणपति विसर्जन की शुभकामनायें --मोरिया रे बप्पा मोरिया रे ---

अगले बरस तू जल्दी आ ---- गणेश बैठे हैं  स्वर्ग में ,अपनी प्रतिकृतियों का विसर्जन देख रहे हैं --सोच रहे हैं इंसान  भी क्या  है ,हर तरह की मूर्ति बना डाली। घास -फूस, सब्जी- फल , दाल -मसाले ,हीरे -जवाहरात और न जाने क्या -क्या। श्रद्धा  की बयार  बह रही  है  धरती पे --रंग-गुलाल उड़ाते ,नाचते गाते अगले बरस तू जल्दी आ बोलते भक्त। बप्पा सोचने लगे जल्दी कैसे आऊंगा , भादों सुदी गणेश चतुर्थी तक तो प्रतीक्षा करनी ही पड़ेगी ,पर भक्त का क्या है वो तो कुछ  भी  मांग सकता है , अब कल से अनन्त भगवान का धागा बंधेगा तो सब उनसे मांगने लगेंगे ,चलो कुछ दिन लम्बी तान के सोऊंगा ,पर फिर सोचा -- गणपति तुझे चैन कहाँ ,ब्रह्मा विष्णु महेश , देवी ,पितृ कोई भी पूजे जाएँ ,पहल तो गौरा के गणेश से ही होगी --चाहे मूर्ति का हो ,तस्वीर हो  ,गोबर या  सुपारी का हो --मुझे तो  रहना ही होगा और फिर खुद ही बड़बड़ाये --''क्या जरूरत थी कार्तिकेय से जीतने की --अब वो  आराम से  रहते  है  सरकारी कर्मचारी  की  तरह  और  मैं --मल्टीनेशनल कम्पनी के एम्प्लॉय की तरह ट्वेंटीफोर इंटु सैवन  काम कर  रहा  हूँ।  ----और दनदनाती  हुई माँ गौरा का प्रवेश ,माँ बहुत गुस्से में है --गणपति घबरा  ही  गये ,माँ तो कभी इतने गुस्से  में  नही  रहतीं  ---क्या  हुआ  मम्मा , किसी ने कुछ कह दिया ? ---
बेटा तूने देखा नही इंसान ने चॉकलेट के गणपति बनाये हैं ?
हाँ माँ मैं यही देख रहा हूँ तब से --आज तो विसर्जन भी है ,देख मेरी कितनी रंग बिरंगी मूर्तियां है।
हाँ देख रही हूँ ,मूर्ति  और पूजा  से  अधिक  पूजा  करने  कौन  बड़ा सेलिब्रिटी  आया  और  किसने  कितना  चढ़ावा चढ़ाया इसपे निगाह है।
जिस मूर्ति पे बड़े लोग जा  रहे  हैं  उसकी  ज्यादा  पूछ  है  --ये  समाज  को  एकसूत्र में  पिरोने  का  उत्सव  था  पर  अब  हर  गली  मुहल्ले  के  अपने  गणपति  हो  गये ---ये  मानव  जो  न  करे  वो  कम  --केवल  फायदा  नुक्सान  सोचता  है  और पूजा  भी  इसीलिये करता  है।
गणपति  बोले  कोई  बात  नही  माँ कुछ  तो  इनमें  सच्चे  भक्त  भी  हैं  और  फिर  इस  पखवाड़े  में  ही  सही  ,कुछ  लोग  तो  नियम  से  चले  ---इतने  ही  लोग  काफी  हैं  समरसता  के  लिये ,ये  धर्म  का  ह्रास  न  होने  देंगे --पर  ये  तो  आपके  क्रोध  का  कारण  नही  हो  सकता।  अब  माँ को याद  आया  वो  तो  क्रोधित  थीं ,बोलीं --बेटे  इसलिये  ही  तो  तुम प्रथम-पूज्य  हो  ,अपनी बुद्धि  और  चातुर्य  से  मेरा  क्रोध  हर  लिया  ---
और  फिर  बोलीं --ये  मानव  सारी  सृष्टि  को  तहस  -नहस  कर  दिया। लालच  और  सुविधाओं  को  छोड़ने  को  तैयार  नही  और  गो ग्रीन , पॉल्यूशन फ्री , इकोफ्रैंडली के नाम पे उटपटांग  करतब  करने लगता  है  --अब बर्दाश्त  के  बाहर  हो  गया  है।
गणेश ने  पूछा --माँ बताओ तो क्या हुआ ?
 ----तुम्हें तो पता है  किसी मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा  जब होती है तो देवता अपना अंश उसमे स्थापित करते हैं --इस मूर्ति  को  जीवित  मान के  ही  उसकी  पूजा  अर्चना ,प्रसाद ,शयन सब  होता  है  ---जहां ये  सदैव  नही  हो सकता  --वहां  सकाम संकल्प ले के ,अल्पावधि  के  लिए  ही प्राणप्रतिष्ठा  होती  है  --जैसे  गणपति  या दुर्गा पूजन में ---- और एक निश्चित अवधि के बाद मूर्ति विसर्जन होता है।
है माँ मैं ये जानता  हूँ  ---पर  क्रोधित क्यूँ हो आप ?
 देख लाला --तालाबों में या कृत्रिम तालाबो  में विसर्जन  तो  ठीक  है ,वो सब  भूमि  में  मिल जाएगा  --पर ये  चॉकलेट  के  गणपति  बना  के  ,उसे  दूध  में  घोल के  गरीबों  को  पिला दो  ---क्या  आधुनिकता  की  होड़  में  या  अलग  कहलाने  की  ललक  में  ये  मानव  ये  भूल  गया  कि गणपति  की   इतने  दिनों  तक  तुमने  घर के  सदस्य  की  तरह  देख भाल  की  है  --उसे  घोल  के पी  जाओ ---जिसे  इतने  दिनों  तक  चेतन  माना  हो  उसे  घोल  के  पी  जाओ  --- काश  इन आधुनिक  कहलाने  वाले  लोगों  से  कोई  कहे  --गरीबों  को  चॉकलेट  का  दूध  पिलाना  है  तो  रोज  पिलाओ  न  भई ,ये  मेरे लाला  के  अंश  के  साथ  क्यूँ तमाशा  कर  रहे  हो  ---
इकोफ्रैंडली के लिए पेड़ लगाओ ,सुविधाओं को कम करो ,दिन में दो घण्टे ही सही ,बिना AC के रहो ,कुछ  देर पैदल चलो ,मांस मदिरा का सेवन कम करो ,और भी कई  तरीके  हैं  पॉल्यूशन कम करने के --- ये संस्कारों  के  साथ  खिलवाड़  न  करो  ----  मन्त्रों  में  शक्ति  होती  है  उसे  समझो ,प्राणप्रतिष्ठा  की  हुई  मूर्ति  को  घोल  के  पीना  याने  ---अपने  परिवार  के  सदस्य  का भक्षण  करना  ---हे  मानव  अलग  दिखने  की चाहत  में  न  स्वयं  के  लिए  न  दूसरे  के  लिए  मुसीबतें  बुला ---
सबसे  सुंदर   तो वो  दृश्य  होगा जब  एक  जगह  के  लोग  मिलजुल  के  गणपति  की  मिटटी  की  मूरत  बनाएंगे  ---उसके  विसर्जन  से  न  पॉल्यूशन  होगा  न  गन्दगी फैलेगी।
गणपति समझ चुके थे ये माँ का प्यार  बोल  रहा  है  --माँ  को  समझाते  हुए  बोले  ---माँ  ये  कलयुग  है  --दिखावे  का  युग  ,यहां  कुछ  भी  हो  सकता  है  ---- -












Wednesday, 14 September 2016

हर रोज हो हिंदी दिवस ----

हिंदी -------मेरी भारत माँ के  माथे की बिंदी , सुंदर ,चटकीली ,इंद्रधनुध की रंगत वाली ,उषा -प्रत्युषा के आँचल  में बिखरे रंगों को समेटे और अधिक गहरी  हो गयी है रंगत जिसकी ---ऐसी  है  वो  हिंदी  मेरी भारत माँ के  माथे  की बिंदी।
वहै मुसक्यानि, वहै मृदु बतरानि, वहै
लड़कीली बानि आनि उर मैं अरति है।
वहै गति लैन औ बजावनि ललित बैन,
वहै हँसि दैन, हियरा तें न टरति है।------------  
हियरा  में  लागि ज्यूँ  कटार --बस यूँ  ही   समाई  है हिंदी   भारतीयों  की  आत्मा  में  अपनी  बड़ी  बहन  संस्कृत  के  साथ  ---सर्जरी  करो  तो  भी  न  निकलेगी  ०००। 
संस्कृत  जब  कठिन  लगी  तो  वो  प्राकृत  में  ढली  पर  वो  लोच  न  आयी  तो  हिंदी  में  ढली। हिंदी ; इसने  तो  सनातनी  बड़े-बूढ़ों  की  तरह  सभी  बाहरी भाषाओं  को  अपना  लिया।  प्रांतीय भाषाओं  में  आज  कुछ  हिंदी  से  प्रभावित  हैं  कुछ  संस्कृत  से। 
क्षेत्रीय एवं प्रांतीय भाषाएँ , हिंदी  की  सहेलियां  हैं  ,
उसके  आँचल  में  टँके हुए  रंगबिरंगे सितारे  है। 
अवधि, ब्रज, भोजपुर ,कौरवी ,गढ़वाली ,तमिल तेलगु कन्नड़ ,बंगला 
असमी पंजाबी ,गुजराती  मराठी ,कुमाउनी ,आदि  भाषा -बोलियां , कई  सहेलियां  है  हिंदी  की। 
अब तो अंग्रेजी भी  सहेली बन गयी है।
और उर्दू वो तो छोटी बहन  ही है ,
बस इसीलिये है हिंदी ,
मेरी माँ के माथे की बिंदी ,
  मेरे भारत  के  गौरवशाली मस्तक का ,टीका।  
इसे क्षेत्रीयता  या  क्षेत्रीय  भाषाओं से नही                    

केवल और केवल वोट के लालची ,नेताओं से खतरा  है  ---अन्य प्रांतीय और  क्षेत्रीय भाषाएँ तो 
तरह तरह की रंग बिरंगी बिंदियां है।जैसे  हर पोशाक के लिये उससे मिलती जुलती बिंदी वैसे ही हर क्षेत्र के लिये एक बोली उस क्षेत्र की मिठास और रंगीनी को जज्ब करती हुई। हिंदी भाषी लोग और क्षेत्रीय जनता जाने कब  ये  समझेगी  --
ये एक दिनी सम्मान ,हिंदी के  महत्व के लिए नही 
हिंदी बोलने वालों को  बहकाने  के  लिए  है। 
काश  हम  अपनी माँ के माथे  से  बिंदी  कभी न मिटने दें। 
पर  रूढियां ---
हिंदी दिवस तो तबही जब हिंदी राष्ट्र को एक सूत्र  में  पिरोने  वाली  बड़ी बहन का रूप लेगी ,तथा अन्य भाषाएँ  उसके  झंडे तले  फलेफूलेंगी। 
वन्दनीय हो जन जन की ,
जगमगाये जीवन  में  हिंदी  
हर रंग  इसका न्यारा  
हर  आकार  इसका प्यारा  
पूरब  से  पच्छम तक 
उत्तर से  दक्खन तक ,
हर  भाषा  में  रंग  हो  इसका  
हर  भाषा  इसकी  सहोदरी।     -----



Sunday, 11 September 2016

एक पुरानी पोस्ट  --लिख के  भूल गयी और राक्षसों का भी वर्णन करने की बात  थी  --याद  आ गया  अब पढ़ के ---अब  तो  हमारे  भीतर  का  राक्षस  ही  बलवान  होता  जा  रहा  है  --उसकी  तुलना  ही  कुछ  के  साथ  करूँगी  ---

बैठे ठाले --------
कहते हैं खाली दिमाग शैतान का घर। अरे नहीं ,दिमाग है बाबू ;ऊँचे निर्वात पहाड़ों में भी कुछ न कुछ वायु तो होती ही है ,चाहे कम दबाव का क्षेत्र ही क्यों न हो पर शून्य नहीं होता ----
जी; तो आज इस कम वायु के दबाव वाले हिमालय प्रदेश को त्रिकुट पर्वत [लंका वाले ]घूमने का शौक चर्राया। यूँ ही नहीं ,वरन मेरी नित्य रामचरित मानस के पाठ में लंका कांड चल रहा है। पाठ के बाद मैं समय मिलने पे क्षेपक कथाएँ भी पढ़ लेती हूँ। बस कई दिनों से राक्षस जाती पे मंथन चल रहा था। राक्षस ! शब्द से ही हमारे मन में काला -भुरंड ,दुष्ट पापी व्यक्ति की तस्वीर बनती है पर यकीन मानिये ऐसा है नहीं। यदि केवल तुलसी और वाल्मीकि रावण को ही आधार बनाया जाये तो भी ये स्पष्ट है कि राक्षस जाती शिव भक्त ,संस्कारित ,उच्च शिक्षा प्राप्त और सुंदरता से परिपूर्ण थी। इसकी स्त्रियां विदुषी ,ईश्वर भक्त थीं और परिवार की रीढ़ होती थीं। संस्कृति ,धर्म ,ज्ञान ,विज्ञान ,कला ,संगीत, युद्ध कौशल ,सर्वगुण संपन्न जाती थी ये जिससे मनुष्य तो क्या देवता भी ईर्ष्या करते थे। मंदोदरी ,सुलोचना ,बिन्दुमति ,त्रिजटा ,लंकिनी ,सुरसा ये सभी परम विदुषी और ब्रह्म ज्ञानी स्त्रियां थी। इन्होने रावण ,मेघनाथ ,नरान्तक सभी को समझाने की भरसक कोशिश की --पर कहते हैं न कि स्त्री ही धर्म को सँभालने वाली होती है लेकिन जब पुरुष से धर्म ही लोप हो जाए तो वो किसे संभाले ---तो यही थी वो राक्षसी प्रवृति धर्म का लोप। भक्ष -अभक्ष्य खाने और रोज के मदिरा पान से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती थी ,जब तक स्त्रियां सम्भालतीं पुन: मदिरा पान और मांस का सेवन होता ,उच्च कोटि की जाती तो थी ही अहंकार ,मद ,क्रोध क्रूरता जैसे दुर्गुणों ने घेर लिया। वरना तो जब कुम्भकर्ण को उठाने गया रावण युद्ध के समय तो उसने रावण को खूब लताड़ा कि उसने जगदम्बा भवानी को हरण करने का पाप किया है ,तू इस कुल का नाशक होगा। यही विभीषण ने भी कहा था ,पर रावण कुम्भकर्ण पे रोष न कर पाया -क्यूंकि अब तक परिस्तिथियाँ बदल चुकी थीं। कुम्भकर्ण राम की शरण में जाने को बोल रहा था --
''अजहुँ तात त्यागहु अभिमाना ,भजहुँ राम होइहि कल्याना '
'''बिन विचार तुम कारज ठाना । तातें नहीं होइहि कल्याना '' ॥
और देखिये ------
-''तात राम प्राकृत नर नाही ,पूरण ब्रह्म लखहु मन माहीं।।''---
''त्यागी नीति पथ धर्म तजि ,हरि आनी पर नारि।
राजनीति परमार्थता तुम सब दिनि बिसारि ''॥
''राम रूप गुन सुमिरि मन ,मग्न भयहु क्षण एक ''।
रावण माँगेउ कोटि घट ,मद अरु महिष अनेक ''॥ -----------
और अपने को भूलने के लिये मद और महिष का भक्षण किया क्यूंकि इसके बिना वो राक्षस नहीं बन सकता था। मद और मांस के भक्षण से सारी संवेदनाएं नष्ट होके बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। पर फिर भी युद्ध क्षेत्र में विभीषण उसको प्रणाम करने आया तो कुम्भकर्ण बोला ---
''सुन सुत भयहु काल बस रावण ----------------------------
धन्य धन्य तैं धन्य विभीषण ,भयहु तात निशिचर कुल भूषण ''॥
बंधु वंश तैं कीन्हि उजागर ,भजेहु राम शोभा सुखसागर ''॥ ------------
उसपे नशा छाने लगा तो विभीषण से बोला ---
''कर्म वचन मनकपट तजि ,भजहु तात रघुवीर।
जाहु न निजपर सूझ मोहि ,भयहु कालवश वीर ''॥ ---
स्वयं ही अनुज को कह दिया अब तुम जाओ अब मुझे अपना परया कुछ नहीं सूझ रहा ,मैं काल के वश हो गया हूँ ,तुम रामजी के चरणो में जाओ ,शायद इस तरह से उसे ये भी मालूम था कि छोटे भाई के कारण वंश का समूल नाश नहीं होगा। आज केवल कुम्भकर्ण के माध्यम से मांस मदिरा के दोषों का वर्णन जिसने एक ज्ञान विज्ञान युक्त जाती को विनाश की ओर धकेल दिया।
आज हमारे देश में भी मांस और मदिरा की खूब वकालत हो रही है ,क्या हम इतिहास से सबक ले सकते हैं या धर्मग्रन्थ और इतिहास केवल भ्रम फ़ैलाने के लिए उपयोग में लाते हैं हम। ----
कल फिर एक और राक्षस का वर्णन और गुण -अवगुण को समझने की कोशिश ---यूँ ही स्वांत:सुखाय के लिए फिर निर्वात मन भी तो त्रिकूट पर्वत पे ही है सुंदर पर्वत की चोटी में अशोक वाटिका में ---॥ आभा।।

Friday, 19 August 2016



आज अजय ६० वर्ष के हो गये ! कभी जन्माष्टमी से पहले कभी बाद  में  शिफ्ट होता था तुम्हारा जन्मदिन , और फिर सितम्बर में दोनों बच्चों का --भादों  से अश्विन हमारे  घर  में  त्यौहार  ही त्यौहार  बसते थे !क्या  हुआ जो तुम  मेरे पास नहीं हो  तो ,कान्हा भी तो मेरे मन में ही हैं न ,और मैं तो तुम्हारी टाइमलाइन को ही संभाल रही हूँ '' बच्चों के आग्रह पे'' ; शून्य में होने पे भी इस जगह पे आती ही हूँ ,यहां तुम्हारा नाम जुड़ा है न । तुम हो हमारे साथ अजय ;आज भी कल भी हमेशा , मन के झरोंखों से झांकते ,हर सुख में खिलखिलाते हर दुःख में गले लगाते हुये। देख तो पाते हो तुम हमें ऊपर से ,बस हम ही ढूंढते रह जाते है तुम्हें।श्रधान्जली अजय ! जन्मदिन की बधाई ! तुम तो कान्हा के पास चले गये मेरी भी अर्जी आई है उसे भी देख लेना ---
( हर क्षण सपना ;सपने में बस तुम )
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सपनों के उपवन में जब भी तुमसे मिलती हूँ ,
किसलय के अधरों की आभा सी बन खिलती हूँ .
सपनो के मनहर झुरमुट ,सघन वन ये मानस मेरा,
यादों के ढहते पर्वत , नयनों से झरते झरने।
मैं जीवन से हार रही या मन निर्मल होना चाहे ,
आत्म हवन अविरल अकम्पित ,
श्रृंगार शून्य तन ,दुःख व्रती मन।
पर ,नहीं हारती ;सूने पथ की राही हूँ ,
मैं रोती नहीं !वारती -मानस मोती हूँ। ----ये पिछले वर्ष के उदगार हैं --आज भी कुछ लिखा तुम्हें अर्पण ----
<><><> मैं चिर चंचल ,विह्वल ,विरल ,
अचल ,अविचल ,अंजस , अनूक
क्रूर नियति के लेखों का फल
करुणा संवृत ,संध्या की सखि ;
मैं अनित्य , अव्यय अशेष
उषा निशा की मिलन स्थली
करुणा संवृत -संध्या की सखि
नियति के हाथो से फिसली ;
तोड़ क्षितज सीमांत बंधन
वो बवंडर आँधियों का ,
ले चला था , सब कुछ उड़ा के
हूँ उसी की धूलि का कण ;
उड़ रही नभ में धरा से !
नियति क्या औ ठौर क्या है ?
व्यथित मैं ,पर सहज भी हूँ
धूलि का फिर मोल क्या हो !
तम को जलाने -दृग दीप खोलूं
मोम की मैं करुण बाती
स्वर्ण सी ज्योती बिखेरूं
विश्वास की अनमोल थाती ;
मेघ के भीतर घटा बन
आज मैं फिर झर चली रे !
चाँद का टीका सजाये
आज फिर मैं मानिनी रे !
हवन यादों का पुनश्च:
अश्रु के स्नेह से है
औ उठा जो धूम अंबर
मधु कामना वो जन्म की है
श्रधान्जलि मम हृदय की है।। -आभा।।   ..... ..... .... तिथि  के  अनुसार  अजय का  जन्म हड़तालिका तीज  को  होता  है ,हमारे  गढ़वाल  में  करवाचौथ  जैसी  ही  मान्यता  है  हड़तालिका  की।  निर्जल व्रत  होता  है  पर  सीधी -साधी संस्कारी  गढ़वाली  महिलायें  सजना सँवरना  और  दिखावा  नही  जानती  थीं पहले [अब  तो बाजार  की  दस्तक  हर  घर  में है ] बहुत  कठिन होता  है  हड़तालिका का  व्रत , मैंने  भी  सारे  व्रत किये हड़तालिका ,करवाचौथ ,वटसावित्री ,सोमवार ,गौरातीज  ---पर  जिसकी  जितनी  साँसें  होती  है  उसे  ये  व्रत  नही  बढा  सकते  ,न  ही  कोई  चमत्कार  होता  है  ---हाँ  ये  व्रत आपको आत्मबल  देते  है ये मेरा मानना  है  --बाकी  तो जीवन  पानी  में लिखी लिखाई  ही  है ,कब लहर  आके  मिटा दे ये संयोग है  ---------------