Saturday, 15 October 2016

ट्रिपिल तलाक और यूनिफार्म सिविल कोड पे कठमुल्ले साबित करने की भरसक कोशिस करते हुए की हम नही बदलेंगे --हर चैनल पे एक ही बात ,पर इस्लामिक स्कालरों को  भी उन्ही की बीन पे नाचते देखना क्षुब्ध कर देता है।  हम संविधान को नही मानते ,एक आध ने तो छाती ठोक के कहा हम मुसलमान पहले हैं फिर इंडियन।
इतिहास गवाह  है ,हिंदुस्तान में लगभग -लगभग सभी मुसलमान [ अपवाद भी कुछ  होंगे ] कन्वर्टेड हैं ,कुछ  हिन्दू  मुस्लिम आक्रांताओं के डर से कन्वर्ट हुए कुछ  लालच के कारण। तो  क्या संविधान के पालन के लिए इनके ऊपर फिर वही नीति नही अपनानी चाहिये , बीन के आगे सभी नाचेंगे  ---कड़ाई करने का मौसम आ  गया  है  शायद  --गीदड़  भभकियों  से  डरने से  समय  की  ही  बर्बादी  होगी।  तुलसी बाबा के शब्दों में ----
''फुलहिं - फरहिं न बेंत जदपि सुधा बरसहिं जलद ''------

Thursday, 13 October 2016

''नवरात्रि के बाद --- बैठे-ठाले --बेमतलब का बुद्धि-विलास ''
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'मोह न नारि -नारि के रूपा ,पन्नगारि यह रीति अनूपा।।'' ----
यह विलक्षण रीति है की स्त्री स्त्री के रूप पे मोहित नहीं होती।
.... आज बाबा तुलसी की इस चौपाई का विश्लेषण करने लगी ,
''जसु कछु बुद्धि विवेक बल मोरे ,तस कहिये हिय हरि के प्रेरे।।'' --
हरि की प्रेरणा स्वरूप ही------रामायण की इस चौपाई के कई विश्लेषण ,कई अर्थ अपने -अपने अनुसार ,नारी 'नारी' को ईर्ष्या से देखती है ,एक नारी दूसरी को पसंद नहीं करती या सहन नहीं कर सकती ,हर नारी अपने को सर्वश्रेष्ठ मानती है।
शायद शाब्दिक अर्थ यही निकले ,पर ऐसा है नही।
उत्तरकाण्ड अंत में ये चौपाई नारी शक्ति होने का ही एक प्रमाण है ,एवं तुलसी के मानस में स्त्री को अबला कहने वालों के लिये एक उदाहरण।
'' मोह न नारि नारि के रूपा '', अब क्यूँ लिख गए गोस्वामीजी जबकि सीतास्वयंबर के स्थल में वो स्वयं लिख चुके है --
''रंग भूमि जब सिय पगु धारी ,देखि रूप मोहे नर नारि ''----
---नारी भी मोहित हैं जानकी के रूप में।
और एक उदाहरण ---सीयस्वयंबर को देखने देवों की स्त्रियां सामान्य स्त्रियों का रूप बना के शामिल हो गयीं ,उन्हें देख के,महल की स्त्रियोंने बहुत सुख माना --
''नारि वेष जे सुरवर -वामा सकल सुभाय सुंदरी श्यामा '' ।
ऐसे ही कई उदाहरण है जब गोस्वामीजी ,स्त्री की स्त्री से प्रशंसा करवाते हैं ,वन की स्त्रियों से सीता की ,सासुओं से सीता की ,त्रिजटा से सीता की और सीता से त्रिजटा की ,अनसूया की सिया से और सिया की अनसूया से ,और कई अनगिनत उदाहरण हैं ,तो गोस्वामीजी मानस के समापन पे ये क्यों लिख गये। 
-----ये चौपाई गरुड़जी और कागभुशण्डिजी के वैराग्य की चर्चा के प्रसंग में आती है। गरुड़ का प्रश्न ,वैराग्य क्या है ज्ञान या भक्ति ? कागभुशुण्डि कहते हैं ज्ञानभक्ति एक ही है ,अलग नहीं है। जीव में ज्ञान होगा भक्ति होगी तभी वैराग्य होगा और वैराग्य होगा तभी चेतना होगी ,चेतना होगी तभी रामजी मिलेंगे। यहां ये समझना भी अनिवार्य है की वैराग्य का अर्थ सबकुछ छोड़ देना नहीं वरन रामजी पे अटूट अनुराग है ,उनको अपने को समर्पित करके फिर कर्म करना। 
ज्ञान पुरुष और भक्ति नारी पर नारी के दो रूप हैं ,माया और भक्ति।
माया जो विष्णु का ही प्रपंच है ,स्वाभाव से निर्बल है तो अपने अस्तित्व को संजोये रखने के लिये दूसरे का आलंबन लेती है उसे जड़ कर देती है ,वो अहंकार है मैं के होने का। गीता में भी भगवान कह रहे हैं --जड़ कौन है जो अहंकारी है ,जो मैं कर्ता हूँ इस आसक्ति में लिप्त है ---
''प्रकृते: क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वश:। अहंकार विमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।'' --
---- जो जीव प्रकृति के द्वारा गुणों को अपनी क्रिया समझे वही जड़ है। माया का यही गुण हैं वो मनुष्य को जड़वत बना देती है --इसी गुण से लिप्त जीव को ''ढोल गंवार शूद्र पशु नारी '' से परिभाषित किया गया है न की केवल स्त्री को।
भक्ति ''सीता'' हैं ,वो शक्ति जो अपना निर्णय स्वयं लेने में समर्थ है। जो शिव-धनुष को उठा सकती है। जिसे पार्वती के आशीष पे विशवास है। जो वैरागी है ,कर्म करना है यानी स्वयंबर में जाना है ,शेष माँ की इच्छा --पूर्ण समर्पण। जो दशरथ की राज्यसभा में वन जाने के लिये अपना मत सबके आगे रखती है। जो वन में सारी कठिनाइयां सहती हुई भी राम को कहती है ,राम - तुम्हारे बाण से कोई भी निर्दोष राक्षस नहीं मारा जाय ,जो वनवासिनों की माँ बनजाती है ,वनवासिनियों को कुटीर उद्योग के गुर सिखाती है ,राजमहलों की दृढ़ता और संयम सिखाती है ,कृषि को उन्नत कैसे किया जाये ---सिखाती है -- राजमहलों से सुखों को भूल वन के हिंसक पशुओं को भी प्यार से अपना कर लेती है। भक्ति वो सीता है जो अग्नि परीक्षा देके ,राम को ग्लानि से बचाती है और सम्राटों की मर्यादा को अक्षुण रखती है पर दूसरी बार सम्राट का विरोध कर स्वयं की समाधी बना उसमें समा जाने की शक्ति भी रखती है -मोह का कोई बंधन नहीं।
यही है नारी के दो रूप ,माया / भक्ति दोनों में संज्ञा नारी ही है ,या यूँ कहें दोनों नारी संज्ञक हैं,पर भक्ति जगद्जननी जानकी है ,शक्तिस्वरूपा ,भक्ति मीरा है भक्ति राधा है और माया जो कुशल नर्तकी है। जिसके हृदय में भक्ति का वास है ,वहां माया रहने से सकुचाती है।
''निर्गुण फांस लिए कर बैठी ,बोले मधुरी वाणी।
माया महा ठगिनी हम जानी।।''
मैं इस चौपाई का सरल सा यही अर्थ समझ पायी हूँ --सारा संसार जिस पुरुषात्मक शक्ति का गर्व करता है वो पुरुष माया और भक्ति के चारों ओर ही नृत्य कर रहा है ,इस स्त्री शक्ति के बिना वो शक्तिहीन है ,यही नारी उसे जड़ बनाती है माया का रूप लेके और यही चेतन बनाती है भक्ति से ज्ञान और वैराग्य का आलंबन देके।
पर अभी अर्थ कुछ और भी है ,एक शब्द और डाला है चतुर भुशुण्डी ने इसमें --वो है --पन्नगारी --जो उन्होंने गरुड़ के लिये पूरी रामायण में पहली बार कहा। अब पन्नगारी का अर्थ ----साँपों का शत्रु अर्थात गरुड़ , पर कुछ और भी देखिये
पन्न = गिरापड़ा
पन्नग =सर्प
पन्ना =रत्न
पन्ना= पृष्ठ
पन्नी =रंगीन ,चमकीला ,सुनहरा कागज।
और गारी =गाली।
नारी =जो हमारा अरि [शत्रु ]नहीं है अर्थात मित्र है। वो कई रूपों में हमारे सामने आती है पर हम अपने मन की भावना के अनुसार ही उसे महत्व देते है। हम चमकीली पन्नी के मोह में फंसे भ्रम में पड़के ,पन्न गारि --हो जाते हैं -जड़ प्रकृति--और गोस्वामीजी कहते है --
''सो माया बस भयहुँ गुसाईं ,बँधेहुँ कीर मर्कट की नाई। ''
पन्नगारी ==============
'' यज्ञमूर्ति पुराणात्मा साममूर्द्धा च पावन:। 
ऋग्वेदपक्षवान् पक्षी पिंगलो जटिलाकृति:।
ताम्रतुण्ड सोमहर:शक्रजेता महाशिर:। 
पन्नगारि -पद्मनेत्र साक्षाद् विष्णुरिवापर: ॥ ''--गरुड़ के लिए है ये विशेषण
''वेदराशि ,यज्ञमूर्ति ,साममूर्द्धा ,ऋग्वेदपक्षवान् ,साक्षाद् विष्णुरिवापर: ---अति महत्व के विशेषण। गरुड़ को वेद का प्रतीक स्वीकार किया गया है। वेदस्वरूप गरुड़ पे विष्णु रूपी ब्रह्म आरूढ़ हैं। अर्थात ब्रह्मज्ञान होने के लिये ,शरीर रूपी पक्षी भी आवश्यक है।
---''विजयो विक्रमेणेव प्रकाश इव तेजसा। पर्ज्ञोंतकर्ष: श्रुतेनेव --सुपर्णेनायमुह्यते।।''=======विष्णुवाहन गरुड़ (सुपर्ण ),विजय को विक्रम की तरह ,प्रकाश को तेज की तरह ,बुद्धि के निर्माल्य को विद्या की तरह वहन करते हैं।
--- यही वे गरुड़ हैं जिन्हें पन्नगारी कहा गया इस चौपाई में ,अर्थात साक्षात् विष्णु ==विष्णु और विष्णुवाहन को एक ही कहा गया बस स्वरूपत: यौक्तिक भेद --विष्णु को उपेन्द्र और गरुड़ को खगेन्द्र मान के इंद्र विष्णु और गरुड़ में समन्वय स्थापित किया गया।
अब एक और संकेत है यहां पे ----महाभारत काल के आगमन की पूर्व सूचना। ''मोह न नारि नारि के रूपा ''---इस उक्ति के साक्षात दर्शन महाभारत में होते हैं --प्रारम्भ होने पे ही कद्रु और विनीता के वैमनस्य की कहानी ,गरुड़ अरुण और नाग की उतपत्ति और महाभारत काल का पूर्वार्ध। ----पौष्यपर्व और पौलोमपर्व में ही सर्पयज्ञ का प्रारम्भ। दक्ष पुत्रियों ,वनिता-कद्रु का ''मोह न नारी नारी के रूपा '' को चरितार्थ करना और गरुड़ , अरुण का उद्भव। ---------
यूँ ही सोच रही थी , [पाठ के बाद की शान्ति --और शांति में सोच ]रामचरित मानस की एक -एक में चौपाई ,कई सारे अर्थ समाये हुये हैं ,जितनी बार पढ़ो ये नए रूप में सामने आती है ,मंत्र तो हैं ही ये चौपाइयां। इन्हें पढ़ने से ध्वनि तरंगें आसपास एक सकारात्मक आभामंडल बना देती हैं हमारे आसपास और हम चेतन हो जाते हैं ,हनुमानजी की कृपा भी मिलनी प्रारम्भ हो जाती है ----
मुझे ज्ञान है ,ये बुद्धि विलास है [mental luxury ]---और वो भी मेरी --और सभी के लिए बोरियत --पर भक्ति और माया दोनों हैं मुझमे वो मुझे जकड़ ही लेती हैं ----जय सियाराम ---

Tuesday, 11 October 2016

विजयादशमी की शुभकामनायें ----
'' उत्तर का घोड़ा ,दक्षिण का नीर ,पश्चिम का वर्दा ,पूरब का चीर ''
बही में स्वस्तिक और ॐ के अंकन के साथ ही लिखने की शुरुआत उपर्युक्त शब्दों से ,---फिर'' शुभलाभ ''--सभी सदस्यों के हस्ताक्षर  युक्त नामों के साथ --सनद कर  दिया  और व्यापारिक यात्रा शुरू।
-----जहां जो वस्तु प्रचुरता  से  मिलती  है  उसका जिक्र ---
आज डिजिटल समय में जब सारी सूचनाएं एक क्लिक में हैं --इस  तरह के वाक्यों का कोई अर्थ नही ---फिर  भी ये परम्परा  जीवित  रहनी चाहिये ताकि सनद रहे , हमारे पूर्वजों ने कितने कष्ट  सहे थे व्यापार  को  आगे बढाने में ,देश को समृद्ध  बनाने  में और सीमाओं  को  सुरक्षित  करने में ,,आभा ,,

Wednesday, 5 October 2016

अब संजू मियां और सिसोदिया आये हैं सरजी की सर जी कल करने ---जीभ यदि दो मुंही हो तो गर्दन से छोटी करने पे उसका बतकोलापन थोड़े ही जाएगा --कभी किसी ठंडे खून वाले जानवर को जीभ बाहर निकालते हुए देखा है --मैंने देखा है कई बार --ये hibernation {सीतनिद्रा } में भी जाते है समय खून की तासीर पर निर्भर करता है ---टोटल सरीसृप {reptile } हो तो समय चार से छ महीने और मनुष्य का खून मिक्स हो तो कुछ दिन किसी रिसोर्ट ,मेडिटेशन सेंटर में ---

Tuesday, 4 October 2016


दुःख में सुख की चिंगारी --और  मुझे  तो  वो  दुःखी होने  ही  नही  देता ---कहता  है  --दुःख तो  तेरी  निजी वस्तु  है ,उसको मन में ही  रख तू ---कर  प्रणाम ,अभिवादन --अभिनन्दन ,दे आशीष प्यार की सरिता बन ---


हम ! हिन्दू मन सदैव प्रकाशित ,अन्धकार में भी सदा आलोकित रहने वाले , दुःख में भी सुख की छिपी चिंगारी ढूंढने वाले ; अमावस की रात में चाँद तारे नहीं तो क्या , रामजी भी तो वनवास के बाद अमावस में ही लौटे थे  ,वो जान के अन्धकार में लौटे हैं मन को प्रकाशित करेंगे ,करो प्रकाश ! -- 
अन्धकार  में  ही  छिपी  होती  है प्रकाश  की  किरण।  
आज सर्वपितृ अमावस , पितृ -विसर्जन - --पितृ तो भाव हैं ,भाव का कैसा विसर्जन। 
प्रभु के खेल अनोखे , अजय ने अमावस को ही महाप्रयाण किया -तब से अमावस मेरे लिये जीने  का भाव  हो गयी। पर कान्हा ने  आज चुपके  से  कान में कहा --गीता  पढ़ती है न ; तो तुझे पता होना चाहिए --
''सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्। ''
तो  दुःख  क्यों ?आगे  कर्म  खड़े  हैं ,उन्हें कर। 
''कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्। 
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः।।''--------सारे  ही  कर्म कुछ  न कुछ  दोष  युक्त  हैं।  तेरा कर्म है प्यार  बांटना ,चल उठ --और  मैं अमावस  से  बाहर  निकल आयी ,राम कृष्ण का  जीवन  दुःख में  उल्लसित होना  सिखाता है। मुझे तो दुःख-सुख दोनों साथ  ही  देती  है  जिंदगी। 
आज  सुबह पितृ विसर्जन ---गाय  और  कव्वा  ढूंढते  हुए खूब सैर हुई। 
और अब जन्मदिन का उत्साह ---मेरे घर आने वाली नयी बिटिया --वैधानिक बिटिया [दुल्हिन ] प्रभु ने मिलने का विधान लिखा --तो वैधानिक  ही  हुई --का'' जन्मबार '' ---मुझे मिलने के बाद ये पहला जन्मदिवस ,और वो भी अजय के श्राद्ध के दिन -----तुम्हें दोनों का ही आशीष  मिला बिटिया ---
आओ मेरे अंगना ,
फूलों के झूले में डोलो ,
चम्पा कली सी महको। 
जुगनू सी चमको मेरे आंगन 
खिलखिलाओ ,खुश रहो हमेशा 
प्यार  मिले सबका तुमको। 
स्वागत मेरे  घर में ---जन्मदिन की ढेरों शुभकामनायें  -''-रितिका बिटिया'' , ढेरों आशीष ,प्यार  मिले ,प्यार ही बांटो।
सोच रहे होंगे  सभी के बच्चों की शादी  होती  है  ---नितांत  व्यक्तिगत  मामला  .क्यों लिखा जाए यहाँ पर --लिखना बनता है मेरा --क्यूँ  ?तो देखिये मैंने सभी तरह की ढूंढ -ढांढ से तंग आकर पिछले वर्ष  नवरात्रि  में  यहीं पे माँ से मांगी  थी  मुराद ---आसमानो  से  होके पहुंची माँ के चरणों में  और  इस वर्ष नवरात्रों से  पहले माँ ने पूरी  कर दी ---तो  माँ को  प्रणाम  भी तो  यहीं से  करूंगी  न ---साथ  ही  पुरानी --दिनांक 5 ,नवम्बर 2015 का प्रार्थना पत्र भी संलग्न है ---
''महा लक्ष्मी चल तो दी होगी माँ तू क्षीर सागर से ,विष्णु जी तो निद्रा मग्न हैं ,देवप्रबोधनी को उठेंगे ! माँ तू गणपति संग आती है ,इतनी दूर आते -आते थक जाती होगी। तुझसे क्या मांगें माँ ,सभीने अपनी डिमांड लिस्ट बनाई होगी ,पर तू कौनो सभी की लिस्ट का अवलोकन करेगी। मुझे पता है गणपति महाराज को पास ऑन कर देगी और वो बट्टे खाते में डाल देंगे जहां मूषक महाराज भी होंगे। माँ जो तूने दिया है तेरा प्रसाद समझके भोग रही हूँ ,तुझे पता ही होगा मैं कोई शिकायत भी नहीं करती हूँ पर माँ है मन की बात तो कह ही सकती हूँ। इस बार एक मदद चाहिये माँ ! अब मदद तो करेगी न ,अभी तो प्रभु सोये हैं तो तेरे पास समय भी है और साथ में बप्पा भी हैं --माँ आते आते मेरे लिये एक ''बहू '' लेती आना ढूंढ -ढांड के --ऐसी जो बेटे को भा जाये और जिसे बेटा भा जाये। मैंने तो सारे घोड़े दौड़ा लिए हैं ,पर जिसे तूने मेरे बेटे के लिये चुना होगा वो कहां हैं मिल ही नहीं रही है माँ। अब तेरी मदद की जरूरत आन पड़ी है ,अब तुझे तो मालूम ही है माँ वो कौन है ,बस अपने संग ले आ माँ ,ताकि विष्णुजी के जगने से पहले ,आने वाले साये देख लूँ और दिन नियत करूँ मेरे घर में भी मंगल वाद्य बजें। समय आयेगा तो सब हो जाएगा --पर माँ ''का बरसा जब कृषि सुखाने '' अब समय और जोड़ी दोनों को लाने में मदद कर माँ ---अड्वान्स में कह रही हूँ ,ताकि तू दायें -बायें न करे ,गाँठ बाँध ले ,भूलना मत --देख मैंने कभी कुछ नहीं माँगा ,और आज भी धन-दौलत नहीं मांग रही हूँ ,बस ढूंढने में मदद करने के लिए कह रही हूँ --मान लेना माँ मेरी विनय को --तेरे आगमन की प्रतीक्षा में तेरी पुत्री और एक माँ -----''---धन्यवाद ,धन्यवाद  ,धन्यवाद  माँ  --तुझे  लाखों प्रणाम --
आप  सभी का  आशीष  मिले  मेरी  इस  बिटिया  को  ऐसी  आशा  मेरी  धृष्टता  ही  है  पर  आशा  है  ---



नवरात्रि ---दुर्गासप्तशती आज के सन्दर्भ में
.....''.विष्णुकरणमलोद्भूतौ दानवौ मधुकैटभौ।
......महाबलौ च तौ दैत्यौ विवृध्दौ सागरे जले।।''----------
कान के मैल से पैदा हुए राक्षस। प्रलय  के बाद की शांति में विष्णु की थोड़ी सी लापरवाही ''अभी शांति है ,अराजक तत्व जल मग्न हैं ,ब्रह्मा और शंकर अपना -अपना कार्य निष्ठा  से  कर  रहे  हैं ,तो चलो मैं एक झपकी ले लूँ। '' विष्णु =समस्त सृष्टि का विस्तार --वो जो ब्रह्मांड में व्याप्त  है --''अनेकवक्त्रंयमनेकाद्भुतदर्शनम् ''---गीता ----
''अनेकबाहुदरवक्त्रनेत्रं
पश्यामि त्वां सर्वतोअनन्तरूपम्।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
पस्यामि विश्वेष्वर  विश्वरूप। '' ----गीता ---
अनेक हाथ ,अनेक पेट ,मुख नेत्र --अर्थात  जिसका न आदि  है  न अन्त है न ही कोई मध्य है ---ऐसा  है  स्वरूप इस ब्रह्मांड  का  और  वही  विष्णु  है  ---चेतना  का  विस्तार।
यह विष्णु  सो  गया  ---अनन्त महासागर  में  सर्पों की शैया  में  ---. ]जब हम  नींद  में  हैं  तो  जीवन  का  आधार  खो चुके  होते  हैं  , इस  भवसागर  में  केवल अदृश्य शक्ति के सहारे  ही  होते  हैं  ,साथ  ही  शरीर के बढ़ने और हृष्ट-पुष्ट होने की समस्त क्रियाएं  भी  नींद  में  ही  होती  हैं  ]---चेतना लुप्त हो गयी ,शक्ति श्री हीन हुई केवल उसके पैर दबा रही है। उपद्रव तब ही होंगे जब चेतना सो जायेगी वो भी राजकीय चेतना , चेतना सोई तो श्री भी श्रीहीन हो गयी। उपद्रव रूपी राक्षस उत्पन्न  हुए ---- एक कान से दूसरे कान अफवाह फैली --किसी के कामकी तो मीठी यानी  --''मधु ''  ,किसी के लिए परेशानी का सबब यानी ''कैटभ ''।
इन दोनों असुरों ने सोचा --हम ही हम हैं जहां देखो। कान ही कान और मैल ही मैल ,  मस्तिष्क में व्याप्त द्रव्य - में तैरते हुए -हम आये कहाँ से ,किसने हमें पैदा किया --चलो पता लगाते हैं , अकारण तो कुछ  भी  नही  होता --
''नाकारणं भवेत्कार्यं सर्वत्रैषा परम्परा ''
... ''आधेयं तु  विनाधारम् न तिष्ठति कथञ्चन। ''----श्रीमद्देवीभागवत --
बिना आधार  के  आधेय  की  कोई  सत्ता  नही  होती  ,तो मधु कैटभ दोनों भाई अपने पैदा  करने वाले   को  ढूंढने लगे।
जब उन्हें कोई भी नही मिला ,[अब थे तो मस्तिष्क की ही उपज (चाहे कर्ण छिद्रों से मैल  बन के बहे  या --बाहर  से  कोई अफवाह  कान  में  डाउनलोड  हो ) '']---तो  उन्होंने विचार किया ,हम दोनों का आधार  अवश्य  कोई  अचल महाबली शक्ति है ,उसकी कृपा से ही हम इस महासागर में बढ़ रहे हैं एवं  बलवान भी होते जा  रहे  हैं ---चलो उसी का ध्यान करते  हैं और अपने को जानते है ----
दोनों असुरों ने ध्यान लगाया , तभी आकाश  में बिजुली कड़की और उन्हें उसमें  ऐं शब्द सुनाई दिया  --उन्होंने सोचा यही शक्ति है यही मन्त्र है ---
''ताभ्यां विचारितं तत्र मंत्रोअयं नात्र संशय '' ---श्रीमद्देवीभागवद --
बस उस बिजुली और ऐं  का ध्यान पूजा-  समाधिस्थ भाव  से  करने  लगे।  ऐसे ही जैसे सत्य को क्षीण करने के लिये असत्य अपनी पूरी ताकत झोंक देता है --
 शक्ति प्रसन्न  हुई --शक्ति अर्थात कार्य क्षमता ,लगन ,कर्मठता और समर्पण ---कर्मण्येवाधिकारस्ते ---काम करने  के  प्रति समर्पण की हद तक लगन ---फल  निश्चित  होता  है  --कर्म  चाहे  सुर  करे या  असुर ---
''यं यं  चिन्तयते कामम् तं तं प्राप्नोति निश्चितं ''----- दुर्गासप्तशती --
-शक्ति प्रसन्न  हुई  और  आशीष  मिला। इच्छा मृत्यु का ---
''वाञ्छितं मरणं दैत्यो भवेद्वां मत प्रसादतः । ''-----श्रीमद्देविभागवद --
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मधु-कैटभ का ब्रह्मा  को देख, उनसे  उनका  कमलासन  माँगना  और  न देने   पे  उन्हें  युद्ध  करने  की  चुनौती  देना ,ब्रह्मा  का सोचना  मैं तो तपस्वी  हूँ इन दैत्यों से न जीत  पाऊंगा फिर क्या करूँ ?उन्होंने ध्यान लगाया --देखा विष्णु तो सो रहे हैं ,अब क्या होगा , इन दैत्यों को कौन मारेगा ? ब्रह्मा ने विष्णु की अनेकों प्रकार से स्तुति की ,पर विष्णु नही जगे ,तब ब्रह्मा जी ने विचार किया अवश्य ही विष्णु शक्ति  योगनिद्रा के वश में हो गये हैं ---फिर वो उस शक्ति योगनिद्रा की स्तुति करने लगे। वो शक्ति जिसने महाशक्तिशाली विष्णु को भी अचेतन कर दिया --वो  ही  इन कर्ण दैत्यों से संसार  को बचा  सकती  है  ----
जी  यही  सत्य  है , विलुप्त चेतना पे जब कानाफूसी  सवार हो जाये  ,अफवाहों के बवंडर उठें , सत्य को नकारने  के  लिये --मधुकैटभ --सहस्त्रों कर्णों में मैल बन शक्तिशाली  असुर बन जायें --तो सत्य  हारने  की  कगार  पे  पहुंच  जाता  है  ,निष्प्रभ व श्री हीन हो जाता  है  --असुरों में  एकता और बल  कई गुना  होते हैं ---ऐसे में  सदाचारी  महाशक्ति  ही  एक मात्र  सहारा  होती  है  --शक्ति का स्तवन ही  उपद्रवों को समाप्त करता है।
-----इस  शक्ति  की  उपासना  का  पर्व  ही  है दुर्गापूजा ,नवरात्रि --विष्णु को जगाने  का पर्व  ,विश्व चेतना जागे , मधुकैटभ जो  हवाओं  से तिरते हुए  मस्तिष्क रूपी ब्रह्मांड  के  जल में फल-फूल रहे हैं , उनके निस्तारण का ''पर्व , अपनी शक्ति  को  पहचानने  का पर्व ---
''उत्तिष्ठ देवि कुरु रूपमिहाद्भुतं त्वं
मां वा त्विमौ जहि यथेच्छासि  बाललीले।
नोचेत्प्रबोधय हरिं निहनेदिमौ य -
सत्वत्साध्यमेतदखिलं किल कार्यजातम् ॥ ''.....
-------हे देवी अब आप उठिये और अपना अद्भुत रूप धारण कीजिये ,हे बाललीलाकारिणी ! अपनी इच्छानुसार चाहे मुझे मार दें अथवा इन दोनों दैत्यों को मार दें या तो भगवान विष्णु को जगा दें ,ये काम करने में आप ही  सक्षम हैं। -------------
चंडी पाठ का प्रथम अध्याय  ही  शक्तिस्तवन से प्रारम्भ होता  है  ---निद्रा  आवश्यक  है  शरीर  के  लिये पर चेतन निद्रा -- अफवाहों   ,अफवाह  फैलाने  वालों    , आसुरी  प्रवृतियों ,और देशद्रोही ,समाजद्रोही प्रवृतियों के प्रति लापरवाही, सर्पों की शैया  में ली जाने वाली निद्रा  ही  होती  है  --जो  मधुकैटभ को पनपने का अवसर देती है --  बस  यूँ  ही  मेरी  सोच  ---नवरात्रि  के  उपलक्ष  में  --
--- नवरात्रि  की  मंगलकामनायें ---आभा --
















Monday, 3 October 2016



''एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा। ''---
दुर्गासप्तशती , स्त्रियों को जागृत करने की पुस्तक है , अपनी शक्तियों की पहचान करने की पुस्तक ,सभी कन्यायें --छोटी बड़ी ,बालिका ,युवा ,अधेड़ ,बूढी --इस पुस्तक को पढ़ें और अपने स्वरूप को पहचानें --ये केवल धार्मिक पुस्तक नही --स्त्री जागरण हेतु एक अनूठा अभियान है ---नवरात्रि की मंगलकामनायें --लुटती पिटती नारी जाती के त्राहिमाम स्वर के साथ।