Friday, 12 April 2019



बैठेठाले
======
 (Sally Of Mind -(दिमागी कूद या कुलेल )
==============
यादेवीसर्वभूतेषु --नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:
देवी का आह्वान किया गया उन्हें नमस्कार -कर से नमन करके -
कर से नमन कैसे होगा --केवल हाथ जोड़ के मंदिर में "नमस्तस्यै नमस्तस्यै गाने से नहीं -अपितु अपने अपने कर्मों का सम्यक निर्वहन करने से -
सुबह-सवेरे मंदिर में या देवता की मूर्ति के सामने नमस्तस्यै नमो नम:का गान तो पूरे दिन भर के कोरे पन्ने को भरने की कार्य सूची का स्मरण मात्र है और है चेतन ऊर्जा का संकलन।
नवरात्रि में अधिकाँश लोग  यादेवीसर्वभूतेषु -प्रार्थना पढ़ते ही हैं
 यदि हम इसे ऐसे पढ़ें तो --
विष्णुमायेति संस्थिता --जो विष्णु की माया है या विष्णु को भी मोहित करने में सक्षम है
चेतनेत्यभिधीयते ---जो विष्णु को मोहित कर लेगी वो प्रखर चेतना ही होगी और धीयते - धी -बुद्धि चेतना                                           -- धी का एक अर्थ बेटी भी ---होगी -प्रारम्भ में ही कन्या की धारणा वो देवी --बुद्धि है -
बुद्धिरूपेण संस्थिता
बुद्धि है तो मस्तिष्क चलेगा -चलेगा तो उसे आराम भी चाहिये और मस्तिष्क को आराम ,निद्रा की गोद  में ही मिलेगा -तो वो
 निद्रारूपेण संस्थिता हो गयी -
निद्रा देवी है तो जागने पे हम नव ऊर्जा से युक्त होंगे।
अब निद्रा में चयपचय की क्रिया से मानव की ऊर्जा का क्षय हुआ तो  भूख लगेगी - देवी
क्षुधारूपेण संस्थिता हो गयी -
क्षुधा में देवी का आवाहन -हम भक्ष्य अभक्ष्य न खाएं -सम्यक खाएं पर प्रसाद समझ के खाएं।
या देवी सर्वभूतेषुच्छायारूपेण  संस्थिता ---
अब इसके भी मैं दो अर्थ लगाती हूँ -एक तो क्षुधा पूर्ति के बाद कुछ समय छाया में सुस्ता लो या फिर अपनी छाया में रहने वाले (जिनके पालन पोषण का भार आपके ऊपर है )-या जरूरतमंदों की -यथाशक्ति क्षुधा पूर्ति करो। क्यूंकि क्षुधा भी देवी है तो पूजा जैसा ही लाभ मिलेगा।
 ऐसे ही मैं सम्पूर्ण प्रार्थना को अपने मन में विश्लेषित कर जीने के लिए  अनुशासन बद्ध पाठ मान के ही चलती हूँ -क्षुधा शांत करने को खाना खाया -खाने से शक्ति आयी --
शक्तिरूपेण संस्थिता।
शक्ति आयी तो प्रदर्शन की चाह जगी --
तृष्णारूपेण संस्थिता
शक्ति और तृष्णा के साथ ही क्षमा होना आवश्यक है अन्यथा विध्वंस निश्चित है -तो अब
क्षांतिरूपेण संस्थिता।
अब शक्ति के साथ ही कर्म भी आ गया -प्रत्येक कर्म के लिए कुशल व्यक्तियों की आवश्यकता होगी -तो आवश्यकतानुसार उन्हें समूहों में बाँट दिया जाए --
जातिरूपेण संस्थिता -
समूह के अपने नियम होंगे जहां लज्जा -यानि -प्रदर्शन और दिखावे की अति की मनाही भी होगी --
लज्जारूपेण संस्थिता।
अब जितने कर्म उतने समूह ,उतनी जातियां -फिर संघर्ष का भय तो देवी अब तू इस समाज में शांति बन के प्रतिष्ठापित हो -
शान्तिरूपेण संस्थिता।
कार्य कुशलता ,नियम से चलना ,संघर्ष का न होना -क्षांति का अनुसरण करने वाले समाज में सदैव ही शांति का निवास होगा --
जहां शांती होगी वहां प्राणियों में परस्पर सामंजस्य होगा प्रकृति से प्यार  होगा और होगी सभी के प्रति श्रद्धा -श्रद्धारूपेण संस्थिता।
ऐसे समाज में व्यष्टि -समष्टि कांति से दैदीप्यमान होगा -
-कान्तिरूपेण संस्थिता।
और जहां इतना सब होगा लक्ष्मी वहीं अपना निवास बनाएगी --ल
क्ष्मीरूपेण संस्थिता।
लक्ष्मी प्रचुरमात्रा में होगी तो वृत्तियाँ (व्यापार -उद्योग )भी बढ़ेंगीं -श्री-समृद्धि में वृद्धि होगी -
वृत्तिरूपेण संस्थिता।
स्मृति व्यापार की आवश्यकता -तो
स्मृतिरूपेण संस्थिता।
बढ़ते व्यापार और बढ़ती समृद्धि के साथ ही समाज में --प्राणिमात्र के लिए ममता  की भावना बहुत आवश्यक है -तो अब देवी
दयारूपेण संस्थिता।
समाज के वंचित वर्ग ,पशुपक्षी प्रकृति के लिए मन में दया ममता होना --और कुछ सार्थक करना संतोष और तुष्टि का कारक होगा पर उस करने में अहंकारी न हो जाएँ अत: तुष्टि में भी देवी का आवाहन -
तुष्टिरूपेण संस्थिता।
सृष्टि की रचयिता ,जननी -जिसके होने से संसार है --जो आदि भी है अनंत भी है --उसको नमन-माँ से बड़ी देवी कोई नहीं तो माँ को देवी मानने का संकल्प -
मातृरूपेण संस्थिता।
पर स्त्री माँ के साथ ही और कई रूपों में भी प्रस्तुत होती है -भ्रान्ति न फैले -इसलिएदेवी को भ्रान्ति में भी स्थापित कर दिया गया -
भ्रान्तिरूपेण संस्थिता -
से समस्त इन्द्रियों में देवी की स्थापना -इन्द्रियाणामधिष्ठात्री ---वो अखिल विश्व की चेतना है।  जगत के चित में चेतना रूपी जो तत्व है वो देवी का ही रूप है वही विष्णु की चेतना है ,वही शव को शिव बनाती है --चितिरूपेण ---इस तरह से विष्णु रूप में देवी का आवाहन कर उसे -गुणों में गुणों को बरतते हुए प्रत्येक इंद्री और गुण  की अधिष्ठात्री कहा गया.--इस तरह से ये प्रार्थना  याद भी बहुत शीघ्र हो जाती है --कि किस गुण के बाद कौन सा आएगा तथा  मानवीय संवेदनाओं को भी संरक्षित और संवर्धित करती है। 
शास्त्रोक्त विधानों को परम्परा की लाठी से पीटने की जगह हम तर्कों के आधार पे उनको अपनाएँ तो आनंद की अनुभूति होती है। पूजा प्रार्थना को  विक्रमबेताल की तरह ढोने की मजबूरी नहीं होनी चाहिए ये मेरी सोच। 
---Sally Of Mind -(दिमागी कूद या कुलेल )आभा।।







Friday, 1 February 2019

स्त्री-"भ्रान्ति रूपेण संस्थिता "
=========
पानी पे लिखी लिखाई 
घास , जो तूफानों में उगी
श्रृंगार करने को स्वयं का   
चाहे जो दर्पण सूर्य का। 
.चाँद को माथे की बिंदिया 
जो    बनाना    चाहती है। 
अंबुद सी स्थिर गहराई 
लहरों की चंचलता समेटे 
जानती -  इस सत्य को -
चाँद की माथे की बिंदिया-
सुबह तक मिट जायेगी,
पानी में लिखी ,लिखाई-
पल भर में धुल जायेगी,
सूरज जला देगा उसे -

 आंधी करेगी साजिशें । 
लहर बन सागर किनारे 
रेत नियति है मेरी -
पर जानती  वो ये भी  ,
 कि  -
  बीज हौसलों  के कुछ  , 
संतति को देने के लिए  -
अपने ,पंखों को जलाना 
दर्द को पी - मुस्कुराना 
रेत बन भी चमचमाना 
पिघले हिमालय के बदन पर 
घास की चादर सजाना 
मातृ रूपेण संस्थिता से 
भ्रान्ति रूपेण तक,
 हो आना 
उसका प्रसंग संदर्भ है -
वो  सनातन वो  अनंत 
वो  सृष्टि वो ही स्त्री   है।। आभा।।
.......


" फकत मैं "
=======
माटी की  काया की ये चाहत
सात रंग मुझमें भी दीखें।
दौड़  अंधी    राह   पे
पाने की भी -खोने की भी.
कुछ बन चलूँ कुछ कर चलूँ "मैं "
इंद्रधनु सा सजे -- जीवन ,
मोह   माया    अनुराग के
इच्छा आकांक्षाओं के जंगल,
शर्म  हया  नैतिकता 
सभ्यता संस्कारों की  जकड़न,
"मैं " मेरा   अभिमान लेके
उड़ चला "मैं " गगन छूने
मानव बना उसने था भेजा
"मैं "बना "मैं "उसे भूला ,
होम कर दी जिंदगानी -
समिधा "मैं" ने स्वयं की  दी।आभा। 






Wednesday, 9 January 2019

आचमन -----------
किसी भी पूजा या धार्मिक अनुष्ठान में बैठने पे सर्व -प्रथम हम आचमन करते हैं। कहते हैं आचमन अनिवार्य है कर्मकांड या पूजा की शुद्धता और पवित्रता के लिए। पहले तो सभी को ज्ञात होता था इसके पीछे क्या धरणा है पर कालांतर में इंस्टेंट पूजा ,पंडितजी जल्दी करो ने इस क्रिया के महत्व को ही कम कर दिया। मेरे पिता नित्य संध्या वंदन आचमन से ही शुरू करते थे ,कुतूहल वश हम उनसे पूछते थे तो जो उन्होंने बताया वो ही महाभारत में भी पढ़ने को मिला। पितरों का नित्य स्मरण सांस्कृतिक विरासत के प्रति श्रद्धा और प्रकृति की शुद्धता के प्रति प्रतिबद्धता  ; एक आचमन से , साथ ही जल की शुद्धता के महत्व का भान।
ॐ अपवित्रो पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोsपिवा।
य: स्मरेतपुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर:शुचिः।।
आचमन के समय मौन रह के तीन बार जल पियें ,उसमें कोई आवाज न हो ,अंगूठे के मूल भाग से दो बार मुहं पोंछे ,इसके बाद चक्षु ,नासिक ,कर्ण और मस्तक का स्पर्श।
अब क्या कहता है महाभारत --प्रथम बार जल के पीने से ऋग्वेद ,द्वितीय बार से यजुर्वेद और तृतीय बार से सामवेद तृप्त होता है ,प्रथम बार के मुख-मार्जन से अथर्वेद और द्वितीय बार के मार्जन से इतिहास,पुराण व् स्मृतियों के अधिष्ठाता देवताओं को तृप्त किया जाता है। नेत्रों के स्पर्श से सूर्य को ,नासिका से वायु और कर्ण के स्पर्श से दिशाओं को संतुष्टि मिलती है।
मस्तक का स्पर्श ब्रह्माजी को संतुष्ट करता है व् मार्जन के पश्चात जो उपर की ओर चारों ओर जल फेंका जाता है वो आकाश के अधिष्ठाता देवता को संतुष्ट करता है। --अब जल को शुद्ध होना तो अनिवार्य ही हो गया न ,तभी तो सदियों पुरानी नदियाँ हमारी पीढ़ी की युवावस्था तक शुद्ध और स्वच्छ थीं।
यह तो रही संध्या पूजा के कर्म-काण्ड में सम्पन्न होने वाली क्रिया पर हिन्दू संस्कृति संस्कारों की सुंदरता देखिये ,''मन में ही गंगा मन में ही यमुना ''---चारों वेद ,इतिहास,स्मृति ,पुराण उपनिषद ,दशों दिशाएँ ,एवं  ब्रह्माण्ड के सभी तत्व आपके भीतर ही हैं अत: अपने को शुद्ध करो पहले ,केवल बाह्य ही नहीं ''बाह्याभ्यन्तर:शुचिः'' आंतरिक शुद्धता होनी भी आवश्यक है ,तभी वेद पुराण ,सभी आपको प्राप्य होंगे और अंतिम लक्ष्य तो पुण्डरीकाक्ष ही है --वो मैले मन को कैसे मिलेगा ;
आचमन के समय मौन रह अपने मन की शुद्धता और पवित्रता से हम सभी को पा सकते हैं --साथ
ही प्रकृति को शुद्ध और स्वच्छ रखना भी हमारा ही कर्तव्य है ये नित्य ही आचमन के द्वारा सिखाया जाता है। सदियों तक गुरुकुल में संततियों को पीढ़ी दर पीढ़ी यही शिक्षा मिली तब ही आज भी हम इस धरा को भोग पा रहे हैं। आधुनिक शिक्षा में संस्कारों के मायने ही बदल गए ,
इतिहास स्मृति--सब जगह विदेशी आक्रान्ताओं का बोलबाला है इसीलिये बच्चे इन छोटी-छोटी संवेदनाओं से वंचित हो गए हैं ,इन क्रियाओं के पीछे की भावना--प्रकृति से जुड़ाव , श्रद्धा --सब लोप हो गया है --वरना तो नहाते ,खाते पूजा करते सदैव ''अपवित्रो पवित्रो वा '' की ध्वनि कानों में हर घर में सुनाई देती थी और ये कुछ पलों का संस्कार पोंगापंथी नहीं वरन सहज होने की क्रिया है ----

Wednesday, 5 December 2018


---यादों के समुद्र में डूबती -उछलती ,यादों के जंगल को खंगालती ,अंधेरों को देखने की कोशिश में अंतर्मन को सूर्य की किरन बनाती ,घने जंगल में फैले झंखाड़ों को साफ़ करती -- ---पुराने से स्नेह लेने की बारी ----
=============
" बैठे ठाले का फितूर ,बेमतलब की बकवास "
(जिन्दगी की बाराखड़ी)
********************************
इश्क पुराने रेख्तों से ------
दिन प्रति दिन ,साल दर साल शरीर का क्षरण होता ही रहता है। प्रकृति की अपनी बराखडी है अपना रूप बदलती है वो ऋतुचक्र के साथ नयी पुरानी हो जाती है पर शरीर एक बार बूढ़ा हुआ तो सोच के माध्यम से ही पीछे जा सकता है और जाता भी है! तरो -ताजा होने को - सुहानी यादों में डुबकी ले - सद्ध्य: स्नाता की मानिंद तरो -ताजा हो जाता है। लम्बी यात्राओं के बाद जब थकान मन मस्तिष्क को शिथिल कर देती है तो पुरानी रचनाओं से स्नेह लेना उनके निकट जाना पुन: सृजन सा ही सुखद अहसास देता है ,उस वक्त के अहसासों का मानसिक मंचन और परिचालन, लिखने की भूख को शांत करने का मेरा प्रिय शगल होता है।तख्ती में लिखी बचपन की बराखडी की तरह अक्षर-अक्षर संग वो ही अहसास वो ही संवेदनाएं उछलकूद करने लगती हैं और कहने लगती है 'योग क्षेम वहाम्यहम् ' तू आ तो मेरे पास। शब्द शाखों के कानों में झूमर से डोलने लगते हैं और मैं खो जाती हूँ यादों में। …
बरसों ये सूरज चाँद सितारे जुगनू मेरे साथ जले ,चमके जगमगाये टिमटिमाये आज भी सबकुछ वैसा ही है प्रकृति उतनी ही हसीन है ,बस सांझ ढलने पे अपनी पोटली बांधने और चलने की तैयारी मैंने शुरू कर दी है | कितना कुछ है इस पोटली में शायद कुछ व्यक्त से अव्यक्त में भी साथ जाए अनन्त की यात्रा में |नदी, पहाड़, झरने ,जंगल, बाग़, बगीचे तितली, फूल, भंवरे, परिंदे और सागर; आज भी मन में वही तरंग जगाते हैं ,ताली बजाके उछलने का मन आज भी होता है कोई पागल समझे तो ये उसकी समझ का दोष है शायद हर उम्र में एक बच्चा तो इन्सान के भीतर रहता ही है जो बंधन में नहीं रहना चाहता है मन के किसी कोने से बाहर आने की कोशिश में रहता है और नकारने पे हमें खींच के बचपन की यादों के बागीचे में सैर करने को मजबूर कर देता है | 'ॐ नम: सिद्धम् ' के साथ स्लेट या पुती हुई तख्ती पे आड़ी तिरछी रेखायें खींचते हुये कब बच्चा बाराखड़ी और पहाड़ों के फेर में पड़ जाता है उसे पता भी नहीं चलता |और बस यहीं से ९९ के फेर में पड़ने का सिलसिला प्रारम्भ |
हाँ ! ये जिन्दगी भी तो बाराखड़ी की तरह ही है ;अ से प्रारम्भ होके सभी स्वरों को साथ लेते हुए व्यंजन और व्यंजनाओं में डूबती उतरती नैया की मानिंद ज्ञ तक का लम्बा रास्ता तय करती है | फुर्सत के क्षणों में चिंतन जब बीते हुए पलों में गोता लगाता है तो सारी यादें ,सारे बीते पल स्वरों और व्यंजनों की तरह उछल-कूद करने लगते हैं मन की कापी के पन्ने पे, कभी सपाट और कभी करीने से खींची गयी लाइनों पे चलते से -अलग -अलग रंगों की स्याही से लिखी इबारत , हर पल ,हर घटना ,हर मूड का अपना सुलेख ! कहीं मोती से उकेरे गये अक्षर हैं मानो मानसरोवर में राजहंस तैर रहे हों और कहीं लिखाई आकाश में बिखरे बादलों की मानिंद -जहाँ किसी भी अक्षर का कोई आकार ही नहीं है -अपना ही लेख पढना समझना कुछ दिनों बाद मुश्किल |
जिन्दगी की बाराखड़ी के रस्ते में शायद पूर्ण विराम नहीं है अव्यक्त से व्यक्त और अनन्त की यात्रा कभी प्रकाश तो कभी अंधकार -चरेवेति-चरेवेति एक राह से दूसरी राह एक चोले से दूसरा चोला --
'' वासांसि जीर्णानि यथा विहाय ,नवानि गृह्णाति नरोपराणी '' की निरंतरता | हाँ ! हलन्त् तो हम इसे बना ही लेते हैं ,जहाँ से आगे न बढ़ना हो ,किसी का साथ छोड़ना हो ,कहीं से मोड़ मुड़ना हो तो हलन्त् हमें खूबसूरत अंत सिखाता है ठीक वैसे ही जैसे सृज् धातु से सृष्टि बनी पर वहां भी अव्यक्त से व्यक्त की यात्रा है, निरंतर; पूर्ण विराम के स्थान पे हलन्त् ही है और मेरे जीवन को तो हलन्त् ने ही पकड़ रखा है ,आधी-अधूरी ख़ुशी ,पूर्ण निष्ठा और समर्पण के पश्चात भी कार्य न होना, सफल असफलताओं का अम्बार , ढेरों पूर्ण विराम थे जीवन के जो मैंने हलन्त् की खूबसूरती के साथ स्वीकार कर लिए ;जीवन का ककहरा सीखते हुए कैसे जिन्दगी कभी मूर्ध्यन्य हो गयी कभी तालव्य की तरह गोल-गोल घूमने लगी पर "ॐ तत्सत् " के साथ अपनाने से किसी भी परिस्थिति में मिठास कम नहीं हुई |आधे को हलन्त् की खूबसूरती देके पूरे का अहसास और फिर चल पड़ना दूसरी राह् ठीक वैसे ही जैसे अनजाने में तत्सम -तदभव् शब्दों में य र ल व् श स ष ह के साथ अनुस्वार के स्थान पर चन्द्रबिन्दु का प्रयोग वर्तनी की अशुद्धि है पर अर्थ स्पष्ट है | ऐसा नहीं है कि जीवन में हमेशा अनुस्वार की खूबसूरत सी बिंदी या चन्द्रबिन्दु का ताज नहीं रहा ( माँ होने पे तो ये साथ -साथ ही चलता है ) अपितु असंख्यों बार तो विसर्ग ने भी जीवन के सुलेख में जुडके उसे खूबसूरत अर्थ दिया है पर इसका आभास होने में समय लग गया | दुःख में विसर्ग : ने जुड़ के उसे कितने सुन्दर शब्द में ढाल दिया यदि दुःख में विसर्ग न होता तो दुख नग्नता का आभास देता | ये विसर्ग यदि समझ में आ जाए तो दुःख के पल सिमट जाते हैं मन के किसी कोने में विसर्ग की खूबसूरती लिए हुए वरना तो अनुस्वार कब खिसक के नीचे आ जाए और नुक्ता . बनके तालव्य को गले में जाने को मजबूर कर दे भान ही न हो |
बच्चे को बाराखड़ी और वो भी ॐ नम: सिद्धम् के साथ सिखाना ,सुलेख लिखना ,स्लेट पे बाराखड़ी लिखना फिर मिटाना फिर लिखना ,फिर तख्ती पे अभ्यास वो भी तख्ती की रंगाई पूताई के साथ फिर कलम की कत बना के सुंदर अक्षरों को उकेरने की प्रेरणा शायद जीवन रूपी रंगमंच की घटनाओं का रिहर्सल ही होता है |संयम ,,धैर्य ख़ुशी ,खोना- पाना ,दुःख -सुख सारे रसों से बालपन में ही परिचय ताकि सनद रहे |
यूँ ही बैठे ठाले अ से ज्ञ तक घूम आयी और एक बार बाराखड़ी फिर से लिख ली फिर से तख्ती पोती ,कलम में कत बनाई ,होल्डर की निब घिसी और सुलेख के बाद अब बाग़ में तितली के पीछे या सुंदर पक्षियों का कलरव - सागर किनारे दिल ये पुकारे ,आज भी अहसास वही हैं बस बड़प्पन का मुल्लमा उतारने की देर है और फिर तो --- दिल तो बच्चा है जी || ....आभा ...

Monday, 26 November 2018

"विरह का जलजात जीवन "
+++++++++++++++++
चिर वेदना की गर्म स्याही
वाष्प बन ऊपर उठी जब
मन  के अंगने  में -घिराये
कज्जल सघन जलधर  दुःखों के
सह न पाते भार जब दृग
अश्रु बन मधुमरंद के कन
बरसें  बनायें मन को   सरोवर -
नीलम से झलमल जल में जिसके
विरह के  जलजात खिलते
 विगलित दुःखों का सार लेके
गुंजरित होती हवाएं
मन भ्रमर बन नृत्य करता
नियति का वंदन नमन कर
जीवन ये जीने को मचलता -
है यही सबकी कहानी
कुछ की नई कुछ की पुरानी।।आभा।।

Wednesday, 7 November 2018

गोवर्धन पूजा .अन्नकूट यानि जड़ता पर बुद्धि की विजय ,संवेदन-हीनता पर भावनाओं की विजय ,सामाजिक दायित्व निभाने की पराकाष्ठा ,दीन दुखियों और सताए हुए लोगों को शरणागती में लेने का पर्व ,प्रजा की सुरक्षा और सुलभता के लिए राजा के कर्तव्यों की बानगी ।
संतति को गोवंश का महत्व ,संवर्धन और संरक्षण की जानकारी देने का दिन। 
गोवंश के अनादर और कुछ ही स्थानों में सिमित होजाने पे जमीन के बंजर होने की प्रक्रिया के शुरू होने की चेतावनी पे ध्यान देने का दिन। 
आज के इस पर्व को सार्थक बनाने के लिए हम भी कृष्ण की मानिंद संकल्पित होवें की अपने राष्ट्र से पूर्वाग्रहों और जड़ -बुद्धियों को उखाड़ फेंकेंगे ।देश का नेता पढ़ा-लिखा बुद्धिमान और चरित्रवान ही होगा जब देश में प्रत्येक कार्य के लिए शिक्षित होना आवश्यक है तो ग्राम-पंचायत से लेकर प्रधान-मंत्री और यहाँ तक की राष्ट्रपती तक की कुर्सी अनपढ़ लोगों के पास क्यूँ ।यही आज का संकल्प होना चाहिए की हम वोट  देंगे तो एक ऐसे व्यक्ति को जो उस पद की प्रतिष्ठा के अनुरूप हो ।स्वास्थ्य मंत्री ,शिक्षा मंत्री विदेश मंत्री ,सब की शिक्षा अपने अपने पदों के अनु रूप होनी चाहिए तब ही देश में फैली अराजकता और
संवेदन हीनता से मुक्ति मिल सकती है आप सब को गोवर्धन पूजा की शुभकामनायें 
आज की गोवर्धन पूजा ,दिल्ली का गोवर्धन ,भलस्वा ,गाजीपुर लैंडफिल साइट --और गोधन ,हर मोड़ पे हमारे इकट्ठे किये कूड़े के ढेर पे पॉलीथिन खाके बीमार होती या मरती गायें ---कान्हा अब तुम्हारा युग नही है ,छपन्न भोग केवल मठों में बनते हैं , चौराहों पे भूखे बच्चे बिलखते हैं --कैसे मनाएं गोवर्धन --हम लालची ,रूढ़िवादी ,और प्रपंची हो गए हैं ---प्रकृति का विनाश हमारा भी विनाश है --हम समझ ही नही पा रहे ---नेति नेति की अवधारणा वाली हिन्दू संस्कृति ,और समाज के लिए हानिकारक संस्कारों को समय -समय पे छोड़ने वाला हमारा धर्म अब रूढ़ियों ,प्रतिस्पर्धा और फूहड़ दिखावे में फंस गया है ----
----सुधार आवश्यक है ,ये हम ही करेंगे ,देश हमारा है ,हम प्रगतिशील हैं ,लचीली सोच है ,इसीलिये हम सनातन कहलाते हैं -सनातन वो जो देश काल और परिस्थिति के अनुसार अपने को बदलने की हिम्मत रखता है ---
पटाखे तो कम ही जलाओ भाई --गैस चैंबर बन गयी है फिजां --इसके लिए हमे चेतना ही होगा ---
शुभकामनायें ......................आभा


'बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जित: ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत ॥ ''
जीवात्मा आप ही आप का शत्रु है और आप ही आपका मित्र। और कोई हमारा शत्रु या मित्र हो ही नही सकता। इन्द्रियां अपने काबू में हैं तो आप आपने मित्र और नही तो शत्रु।
---शुभ धनतेरस में गीता का श्लोक क्यूँ !
जी --दीवाली का समय कचर-बचर खा लो  और शरीर ने विद्रोह कर दे  ,पर जीभ न माने न मानेगी  ; यानी इन्द्रियों से कंट्रोल गया - फिर थोड़ा और स्वाद --अब एसिड --नींद नही ,हलक में ऊँगली डाल के सारा खट्टा पानी बाहर निकालने की नौबत और फिर क्या कहते हैं वो --कचर-बचर की धमकी  ''दांत खट्टे कर दूंगा '' पर हम भी डटे रहते हैं मैदान में अबके आईयो बट्टा मारूँ वाली मुद्रा में --भई त्यौहारी सीजन है - खाएंगे भी नही ,पर जब पंसेरी लगी तो चारों खाने चित --अब दांत खट्टे ,कुछ खाने लायक नही-- करवाचौथ से जो त्यौहारी सीजन शुरू होता है कितना ही रोक लो गरिष्ठ हो ही जाता है और ऊपर से घर में रखे पकवान मिठाइयां ,चॉकलेट फल आँखों में टमकते रहते हैं -चखने का लालच देते हुए --बस तो आने वाली स्थिति क्या होगी उसकी  कल्पना करते हुए गीता का उपर्युक्त श्लोक उतर आया मन के एक कोने में एवं  मुस्कुराने लगा --बिटिया 
'' हैका पढाई बल गीता अर अफ्फु चली रीत्ता ''--
लालच बुरी बला है -- अपनी शत्रु खुद ही न बनना --
गीता पढ़ती है तो  अमल कर -सावधान रहना -तभी फायदा है --वरना तो उन्नीस का पहाड़ा है जब जरूरत हो गुणा किया ( किताब खोली ) और श्लोक हाजिर।
गीता जीवन के हर पल के लिये सूत्र देती है ,पर कहाँ समझ पाते हैं हम ,

इंसान हैं न अर्जुन की तरह अपने को भूले हुए --
कचर-बचर खाना है तो खाओ ,अपने शत्रु अपने आप होना क्या होता है मालूम चल जाएगा ----
शुभधनतेरस -------

धन को भी बर्बाद मत करना ,अपनी कमाई है बाजार को मत सौंपो ,वक्त बेवक्त काम आएगी।
पर सौंपते तो हैं ही हम बाजार को -मैं भी सौंप आयी --घर आके कुछ अनमना सा लगना शुरू हुआ तो दिल को तस्सल्ली दी -अरे वर्ष भर का त्यौहार है ---फिर जो चला गया उसे भूल जा -
पिछले वर्ष की लड़ियाँ लगा लो --पर आधी तो फ्यूज हो गयीं --
 मिटटी के दियों की खरीदारी वो भी एक- दो- तीन कई महिलाओं से ताकि सभी की थोड़ा-थोड़ा बिक्री हो जाए -कुछ साधारण कुछ रंगों वाले -
रंगोली के रंग लेके बैठा मरियल सा परिवार -पिछले वर्ष के रंग थे -फिर भी खरीद लिए -इनकी भी तो दीवाली है -
'दशरथ पुत्र जन्म सुनि काना | मानहुं ब्रह्मानंद सामना ||
परमानंद पूरिमन राजा | कहा बोलाई बजावहु बाजा |
दशरथ ने राम को पालिया है , वो परमआनंद में हैं | ब्रह्म को पाने से अधिक आनंद और क्या हो सकता है !
 ''त्रिभुवन तीन काल जग मांही | भूरि भाग दशरथ सम नाही ||''
और अब तो स्वयं ब्रह्मानंद का अनुभव पर फिर भी दशरथ बाजा बजाने वालों को बुला कर आनंद करना चाहते हैं ,क्यूँ ! क्यूंकि वो निज आनंद की अनुभूति को सबसे बांटना चाहते हैं | सामूहिकता की भावना ,अकेला मैं ही क्यूँ खुश होऊं ,सभी मेर संग संग उमंगें आनंद में | य
ही असली उल्लास है ,असली पर्व है ,यही "धनतेरस" है , 
मिट्टी के दीयों , हटड़ी-कुजे ,कंदील ,खील -बताशे ,मिठाई ,कपड़े ,
 सबसे अहं सफाई ,अर्थात समाज के प्रत्येक अंग को काम और प्रत्येक की कमाई |
 निरोगी काया ,स्वस्थ मन और स्वच्छ वातावरण ये तीनों धन तेरस के सूत्र हैं |
मोघाशा ,मोघकर्म ,मोघज्ञान के साथ- साथ विचेतनता की प्रवृतियों की भी सफाई हो ----
-धनतेरस सभी को शुभ -मंगलमय हो .
कुछ दिए उन शहीदों के नाम भी  हों जिनके घर अमावस गहरा गयी है----उनके घरों में समृद्धि आये --
सभी को धनतेरस की शुभकामनायें--आभा।।