Thursday, 30 January 2014

                   " लघु दीपक "
                   ***********
 स्नेह जला के जलता है जो ,
 वो लघु दीपक मैं बन जाऊं |
शलभ समीप नहीं पर आये ,
ऐसी  कोई  जुगत  भिड़ाऊं |
      स्मृतियों के बहते समीर में ,
       मेरी इस जीवन संध्या में ,
       सुख अधिक या दुःख अधिक ,
       महत्वहीन    ये   बातें    हैं |
       पतझड़ सी सूनी डाली है ,
       नीरव संध्या आने को है |
       कर विस्मृत बीती बातों को ,
       स्नेह जला कर जलता है जो ,
वो लघु दीपक मैं बन जाऊं ,
शलभ समीप नहीं पर आये ,
ऐसी कोई जुगत भिड़ाऊं |
     श्वास दग्ध पर आह न निकले ,
     दूर क्षितिज पर मिटता कुमकुम |
     तम   जीवन   को   घेरा    चाहे,
     पर   तारों   में   छवि   तुम्हारी ,
     दीपक  बन  आती  जीवन  में ,
     स्नेह जला कर जलता है जो ,
     उससे   ही   मैं   बल    पाऊं |
     शलभ समीप नहीं पर आये ,
     ऐसी कोई जुगत भिडाऊं |
गोधूली की  धूमिल बेला ये ,
बीते जीवन की वो घड़ियाँ ,
तकली की फिरकन सी घूम रही हैं ,
मेरे सूने से मन प्रांगण में |
इस नीरव निविड़ निशा में ,
जुगनू बन आती झिलमिल यादों को ,
कर दूँ तेरे चरणों में अर्पण |
स्नेह जलाकर जलने वाली ,
दीपक की बाती सा सुख पाऊं ,
शलभ समीप नहीं पर आये ,
ऐसी कोई जुगत भिडाऊं |
    इस अर्पण तर्पण में ,
      मन का उत्सर्ग  छलकता है ,
     देकर फिर कुछ न लेने का ,
     शुभ संकल्प  झलकता है ,
     जीवन संध्या की इस बेला में ,
       नयनो में यादों के सपने तिरते रहते ,
        जागी आँखों के ये सपने ,
        बीती घड़ियों की ये यादें ,
        चक्षु कहाँ से उर को देखें .
        अश्रु बहें तो तन मन भीजे ,
        हर कण को छू  पुलकित करदूं
       मिलन उत्सव पल -पल मनाऊं |
      स्नेह जला कर जलता है जो ,
      वो लघु दीपक मैं बन जाऊं ,
      शलभ समीप नहीं पर आये ,
       ऐसी कोई जुगत भिडाऊं |.........आभा ....

     
   
   
     
   

Saturday, 25 January 2014

              जय गणेश ,जय गणतन्त्र ,जय गण -गण .
             ********************************
जमाने की हवा ही कुछ ऐसी हो चली है कि कोई भी पर्व  हो धार्मिक ,सामाजिक या राष्ट्रीय ,आधुनिक ,तथाकथित बुद्धिजीवी और  सुधारवादियों के झुण्ड (मैं उन्हें झुण्ड ही कहती हूँ जो लोग  एक साथ मिल के अनर्गल प्रलाप करते हैं )के झुण्ड उसे न मनाने के तर्क रखने लगते हैं |  अब गणतन्त्र दिवस पे भी बवाल मचा है |  इस महापर्व को अप्रासंगिक बनाने का प्रयास --असुरक्षा और नकारात्मक सोच का  ही परिचायक है |असल में हम अति महत्वाकांक्षी हो गये हैं |  यदि हम अपने आस-पास के समाज में देखें कि जब  अति महत्वाकांक्षा जब होती है तो क्या घटित होता है ? तब हम केवल अपने ही बारे में सोचते हैं ? अपने लक्ष्य को पाने के लिए क्रूर और लज्जा-विहीन आचरण करते हैं | अन्य व्यक्तियों को एक ओर ढकेल देते हैं ,क्यूंकि आपको अपनी राह बनानी होती है |क्या ये सृजन है ? क्या ये क्रांति है ? हम बड़ी चतुराई से शब्दों की व्याख्या करते है और धीरे धीरे अपनी मेधा को खो देते हैं | मेधा (intelligence ) क्या है यह ?क्या सिर्फ सफल होने या  अपना अभीष्ट पा लेने से  ही इन्सान मेधावी बनता है ! शायद नहीं | भोर की बेला में प्राची में अकेले नाचते हुए सिंदूरी भोर के ता रे को महसूस करना और पानी में उसके प्रकाश को देख के रोमांचित होना , पक्षियों कीचहचहाहट सुनना ,हवा में तिरती सुबह की धूप से उडती ओस के साथ बहती सुगंध को महसूस करना ,किसी छोटे बच्चे के आनंद में अनायास ही उसके साथ ताली बजाते हुए उछलना,कबूतर की गुटरगूं में उसके साथ सवाल जवाब करना या  गिलहरी को फुदकते देख एक आत्मिक संतोष का मिलना ,ये छोटी -छोटी अनुभूतियाँ जब आपके अंदर उथल-पुथल मचाने लगती है ,तो जो अहसास आपके भीतर जगता है उसे मेधा यानी (intelligence ) कहते हैं| जिसके जग जाने से हम महत्वाकांक्षी तो होते है लेकिनहमारा संघर्ष .अधिक विचारपूर्ण ,समरस ,सरल विनम्र ,सृजनशील और अहंकार के परे हो जाता है |तब हम सर्वहारा के लिए जीते है ,अधिक प्रेम पूर्ण और आत्मविश्वासी  हो जाते  हैं | पर आज अधिकांश लोगों के पास  समय ही नहीं प्रकृति की इस दिव्यता को देखने और महसूस करने का |
      हमारे  पर्व -उत्सव और त्यौहार एक तरह से इसी मेधा को जगाने का कार्य करते हैं | सामाजिक और धार्मिक पर्व तो जीवन में उमंग और आनंद लाते ही है पर राष्ट्रीय पर्व तो उस उत्साह और उमंग को कईगुना बढा देते हैं | हम स्वतंत्रा दिवस न मनाएं क्यूंकि ये हमें गुलामी की याद दिलाता है ,तो ये तो एक सत्य है! गुलाम तो हम थे ही ,ये दिवस हमे और आने वाली सन्तति को हमेशा याद दिलाएगा उन संघर्षों की जो हमारे पूर्वजों ने किये और जिनकी कृपा से हम आज गर्व से कहते हैं कि हम भारतीय हैं , शहीदों के उन बलिदानों की जो भरीजवानी में ही हँसते -हँसते इस देश के लिए कुर्बान हो गये | और इस दिवस साल-दर साल धूमधाम से मानाने से ही ये यादे ताजा रहेंगी .देश भक्ति का जज्बा जागेगा आज की पीढ़ी में भी !बलिदानों की गाथा पढकर ,सुनकर और गा कर राष्ट्रीयता का जज्बा जगेगा | राष्ट्र से किसी भी प्रकार का द्रोह या भ्रष्ट्र आचरण
करने से स्वयं ही झिझक जायेगी आत्मा |
   गणतन्त्र दिवस ! आज की पीढ़ी को यदि हम ये  कहेंगे की आज इस दिवस की कोई प्रासंगिकता नहीं है ,और मनाने न मनाने का कोई अर्थ नहीं है तो ये एक राष्ट्र द्रोह से कम नहीं है | अरे आज के ही दिन तो हमें अपना संविधान मिला ,कुछ अधिकार -कुछ कर्तव्य |  चंद लोगों ने  अपनी  अकर्मण्यता ,अक्षमता ,लालच और भ्रष्ट -आचरण को छिपाने के लिए और अपने क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति के लिए   यदि संविधान   को बंधक बना दिया तो इससे इस दिवस की महत्ता नहीं घट जाती | लाल-बत्ती पे खड़े झंडे और गुब्बारे बेचते बच्चों के चेहरे की चमक में दिखाई देता है ये पर्व ,माना कि वे इस बात से अनजान हैं कि आज के दिन क्या हुआ था ,तो देश प्रेम के गाने चला के इन नन्हें बच्चों में ऊर्जा का संचार तो किया ही जा सकता है |
        हमारी पीढ़ी ने कहाँ स्वतंत्रता के संघर्ष को देखा ,पर तब इन पर्वों को मानना किसी पूजा से कम नहीं होता था ,प्रभात फेरी --हाँ ये मुझे सबसे अच्छा पहलू लगता था राष्ट्रीय पर्वों का | सुबह सवेरे जोश भरे गीत गाते हुए सड़कों पे निकलना | कितना जोश होता था |दिन भर कही वाद विवाद प्रतियोगिता कहीं कविता पाठ ,कहीं संस्कृत में ,कहीं अंग्रेजी में ,खेल कूद ,रात्रि में सांस्कृतिक कार्यक्रम और इस सबके लिए एक पखवाड़े से ही तैयारियां ,सारा का सारा स्वतन्त्रता संग्राम  मुख जबानी याद हो जाता था ,कवितायेँ ,गाने ,संविधान की जानकारी यूँ ही खेल खेल में मिल जातीथी |अब तो वो जोश ही नहीं है सब कुछ रस्म अदायगी हो गया है | पर अंदरखाने हम सब यही चाहते हैं कि राष्ट्रीय पर्व उसी पुराने जोशो -खरोश के साथ मनाये जाएँ | इससे राष्ट्रीयता की भावना में जो कमी आ गयी है उसमे  इजाफा होना निश्चित है और साथ ही नयी पीढ़ी भी इन पर्वों से जुड़ाव महसूस करेगी  |  ये तो अनुभूत प्रयोग है कि, आज भी -मेरा रंग दे बसंती चोला ,या है प्रीत जहाँ की रीत सदा ,जैसे गाने सुन के आज भी छोटे बड़े सब के खून में जोश आजाता है |तो क्यूँ नहीं इस गणतन्त्र को अपने  घरों में देश भक्ति के गीत खूब जोर शोर से बजाएं | ध्वनि - तरंगों से ही सब भ्रष्टाचारियों के दिल दहलने लगेंगे |  मौक़ा भी है दस्तूर भी है |
  सबको गणतन्त्र दिवस की शुभकामनाएं |  आती  बसंत में फिजायें देशभक्ति की सुगंध से सराबोर रहें और  चहुँ ओर देश प्रेम और देश भक्ति की बयार चले जो अपने साथ राष्ट्रीय  चरित्र का  वाइरस ले केआयेंऔर दशों दिशाओं में फैला के देश से गद्दारी करने की भावना को ही करप्ट करके डिलीट करदे  और  देश के गद्दारों को उनकी सही जगह मिले |  वन्देमातरम ! ....आभा ...

Tuesday, 14 January 2014

''मकर संक्रांति यानि उल्लसित बचपन                      की यादें ''
****************************
मकरैणी कौतीक ऐगे ऐ ददाजी ,
थरथराणी ,माघ लैगे ऐ ददाजी |
ए नातणी ;मिन भी त बाजार जैण
बीड़ी- तमाखू -लूण -गुड़ मोल लैण |
ए ददाजी म्यर जुगा तैं क्या ज लाला ,
"""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""
लाल मुख को बान्दरो कु पोतु लौलू  ,
तैय दगड़ी नातिणी कु ब्यो करालू |
                   या फिर ;
ऐ भिना कस के जान द्वारह्टा,
ऐ साली हीटू-हीटू द्वारह्टा |
नथुली ,कंकण कुछ भी नी छ  ,
कस के जाण द्वारहटा ,
मैं सुनार म गढ़ाव्लू  द्वारह्टा |
             या फिर
रासु तांडू खूब लागि,तू कई न आईथी रे ,
घुंडू मथ कु घघरू थयो ,
 मै तइन आई थी वै|
तेरी गैल्याणी सभी आयीं ,.
तू कई न आई थी रे ,
मेरा माथा मथ बेडू नी थई ,
मैं तईन  आई थी वै |
       माघ मेले में   इस तरह की  रंग -मंचीय ,सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और नाच -गानों का मंचीकरण ,उसके लिए कई दिनों की रिहर्सल , मेले की रंगीनी का उत्साह- ये था मकरसंक्रांति का अर्थ हमारे लिए बचपन में | एक पखवाड़े तक उन्मुक्त गगन के पंछियों की तरह रामलीला मैदान में लगने वाले मेले में घूमना और अपनी वर्ष भर की बचत को खर्च करके खुश होना- ये था मकरसंक्रांति का अर्थ बचपन में | सुदूर ऊपर के गाँव से उतर के आतीं ,कम्बल ,नथुली बुलाकी और मुरुखुली पहने ,बूढी -प्रौढ़ और तरुण , लड़बड़ी बांदों के, सौन्दर्य और सोने की  चमक से चमत्कृत होता मन , ये स्त्रियाँ दो बार ही ऊपर के गाँवों से नीचे उतरती थीं एक माघ मेले में और एक रामलीला में | सोने से लदी हुई ये रूपसियाँ जब बुलाक पकड़ के चाय सुड़कती थीं या गाजर का हलुवा और गुलाबजामुन खाती थी तो उनको देखने का  रोमांच ही अलग था | आज तो एक चेन पहनके घूमना भी मुश्किल है | मेले में तरह -तरह के स्टाल ,तम्बोला, जल परी,रंग बिरंगी चूड़ियाँ,रेशमी स्कार्फ ,एक से एक गहने ( जो साल भर हमें सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए चाहिए होते थे) ,हौल्टीकल्चर के स्टाल में चटनी मुरब्बा और अमरूद की कैंडी बनाना सीखना ,आर्मी और माउंटेनेरिंग के स्टाल ..सब ही हर वर्ष नए और ताजा ही लगते थे |
और सबसे अधिक ख़ुशी मिलती थी बड़ी वाली चरखी पे बैठ के जहाँ अक्सर मजबूती की परख होती थी |
        वो माँ -पिताजी के साथ ब्रह्म मुहूर्त में ही मणि -कर्णिका घाट पे जाके मुहं अँधेरे गंगा स्नान और लौटते हुए पैरों के सुन्न पड़ जाने का अहसास आज भी जेहन में ज्यूँ का त्यूं है मानो अभी ही स्नान से लौटे हों  | दूर -दूर से गंगा स्नान को आये लोग मानो -आस्तिकता और आध्यात्मिकता का समुद्र हिलोरें लेता हो , उसपर मंत्रोचारण यानी लहर -लहर चेतना का संचार |
         मकर संक्रांति का पुण्य पर्व काल और माघ मेले  का आनंद जो गंगा किनारे पहाड़ो पे रहते हुए लिया वो अविस्मरणीय है |  मकर संक्रांति ईश्वर को आभार प्रकट करने का दिन है ,गेहूं पे दाने आने प्रारम्भ हो जाते है और  चटख हरी रेश्मी साड़ी में सरसों के बेलबूटे और शनई के फूलों का गोटा किनारी झलमलाना शुरू हो जाता है |शरद ऋतू क्षीण होने लगती है ,और किसान थोड़ा आराम के मूड में होता है |लोहड़ी ,लाल -लोही ,खिचड़ी संक्रांत ,पोंगल ,बीहू ,उत्त्तरायिणी ,घुघूती ,या सबरी माला की तीर्थ यात्रा का अंतिम दिन{ जब सुदूर पर्वतों में दिव्य -ज्योति,एक दिव्य आभा --मकर ज्योति दिखाई देती है }  कुछ भी नाम हो ;आकाश में उड़ती असंख्यों रंग -बिरंगी  पतंगों की मानिंद  अपनी सारी रंगीन तमन्नाओं को पंख लगाके, डोर से बांध के , आकाश में छोड़ देने का उत्सव है मकर संक्रांति |
   वर्ष १९६४ की वह मकर संक्रांती जब हम गंगा स्नान की तैयारी कर के सोये और सुबह घर में चहल-पहल से पता चला की हमें तो संक्रांति का एक अनमोल उपहार मिला है हमारा छोटा भाई !  कभी न भूलने वाला उल्लास बन गयी |आज सोचती हूँ की मेरी माँ कितनी जीवट वाली महिला थी की वो गंगा स्नान की तैयारी कर रही थी ऐसे समय में भी ! आस्था और भक्ती की पराकाष्ठा |
      सब को शुभ हो मकर संक्रांति का ये शुभऔर पावन  पर्व ,    .................आभा ......




Tuesday, 7 January 2014

       "Absurdity -निरर्थक -बेतुका -बेढंगा "
*************************************
क्षण- क्षण  बदलती जिन्दगी  के परिवेश और उससे प्रभावित मन:स्थिति के माहौल में कृतियों का परायण करते समय रचना भी अपना रंग बदलने लगती है |अक्सर पुराने समय में विचरण करने के लिए उस वक्त में लिखी चंद कृतियों और कुछ चित्रों  के पास आकर उनसे स्नेह लेने से अच्छा कोई उपाय नहीं होता है | उन्ही पुराने गलियारों में घूमते हुए अपनी एक बेतुकी रचना से साक्षात्कार हुआ | सखियों के साथ कविता लिखने का जुनून और सीखने की प्रक्रिया के लिए प्रतियोगिता का लौलीपॉप ! यही करती थी हम सखियाँ | एक ही विषय या प्रसंग पे सबही को लिखना होता था और अच्छे बुरे का निर्णय भी हमारा आंतरिक  लोकपाल ही करता था | ऐसा ही एक प्रसंग लिया गया शब्दकोष से एक शब्द लेकर उसी पे कुछ पंक्तियाँ लिखनी  ! और तब बनी एक बेतुकी रचना | ब्लॉग में लिखने से पूर्व मन में ख्याल आया इसे कुछ ठीक करूँ पर फिर सोचा ये उस  अल्हड़पन की रचना है जब  हमारी सोच का दायरा  घर ,पढाई , सखियों के  चारो ओर ही घूमता था ,थोडा सा भी बदलाव इसके बेढंगेपन के प्रति घोर अन्याय हो जाता ---------------
शब्द -------फ ---------
  फुलकारी जो कढ़ी है माँ के दुशाले में ,
फुलवारी सी महक रही है ओ ! मेरी सखी |
फुरेरी बहुत है मेरे फुरेरू में ,
फुंकनी से फूंक के ,फुटके तले ,चीड़ के छिलके को दूँ सांस |
फुकैया नहीं हूँ ,मतलब की बस करूँ हूँ बात ,
फंटूश कैसा भी हो ,लूँ पल भर में साध |
फिकरा वो उछालूं हवा में ,
फिरकी से सब घूम जाएँ |
फूजला सब साफ़ कर दिया माँ मैंने रसोई से ,
फीका नहीं था खाना ,नमक ठीक था दाल में |
फरफरा रही है जो ये चुनर तेरी सहेली ,अरे! ये क्या ?
फुचड़ा निकल रहा है इस चुनर से क्यूँ ?
फुट्टैल है ये क्यूँ आंचल से विलग हुआ ,
फुंदने बना लेंगे अब इन रेशों से हम |
फुदकी सिखा रही है ---
 फुदकना  चुरुगनको ,
फुद्कें इधर -उधर हम सखियाँ भी संग -संग  यूँ ही |
फीस दी है आज क्लास में मास्टरजी को --(हमारे समय में फीस मास्टर जी को ही दी जाती थी )
फ्री नहीं है सरकारी स्कूल में भी पढाई भई |
फुट नोट देख के ,कापी में तू मेरी ,
फुल्ल-फुल्ल खिल रही है --
फूल गुलाब सी सखी |
फुटहेरा खाते हुए कल शाम रामलीला मैदान में ,
फिल्म शहीद देखी,जो बहुत अच्छी रही
फिकर नहीं है मुझे ,क्यूँ ?
फिरके उसने मुझे देखा ;
फंतासी में होगा ,दीवाना हुआ है |
फिरोजा देख के होता है कुछ दिल में ,
फिरोजी ही भाता है मुझे ये है कैसी पहेली |
फिसड्डी नहीं हैं हम आ खेलें कब्बड्डी ,
फिसलन भरा  आंगन है ,बारिश पूरी रात है हो ली |
फर -फर चली हवा ,सर्दी है सताती ,
फेनिल है ये झरने का जल , बूंदें ,ठिठुरन हैं जगाती |
फुलैल-तेल ,क्रीम -कंघा  सबही लगाते ,
फव्वारे के नीचे आ आग जलाएं |
फुलौरा -फुलौरी आ चटनी बनाएं ,
फूल गेंदुवा की माला मन्दिर में चढाएं |
फूफू की शादी है चलो धूम मचाएं ,
फूफू की शादी है चलो धूम मचाएं |
.........................................................अब  तो इस बेढब ,बेतुकी रचना को याद करके वो सुनहरे -सपनीले दिन याद ही किये जा सकते हैं जब किसी निर्थक बात में भी अर्थ खोज लेते थे | ऐसी ही छोटी -छोटी यादों में बचपन कहीं छिपा बैठा होता है जो जरा सी खिड़की खोलते ही सामने आके खड़ा हो जाता है |









Tuesday, 31 December 2013


आसमान में उड़ते  असंख्यों बर्फ के नर्म नाजुक धवल फाहों की मानिंद नव् वर्ष की शुभकामनाओं की बूंदा -बांदी |  चहुँ और उत्सव का माहौल , जोश ,जुनून ,बर्फीली हवा को चुनौती दे रहा महसूस होता है | ऐसे में मेरी ओर भी धुनिया की धुनकी से उडती हुई  रुई  के  फाहों सी शुभकामनाएं  नव वर्ष की |.आप सभी गुरुओं ,मित्रों और बच्चों को नव वर्ष मंगलमय हो | आने वाला समय सभी के जीवन में अपार खुशियाँ लाये और देश ,दुनिया के लिए शुभ हो | ...आभा ..

Sunday, 29 December 2013

            "जाने वाला पल आने वाला है "
"मैं समय हूँ ! चरैवेति -चरैवेति यही है  मेरी पहचान |  आज  वर्ष २०१३ ",तुम्हारे अनुसार" ;मेरी गति में लीन होने को है और २०१४ दहलीज पे  दस्तक दे रहा है | सच कहूँ ! मैं तो इस सब से परे सदैव एक सा ही हूँ ,स्वतंत्र होते हुए भी, नियमों के कठोर बन्धनों में बंधा हुआ ,अनुशासित शिशु सा. अपने कर्म को करता हुआ, न कभी आता हूँ न ही कहीं जाता हूँ ! सदैव बस गतिशील रहता हूँ | " यदि मैंने अपने अनुशासन से या बंधन से मुक्त होने की सोची भी तो ब्रह्मांड में उथल-पुथल हो जाएगी | नियम और बन्धनों में रहते हुए कैसे स्वतंत्र रहना है ,ये मैं प्रतिपल मानव को सिखा रहा हूँ |पर आज मानव; प्रकृति -प्रदत्त नियमों और सदियों से चले आ रहे सामाजिक बन्धनों को "अपनी व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के लिए" तोड़ने को ही समय की मांग कहता है | सहस्त्रों वर्षों से चली आ रही  कुटुम्ब की परिभाषा ही बदलने लगी है | हमारी सनातन संस्कृति की विरासत है - कुटुम्ब या परिवार .जहाँ प्यार -तकरार मनुहार -वैमनस्य -लड़ाई -झगड़े सबकुछ होते हुए भी- सामाजिक सुरक्षा है | अपनेपन का भाव है | किन्ही परिस्थितियों में जैसे -नाखून के बढने पे उसे काटा तो जा सकता है पर जड़ से नहीं उखाड़ा जा सकता -ये भावना सदैव रहती ही है | मानव आज मर्यादा में बंध कर रहने को अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता हा हनन समझने लगा है पर वो ये नहीं देख पा रहा वो कितनी भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता ले ले रहना उसे समाज में ही है  | परिवार में नहीं तो किसी और के साथ | और वहां भी कुछ तो बंधन होंगे ही, जो; संस्कारहीन होंगे जो; अशांति और विक्षेप का कारण होंगे |मैं समय हूँ! मानव को मर्यादा में रहना सिखाता ही रहूँगा चाहे कोई भी काल-परिस्थिति या युग हो क्यूंकि मर्यादा की सीमा रेखा लांघना कभी भी उन्नति का साधन , कारक या कारण  नहीं हो सकता | रामायण में समुद्र प्रभू से कहता है _______"प्रभु भल किन्ही मोहि सिख दीन्ही ,मरजादा पुनि तुम्हरी किन्ही ||   ______________________कि मैं तुम्हें राह देने को सूख नहीं रहा हूँ तो प्रभु ये भी तुम्हारी दी हुई ही मर्यादा है .यदि मैं सूख जाऊं या कहीं और बहने लगूं तो जल थल दोनों में हाहाकार मच जायेगा |
परिवार एक समयातीत सामाजिक संस्था है जिसमे प्रत्येक व्यक्ति साथ रहते हुए भी अपनी स्वतंत्र सत्ता रखता है |मैं समय हूँ ! मैंने सदियों से इस संस्था को अपने आंचल में पल्लवित -पुष्पित होते देखा है |आज भी इस नए कलेंडर वर्ष के समापन में मैं ऐसी ही कामना करता हूँ कि -भटके हुओं को राह मिले क्यूंकि अनुशासन हीन चंचल मन जिन अनुभवों को ग्रहण करता है ,वे अनुभव खंड रूप में होते हैं | इस प्रकार मन बाह्य जगत के अपूर्ण अनुभवों के उत्पादन में ही व्यग्र और व्यस्त रहता है |
             समय के साथ कलेंडर के पन्ने पलटते -पलटते कब ३६५ दिन व्यतीत हो गए पता ही नहीं चलता | अब २०१३ " कलैंडर वर्ष "के समापन का फिर से शोर है |अतीत के कार्य -कलापों का  स्मरण ,कुछ को पारितोषिक तो  कुछ को उपालंभ ,कुछ आहें -कराहें ,तो कहीं वाह -वाही भी | कहीं हरित दुर्बा की दूर तक प्रसारित धरणी तो कहीं काँटों से भरी झाड़ियाँ | और इसी सब में हम करने लगते हैं मूल्यांकन अपने पुराने संकल्पों का वो संकल्प जो पिछले वर्ष की पूर्व संध्या पे लिए थे |कहीं संतोष तो कहीं पछतावा ,साथ ही गढने लगते हैं नए संकल्पों की रूपरेखा और अपने लिए निर्मित करते हैं एक ऊँची कसौटी जो पुन:दूसरे वर्ष के समापन में पछतावे का कारण होगी |
      आज प्राणी  की सबसे बड़ी विडम्बना है कि वह  जीवन के एक ही पक्ष को विकसित करने में अपनी सारी उर्जा लगादेता है |समत्व नहीं है किसी के भी जीवन में |जो व्यक्ति शारीरिक बल से सम्पन्न हैं वो अध्यात्म को नहीं अपनाना चाहते ,जो प्रतिष्ठित हैं और समाज को दिशा देने की क्षमता रखते हैं वो संवेदनाशून्य हैं |कुछ बुद्धिमान लोग हैं पर वे अस्वस्थ रहते हैं |कुछ ऐसे भी हैं जो अध्यात्मिक और शारीरिक तौर पे विकसित हैं पर व्यवहार शून्य हैं | इस तरह से हम देखते है की आज हमारे चारों ओर सर्वांगीण विकसित मनुष्य नहीं हैं  |आज हम जिस युग में निवास करते है वो भौतिक कोलाहल से पूरित अशांत और दिशाहीन है |मानव चेतना को जागृत कर सके , समाज में और देश में चेतना का संचार कर सके ऐसा कोई भी व्यक्ति हमारे आस-पास दिखाई नहीं देता .तो हमारे लिए ये ही अपेक्षित है की हम बीते हुए समय में जा के ,अपने ही सद ग्रंथो को प्रयोगशाला बनाएं और उनसे प्रेरणा लें | नये वर्ष की इस पूर्व संध्या पे एक संकल्प लें कि प्रतिदिन गीता केतीन श्लोक और रामायण के ५ दोहे अवश्य पढ़ेंगे अर्थ सहित , अकेले या परिवार के साथ | हम सभी इस संसार में अर्जुन की भांति सतत युद्ध करते हैं | हमारा युद्ध जीवन की विषमताओं में समता स्थापित करने का होता है |हमारा उद्द्येश्य जीवन की विविधताओं में समत्व स्थापित करना है |और गीता हमें समत्व ही सिखाती है |योग शब्द को गीता ने मन की समता से जोड़ा है |केवल बाहरी क्रियाओं से नहीं मन से भी निष्ठावान बनाती है गीता  |"योगस्थ: कुरू कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय |
सिद्धयसिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ||"
योग में स्थित हुआ, कर्म को कर | गीता का योग कोई हिमालय में करने वाला योग नहीं है ये तो धरातल में रहकर प्रतिदिन के क्रिया -कलापों में करने वाला योग है | एक जागरूक चेतना जो सतत जागरूक है | तब भी जब आप प्रगाढ़ निद्रा में हैं ________सोचिये ! हम गहरी नींद में है ,अचानक कोई आवाज सुनके या अलार्म सुनके जाग गये ----जब हम नींद में थे तो किसने सुनी ये आवाज ? ये हमारी अंत:चेतना ही है जो सतत जागरूक है |उस सतत जागरूक प्रेरणा को धन्यवाद देना हमारा कर्तव्य है ,कुछ क्षण देखें हम उस चेतना को अपने उत्थान के लिए |ये चेतना बिजली की तरह है, जो उर्जा है ,प्रकाश है ,और हमारी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति करती है तो  जिसे येन -केन -प्रकारेण अपनी आवश्यकता की पूर्ति हेतु हम अपने घर में ले ही आते हैं|हमें बिजली की आवश्यकता है, बिजली को हमारी नहीं ,वो तो है ही अपने अस्तित्व को धारण किये हुए कई रूपों में व्याप्त |वैसे ही ये जागरूक चेतना (परमात्मा) हमारी आवश्यकता है |परमात्मा (चेतन तत्व) तो विराजमान है ही सम्पूर्ण ब्रह्मांड में |परमात्मा का ध्यान हमारी आवश्यकता है ,भौतिक-आध्यात्मिक और व्यवहारिक तीनो गुणों के समत्व विकास के लिये |आज हम इस समय के इस पल में ये संकल्प लें कि हम कुछ पल अवश्य निकालेंगे परमात्मा के लिए | वो कुछ क्षण ही हमें परमात्मा का लाडला बना देंगे | ये ही तो गीता की दिव्यता है कि वो माँ के सामान है |कुछ पल के साथ में ही वो हमें अपना लेती है और प्रसन्न होकर अपनी दिव्यता से हमें   उपकृत करती है ,जैसे बच्चा किसी भी आयु का हो ,माँ को ये पूछ ले की कैसी है ?तो माँ तृप्त हो जाती है |...ऐसे  ही गीता की शरण में आने पे आपके सारे योग क्षेम को वहन करने का भार परमात्मा ले लेते है -----------_________-सर्व धर्मान्परित्यज्य  मामेकं शरणम व्रज|
                                                अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि माँ शुच ||
प्रभु कहते हैं तू शोक मत कर !  मैं हूँ न तेरे साथ | तू अपने को पूरी तरह से विसर्जित कर दे |
यह आत्म -परमात्म -सम्मेलन व्यक्ति और समष्टि का योग और जीवन का अन्तिम उद्देश्य है |
    मैं समय हूँ ! मैंने  गीता के इस समत्व भाव  को और वैराग्य दर्शन को अपनी आँखों से देखा है | अत: आज मेरा यह निर्णय है  कि व्यक्ति और समष्टि के सम्पूर्ण और सर्वांगीण विकास के लिए गीता का अध्ययन ही एक मात्र साधन है | और यही  आश्वासन होना चाहिए हमारा जाते हुए वर्ष को कि तू जो हमे ये नया वर्ष उपहार में दे रहा है इसे हम गीता का उपहार देंगे |____________आभा _____________

Wednesday, 18 December 2013


**********************
''दिवस का अवसान समीप था ''
*********************** फुर्सत के कुछ क्षण मिल जाएँ तो दिमाग जिन्दगी का गुणा भाग करने लगता है और भागती दौड़ती जिन्दगी में अंत में अपने को रीता पा के सोचता है कहाँ गलती हो गयी |ऐसे ही फुर्सत के क्षणों में अवसान की अवधारणा |
*************************************
      दिवस का अवसान समीप था .गगन था कुछ लोहित हो चला |प्रकृति हमसे प्रतिदिन  संवाद करती है , वो कहती है !उदय तो विस्मयकारी .रोमांचक और खूबसूरत होता ही है -अवसान और भी सुहावना और स्नेहिल होना चाहिए | पर कहाँ समझ पाता है इन्सान प्रकृति की इस सीख को जब तक कोई चोट न मिले |
   लम्बी राहें,ढेरसी मंजिलें ,मान -सम्मान ,धन ,पद ,प्रतिष्ठा पता नहीं क्या -क्या चाहिए हमें और क्यूँ चाहिए ? सडकों पे भागती दौड़ती जिन्दगी ,वाहनों का जाल, ( आज कल महानगरों में रहने वालों का एक चौथाई समय तो सड़कों और वाहनों में ही गुजरता है )और   जीवन जीने की हडबडी में__ जीने की अभिलाषा ,मन मुताबिक़ जीवन जीने की तमन्ना अक्सर हाशिये में लिखे नोट्स की तरह ही हमारे साथ-साथ चलती है जो  पहला मौक़ा मिलने पे मछली की तरह सांस लेने ऊपर चली आती है | ऐसे ही लेखनी हाथ में आते ही  अक्षरों की बूंदा-बांदी होने लगती है और तमन्नाएं वाक्यों का झरना बन तेजी से  बनती बिगड़ती पानी की बूंदों की मानिंद  आकार  लेने लगती हैं | मन के उद्गारों को कैनवास पे उतारना  भी शायद सांस लेने की ही प्रक्रिया है मेरे लिए | घर -परिवार -समाज में  जीवन के  चंद  लम्हें प्रकृति के सानिध्य में ,अपने आपके साथ ,अपने अंतर्मन में उतरने की कोशिश |डूबते सूर्य की रोमांचकारी सुनहली लालिमा और सागर का विस्तार ,अनंत की राह की ओर बढ़ते कदमो को महसूस करने को बाध्य करती है . रात्रि के आगोश में अपनी थकन उतारने जाता सूर्य मानो कहता है अवसान दिवस का हो या जीवन का  खूबसूरत और  नर्म- नाजुक ही होना चाहिए | जीवन का अवसान ! ये भी तो आत्मा के सांस लेने की ही प्रक्रिया है |जीवन की आपाधापी में आत्मा की बचपन से बड़े होने तक की अनथक यात्रा |जिसमे शायद आज ही स्पष्ट है | यदि भविष्य का ज्ञान हो जाये तो जीवन का स्वरूप क्या होगा इसकी कल्पना भी कठिन है |साथ ही यदि भूत को साथ लेके चलें तो राहकी थकन ही पैरों की जंजीर बन जाए | बंद राहें और मंजिलों की अस्पष्टता ही शायद जीवन को गति देती हैं | वरना तो ; जीवन आज के सिवा कुछ भी नहीं | पिछ्ला कैनवास धुंधला है , विस्तार इतना है कि याद करने के लिए एक समय में एक छोटी सी जगह की धूल साफ़ करके बस उस समय की घटनाओं में ही जा सकते हैं |पिछले पूरे जीवन को एक साथ यादों में जीना कठिन ही नहीं असम्भव भी है |भविष्य के लिए तैयार कैनवास पे आप रेखाएं ही खींच सकते हैं ,उसका स्वरूप तो अविगत ही है |आज बस आज;अब और ये पल ;यही जीता है मनुष्य और इसके लिए कितनी जद्दोजहद ,कितने रिश्ते नाते ,कहीं दोस्ती ,कहीं दुश्मनी | हम जैसे आये थे संसार में उससे अलग कुछ और ही हो जाते हैं |अपनों को खोने के बाद इस संसार की असारता और अवसान की खूबसूरती का भान हुआ है मुझे भी | प्रकृति का ये सन्देशपहुँचने लगा है पूरी शिद्दत से |जो अवचेतन में था वो जागरूक होने लगा है | तब से कोशिश है अपने को पुन: पाने की |  ये भी भान हुआ कि इन्सान जीता तो एक जगह में है पर मरने के बाद वह हर परिचित (दोस्त या दुश्मन )के भीतर अपनी जगह बना लेता है ,उसका होना धुंधला पड़ जाता है पर उसका न होना उजला हो जाता है ,अहसासों में बस जाता है वह, मानो पास ही बैठा है यहीं कहीं ,हम सबके साथ ,एक जैसा नहीं पर अलग- अलग सबके मन में उनके ख्यालों के अनुरूप | इन्सान अपनी मृत्यु के बाद दो बार मुक्त होता है --पहली बार अपनों से और दूसरी बार अपने से पर इस मुक्त होने की प्रक्रिया में वो जो  यादें छोड़ जाता है वे सदैव के लिए अपनों के स्मृतिपटल पे चित्रित हो जाती हैं | कोशिश है क्यूँ न सबको खूबसूरत यादें दी जाएँ ,ताकि अवसान की बेला में मैं भी डूबते सूरज की इन  स्वर्णिम किरणों की मानिंद ही अनंत के इस सागर की लहरों से टकरा कर इतनी ही नर्म नाजुक सुन्दरता से अभिसारित हो अपने प्रभु की शरण में जाऊं | मीरा की तरह निश्छल और धवल ताकि आत्मा को सांस लेने में घुटन न महसूस हो |........................................आभा .......