Sunday, 24 May 2015


What's on your mind -----आजकल तो गर्मी का प्रकोप ,जोक भी सारे सूरज पे ,बेचारे को दोषी ठहरा के अपने कुकृत्यों के छुट्टी --सारे जंगल काट के कंक्रीट के बेतरतीब जंगल उगा दिये ,नदी नाले तालाब सब गंदे नाले बन गए ,भूजल के अति - दोहन से धरती को बंजर बना दिया पर दोष सूरज पे वो ज्यादा गर्म हो रहा है ,अरे वो तो सदैव ही इतना गर्म है। मैंने देखा सूरज पे धरती के वातावरण का क्या असर पड़ा ,--वो भी परेशानी में है --देखा तो लिखा कुछ बच्चों के लिए -----
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''चढ़ा सूर्य को तेज बुखार ''
चढ़ा सूर्य को तेज बुखार
दिन पर दिन वो तपता जाये ,हो बेचैन हांफता जाये
मैया -मैया ; शोर मचाये , न कुछ पीये न कुछ खाये।
छोड़- छाड़ कर सारे काम ,मैया दौड़ी -दौड़ी आयी ---
बड़े लाड से गोद बिठाया ,मुख चूमा और सिर सहलाया।
बच्चे का मुहं लाल हो रहा ,उस पर तपता जलता माथा ,अकुलाहट
-बेचैनी से बच्चे को निंद्रा न आती ,सांस उखड़ -उखड़ सी जाती।
मेरा चंदा तड़प रहा है , ज्वर-ताप से झुलस रहा है
[(मैया ? मैया ही होती ,लाड़-लाड़ में; सूरज को भी चंदा कहती! )]
अरे! कोई तो वैद बुलाओ , मुन्ने का ज्वर ताप भगाओ।
मेरा मुन्ना जग का पालक ,गर ये ही तपता जायेगा
जीव जन्तु सब जल जाएंगे ,चातक- कोकिल कुम्हलायेंगे
आसमान की परियों जाओ ,वैदराज को ढूंढ के लाओ
परियों ने फिर ढूंढ मचाई ,पवन वैद को संग-संग लायीं।
सर -सर ,फर-फर हवा चली , पल में ,लू में वो बदली
पास पवन आता जाता औ मौसम और बिगड़ता जाता।
धरती पे भी लू चलने पे ,पशु-पक्षी जन-जन अकुलाये
ताल -तलैया सूखे सारे ,वन -उपवन सब ही मुरझाये।
सूरज मुन्ना व्याकुल होकर ,मैया- मैया शोर मचाये
ना डर मेरे प्यारे मुन्ने मैया संग -संग ही है तेरे। ---
क्रोधित हो मैया ने तब ,पवन वैद को भगा दिया है
परियों को आदेश हुआ ,दौड़ो-- दूजा वैद ले आओ।
अमलतास -गुलमोहर ने तब ,परियों को है पास बुलाया ,
फूलों के कालीन बना, देश-देश उनको पहुंचाया।
कोई वैद न कोई भेषज ,कलयुग में '' महावीर ''कहाँ ?
लाडेसर बोला मैया से ,जो तू खुश हो मैं, बादल संग खेलूं ?
लुका - छिपी ,आइस -पाइस ,स्टेपू, पकड़म-पकड़ाई
बादल औ मैं ; सखा बचपन के तू कहती थी , लंगोटिया भाई।
संग-संग जब हम खेलें कूदें, कभी ताप ज्वर ना होता
तू भी व्यर्थ न अकुलाती है ,सारा जगत चैन से रहता।
गयी बादलों को हुंकार
आओ-आओ सूरज द्वार
परियां ढूंढें घाट -घाट
जंगल जंगल औ चौबाट।
पर बादल तो लुप्त हो गए ,
बरस बेमौसम ! सुप्त हो गये
मचा सकल जग हाहाकार
सूरज का क्यूँकर हटे बुखार !
पेड़नहीं -कैसे बादल ?
जंगल कटे औ नदियाँ सूखीं
हिम जगती की पिघल रही है
,बादल!
कैसे बने; कहाँ से आयें ?
गईया -बछिया सोच रही हैं ,
धरती मइया सोच रही हैं
क्या ?
ये मानव मेरी ही संतान !
क्यूँ ब्रह्माण्ड को किया हैरान ?आभा।।

Friday, 1 May 2015

               [ ये पत्नियाँ ]
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बचपन में एक बार सर पे पड़ने पे या यूँ कहूँ  कि  माँ के प्रोत्साहन से आठ दस लाइनों की एक कविता बना दी ,वो भी माँ से ही पूछ-पूछ के ही ,अपने तो उसमें दो चार शब्द ही थे ---लो जी  हमें  तो  अपने  कवियत्री होने का भान सा होने लगा जो कालांतर में साहित्यकार होने के भूत की तरह सर चढ़ के बोलने लगा --और हम अपने को हिंदी साहित्य का एक स्वनामधन्य हस्ताक्षर समझने लगे। आश्चर्य की बात तो यह कि जिंदगी की सारी  समस्याओं उलझनों और कठिनाइयों की जूतम-पैजार के बाद भी ये भूत  नहीं उतरा ,साहित्य की जरासी फ़टी चादर में जो टांग फंसी तो ऐसी उलझी कि  आज भी वहीँ फंसी  हुई है। बुद्धि का हलुवा हो गया है या यूँ कहूँ  कि दिमाग की दही जम चुकी है खट्टे वाली पर मजाल कि साहित्य का नशा उतरे। शादी के बत्तीसवें वर्ष में  ही अजय ने पत्नी के फिजिकल उत्तरदायित्व से मुझे मुक्ति दे दी  , मार समय की और पल्ले समय  ही समय --अब पत्नी के नाम पे अजय की बहू  का रोल ससुराल में और बाकी तो माँ ,बहन ,सास ,दादी ,बुआ ,मौसी ,चाची ,भाभी ,मामी --ऐसे रोल जिसमे पत्नीपन नेपथ्य में चला गया।  अब खाली समय और  साहित्य सृजन के लिए बेताब मन ,लेखनी कुलबुलाई ,जो सामने हो वही  शिकार बन जाता है --और वो मासूम सा शिकार आज मैं पत्नी ही हो गयी।
सो आज पत्नियां  शीर्षक --अब कटाक्ष पहले अपने पे होगा तभी तो पती  नाम के जीव पे भी लिख सकूँगी वरना  तो पक्षपात कहलायेगा न।
जी  जनाब! मेरे आस-पास खूबसारी  पत्नियां निवास करती हैं। सुंदर,मनमोहक ,कमसिन ,अधेड़ ,काली पीली ,गोरी -मृगनयनी ,चन्द्रबदनी ,मयूर सी चाल वाली ,या सधी हुई चाल वाली -घोड़े की जैसी या फिर कोई अपने ही भार  से लचकती हुई ,मानों  एक टांग घिस के छोटी हो गयी हो ,जवानी का बोझ ढोते- ढोते।
बेटियां जो खेत को देख के ही नहीं ,गेहूं की बाल का मुआइना करके छांटी -बांटी जाती हैं।  बेटियाँ  जो ऊपर से ही अलॉट होक आती हैं पत्नी पद के लिए --हर पती  के नाम की एक पत्नी।  पत्नी जो  बरात के साथ बड़े शान से लायी जाती है ,पत्नी जो ससुराल प्रवेश के साथ ही अपने साथ लाये सामान को न्यौछावर  करना शुरू कर देती है।  पत्नी जो हर घर  के लिए एक तो   अलाटेड ही है, ऊपर से.  सास ससुर भी साथ हों तो एक घर में दो पत्नियाँ। संयुक्त परिवार में तो न जाने कितनी पत्नियां पर वो समां कुछ और था अब कितनी सारी पत्नियों वाले नजारे कहाँ ! पत्नी जो भी है जैसी भी है , खूब ठोकबजा के ,पत्री मिला के ,दहेज के साथ और नयी गाडी ,जो उसका पिता देता ,के साथ लायी जाती है।
पत्नी जिसको सरल ,मधुर ,सुघड़ ,कान्वेंट पढ़ी ,घरेलू ,सिलाई-बिनाई जानने वाली होना ही चाहिये।  पती  के दिल तक पहुंचने का रास्ता पेट से होकर गुजरता है तो उसे खाना वो भी स्वादिष्ट वाला बनाना न आये ये कैसे हो सकता है। पत्नी जो  सर्विस करती हो।  पत्नी को चाहिये  अपनी '' पे  ''ससुराल पे ही लगाये अपने मायके न दे कुछ भी।  पत्नी सुबह उठ के चाय बनाये,पती देवता को प्यार से दे ,बच्चों को प्यार से उठाये ,तैयार करे ,नाश्ता करवाये लंच पैक करे ,स्कूल छोड़ के आये ,घर आके सैर करके आये ससुर को चाय और नाश्ता --अब दो पत्नियां हैं काम करने के लिए।  आफिस जाते पति को फ़्लाइंग किस देती पत्नी --मन में सोचती हुई जाओ बाबा ये चोंचले करने का वक्तकहाँ है मेरे पास।  घर समेट फिर  आफिस जाती पत्नी। तेज गाडी चलाते हुए ''आंटी क्या फुल  चलारी ,अपना नी  तो दूसरे का तो ध्यान कर '' और धीमी चलाये तो जाम में फंसी पत्नी ''ओय मैडमजी जब चलाना  नी आता तो गाड़ी निकालती क्यों हो ''.
जो पत्नियाँ नौकरी नहीं करतीं वो पती  के ड्यूटी जाने के बाद घर में छूट जाती हैं ,अब इनकी कई कैटेगरी होती हैं उम्र और हैसियत के हिसाब से --कोई घर का काम संगवाती है ,कोई सैलून जाके अपनी झाड़ पोंछ करती है -'निगोड़ा पती न जाने कितनी सुंदरियों को घूरता हुआ आएगा ,मैं उन्नीस न लगूं  उसे ' कोई किट्टी में जाती हैं ,कोई समाजसेवा के लिए निकल जाती हैं सैलून के रास्ते से ,और कुछ तो निखट्टू द्वार पे खड़े होक इसकी उसकी करने वाली। कुछ मेड  नाम की पत्नी से ,धोबन से भिड़ने वाली, वो बेचारी पत्नी जो अपने घर का काम निबटाके और मुहल्ले में चार दिन बाद आये पानी के टैंकर से लड़-भिड़ के ,पानी भर के आई है साथ ही शराबी पती को भी सबक सिखा के और खुद पिट के आई है।
खैर साहब ये पत्नी जो होती है उससे ये एक उम्मीद अक्सर होती है ,वो जुगाड़ू हो ,रिश्ते निभाये ,घर को बाँध के रखे ,जिद्दी और बद्तमीज नन्द को प्यार दे ,बिगड़े देवर के सौ  खून माफ़ करे ,अड़ियल पती को सर आँखों पे बिठाए ---और साथ ही कम -खर्च बालानशी  हो।  सब्जी लेती जो पत्नी एक एक रूपये के लिए सब्जी और फल वाले भइया से लड़ के पैसे बचाती है ,जो  बुद्ध औरबेफे या जुमे के बाजार जाके सस्ती और ताज़ी सब्जी के थैले उठाये पैदल चलती आती है --वो यदि एक साड़ी  की डिमांड करे तो पती नाम के जीव का मूड बिगड़ जाता है।
पत्नी जो दुनिया भर का प्यार उड़ेल दिन भर में नयी डिश तैयार करती है  या मोमोज ट्राय करती है --ईनाम में सिकुड़ा हुआ मुहं --हुंह  --इससे तो बाजार से मंगवा लेते --और बाजार से मंगवाने को कहे तो पैसे का रोना।
    कुछ पत्नियां विदुषी होती हैं अपने विचार रखना चाहती हैं ,पर 'अरे फिर की न वही  औरतों वाली बात ' चाहे वो पत्नी अपनी कम्पनी में सी ई ओ ही क्यों न हो --घर में है वो सिर्फ पत्नी। और असहमति पे पतिदेवता के मुहँ  फुलाने पे उस को मनाने का भार भी पत्नी पे ही आता है न चाहने पे भी घर की सुख शांति के लिए उसे ये कठिन कार्य करना ही होगा।
अक्सर पड़ोस में आई नई खूबसूरत पड़ोसन को घूरते  और उससे घंटों  बतियाते  पती को इग्नोर करती पत्नी को  जब बाजार में कोई पुराना  क्लास-मेट  मिले तो -- उसके कहने पे ''तुमपे तो सारी  क्लास फ़िदा थी ,दीवाने थे हम तुम्हारे ,वो तो सर इसी ने घास नहीं डाली ,आप तो बहुत लकी हो जो ये मैडम आपको मिलीं ''   जल -भुन  के राख हो जाता है पती और पत्नी को आदेश ये बेशर्म आदमी मेरे घर नहीं आना चाहिए , और उसी  पत्नी को यदि   पती अपने  दोस्तों के बीच ले जाए तो  गर्व से   हाथ थामे  हुए घूमते हुए  पती के दोस्तों को चेहरे में  प्लास्टिक की मुस्कान लिए  खुश  दिखती पत्नी।
  पर ऐसा भी नहीं है की हर घर में यही किस्से है।  कई घरों में खूब खुश हैं पत्नियाँ।  करवाचौथ ,वटसावित्री ,शादी की सालगिरह ,जैसे अवसरों पे उसे खूब सजने संवरने का मौका दिया जाता है --ताकि फिर साल भर वो उलाहना न देती।  इतने से ही खुश हो न्यौछावर होती भोली भाली पत्नी। कभी- कभी गाहे -बगाहे पती नाम का ये जीव उसे बाहर डिनर के लिए या लॉन्ग ड्राइव के लिए भी ले जाता है ,और फ़िदा हो जाती है पत्नी।
सस्ती सुंदर टिकाऊ ईमानदार ,हो पत्नी ये तो एक जरूरी शर्त है साथ में झगड़ालू न हो ,दब के रहे।  सेहत का भी ध्या रखे ताकि समय और पैसे की बचत हो।  बच्चों को खुद ही पढ़ाये पत्नी चाहे, बगल में बैठे लोग टी वी  का शोर ही क्यों न कर रहे हों।
आधुनिकता का लबादा ओढ़े समाज में कुछ तो बदलाव की बयार चली है।  पत्नी अब काम के साथ-साथ जिम भी जाने लगी है ,डिस्को भी जाती है। शॉपिंग भी अपनी मर्जी से कर ही लेती है ,सास ससुर के सामने पती से फ्लर्ट भी कर लेती है ,अपने दोस्तों को घर में बुलाती पत्नी भी दिखाई देने लगी है अब। पती के सामने कलीग से सेकहैंड भी कर रही है पत्नी अब ,अपनी मन पसंद के कपड़े भी पहन लेती है पत्नी अब --पर फिर भी ये सब बातें अभी भी ऊपरी है --समाज में मॉडर्न दिखने के लिए --घर में तो आज भी उसका दर्जा वही  एक अदद पत्नी जो ऊपर वाले ने उस घर के लड़के के लिए अलाट की है।
बेचारी ये कन्यायें --पढ़ती-लिखती खेलती कूदती माँ -बाप के घर में धमाचौकड़ी मचाती ,अपनी चहचहाट से जब सारा घर गुञ्जा  के रहती थीं तो इन्हें गुमान भी नहीं था कि  इन्हें एक अदद पत्नी बनने के लिए उतारा गया है आसमान से ,ये अलॉटेड हैं पहले से ही किसी के नाम ,और उस पे ये नासमझ कभी-कभी प्यार भी कर बैठती है --यदि ऊपर  से मुहर लगा बंदा न हो तो दिल टूटना पक्का ---बाबुल के घर की चहकती  चिड़िया ---ससुराल के पिंजरे में बंद पत्नी ----चाहे किसी भी रोल में हो घर में आफिस में ,पहली शर्त एक अदद अच्छी पत्नी हो ताकि सनद रहे।।आभा।।





























Wednesday, 29 April 2015

                     कलयुग
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 [ कहाँ का ईंट कहाँ का रोड़ा ,भानमती ने कुनबा जोड़ा --मस्तिष्क में चलती विचारों की आँधियों में धूल धक्क्ड़ जैसे विचारों को सहेजना --सही में भानमती का कुनबा ही बन जाता है ======================================================================
कलपुर्जों का युग ,तकनिकी का युग ,और तकनिकी में आविष्कारों और नवीनता का युग।  ये भी तो पहले से ही निश्चित था न-   एक ऐसा ही युग होगा जिसे कलयुग कहेंगे। ' गतानुगति को लोको ' जहां मानवीय संवेदनायें  भी कलपुर्जा ही बन जाएंगी। संस्कृति ,साहित्य -वही सब पुराना , लीक पे चलना।  मुट्ठी भर क्रांतिकारी , साहित्यकार --और आज तो वो भी तारा  बन के आकाशमंडल में जगमगा रहे हैं। कलयुग की एक रीती -बुद्धिजीवी वही ,जो नकारना और संदेह करना जानता हो बस यही मौलिक अन्यथा सब उधारी का पिछले युगों से।
आज गीता पे चर्चा -जी नहीं आज कान्हा का गायन -वो कन्हैया जो मक्खन से भी कोमल वज्र से भी कठोर है , जो कण -कण  में व्याप्त है ,विराट है पर सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है ----
  '' सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
    अहं त्वा  सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि माँ शुच।।---------की विराट एवं वातसल्य मयी  पुकार से -हमें कर्तव्य बोझ से मुक्त करने की चिंता में रहता है , माँ की तरह जैसे वह अपने बच्चे के कीचड़ में गिरने पे उसकी गंदगी साफ़ करने को आतुर रहती है वैसे ही कोमल मन कृष्णा शोक-संतप्त मानवता के लिए दिव्य-आह्वान करता है -'' माशुच '' का आह्वान--तू उतार फेंक आडंबर और आ मेरे पास।  आज इस कलयुग में ,हम उस गीता को  कान्हा की नहीं व्यासजी की रचना कहके --कान्हा के अस्तित्व को ही नकार देते हैं। जबकि गीता में ही विभूति योग में  कान्हा ने व्यास को अपना ही अवतार  बताया है ---''मुनिनामप्यहं व्यास:''  .
पर आज गीता का गायन नहीं बस कान्हा का गायन।
एक नटखट बंसी बजैया ,रास रचैया -जो गंवई गाँव में धमाल मचाता  है --सारा गांव माँ यशोदा और नंदबाबा के पास उलाहने लेके जाता है ,माखनचोर ,नटवरनागर ,गोपियों को सतानेवाला। मैं सोचने लगती हूँ --आज कोई  सोसाइटी का बच्चा रोज आये ,हमारे फ्रिज से चुराके खाये और अपने संगियों को भी खिलाये , राह चलती लड़कियों को छेड़े  तो उसके माता-पिता तो समाज में मुहं दिखाने के काबिल नहीं रहेंगे। बालक को भी बाल सुधार -गृह में डाल दिया जाएगा। और बाल -सुधार गृह में क्या होता है ये तो सर्व -विदित ही है क्यों लिया होगा कन्हैया ने कारगर में जन्म ? इसलिए कि  हमें संदेश दे ,  मानव वही  जो जन्म  से  क्रांतिकारी हो - तो तोड़ो सारे बंधन ,मुक्त होओ।
आज पनघट तो हैं नहीं ,न ही कुँए -बावड़ी -तालाब का जमाना है। हम विकसित समाज हैं ,बोतल बंद  या आर. ओ  का पानी पीते हैं खरीद के. न वो समाज, न उसकी मासूमियत।  मासूम तो खैर बचपन भी नहीं रहा।  कान्हा के साथ  कंदुक क्रीड़ा करने वाले बच्चों की  अब टीवी सोसियल मीडिया से भावनाएं कुत्सित और विकृत होती जा रही हैं। अब मधुर छेड़खानी और जीवंत चुहलबाजी का स्थान विकृत बलात्कारों ने ले लिया है।  आज कन्हैया की प्रासंगिकता और भी अधिक है --समाज उसी संवेदना ,मासूमियत और सहजावस्था को लौटना तो चाहता है पर परिस्थियाँ आड़े आती हैं।
आज सुबह से ही मेघ बरस रहा है  झमाझम ,ब्रह्म-मुहूर्त -हल्की सी ठंडक और मैं यहाँ  बालकॉनी  में खड़ी  कृष्ण -कृष्ण बोल रही हूँ --सोच रही हूँ कैसे एक नटखट ,बिगड़ैल ,गवँि  गाँव का बालक --जो कभी पूतना को मारता है ,कभी  वासुकि के फन पे नाचता है , इंद्र के प्रकोप से बचाते  हुए ,राधा -गोपियों से अठखेलियाँ  करते हुए ,समाज को जीवन का पाठ पढ़ा गया --गीता दे गया --युगों युगों के लिए।
देखती हूँ मेरी कल्पना साकार होने लगी --मेरे समक्ष कृष्णा ,अरे हाँ ! ये तो कन्हैया ही है -----वही रूप जो सदियों से मेरे मन में बसा है ,छोटा सा नटखट -हाथ में बंसी ,माथे पे मोर मुकुट, गले मैं वैजयंती माला।  मैं हतप्रभ क्या ये हेल्युसिनेशन है ,अभी दो दिन पहले ही तो सत्तावन वर्ष की हुई हूँ --हाँ बुढ़ापा भी आ ही गया है ---तभी कान्हा ने बंसी में टेर  लगाई मधुर संगीत     और बोला दादी --- मैं तो मीरा सी बावरी हुई ,पधारो म्हारे देश भी न बोल पायी ,बड़ी मुश्किल से भावनाओं को चाबुक लगाई ,और कान्हा को भीतर लायी --बलैयां ली निछावर किया मन प्राण ,लल्ला को दूध मलाई दिया ,मीठा परोसा  और पूछा --कान्हा तू  दोग्धागोपाल  ,मथुरा ,वृन्दावन ,बरसाने में उद्धम मचाता हुआ कैसे आने वाली सदियों के लिए गीता दे गया ,एक ऐसी विरासत ,जो हमारी  चेतना की अमूल्य थाती है ,हमारी सांस्कृतिक ,आध्यात्मिक विरासत है  --कैसे कैसे कान्हा ?
नटवर नागर ने स्मित  हास्य ,कुटिल दृष्टि और तंज से कहा --क्या दादी ; तू भी भावनाओं में ही जीती है ,बुद्धिजीवी तो है ही नहीं।  आज का बुद्धिजीवी वर्ग तो गीता को व्यास मुनि के द्वारा लिखी हुई मानता है ,मुझे तो  केवल एक पात्र बना के रख दिया है ,कुरुक्षेत्र के मंच का --जिसके मुहं से गीता बुलवाई गयी है। --पर चलो गीता तो है न --तू तो मानती है न गीता में मैं ही हूँ और तेरी तरह न जाने कितने  हैं जो मुझे मानते हैं ,प्यार करते हैं, गीता  मेरी वाणी है ऐसा मानते हैं। दादी मैंने भी तो सुख -दुःख दोनों झेले --चाहे राम रूप में ,चाहे श्याम रूप में ,या फिर शंकर बन के और साथ ही सीता ,राधा ,गौरी ने भी दुःख झेले। दादी अब जन्म लिया तो प्रारब्ध भी होगा ही न।   शायद गीता व्यास ऋषिवर की ही हो जाएगी  ,तेरा कान्हा गौण हो जाएगा।  तू तो जानती है न ये गतानुगति का लोक है ,यहां गीता समझने के लिए पहले दूसरों के अनुवादों और समालोचनाओं को पढ़ना आवश्यक सा है। जो विद्वानों ने प्रतिष्ठापित कर दिया वही सच ,ये तकनीकी का युग है न। यहाँ संस्कृत और साहित्य में अब कुछ भी नया नहीं है ,पर तू जो  है न दादी बस तू यूँ ही खुश रहा कर ,तेरे प्रिय जो तुझ से बिछड़ गए हैं मेरे पास हैं तू उनकी चिंता न करना  तुझे भी जल्दी ही अपने पास बुलाऊंगा। अब चलूँगा --उजेरा हो गया तो लोग मुझे बहुरूपिया समझ छेड़ेंगे। अंत समय तुम मेरे सिरहाने रहना और मेरी रसना पे तेरा ही नाम रहे ---मैं भी ये कह गयी --कलयुग है न लालची मैं भी हो गयी ,हृदय में हूक सी उठी पर लाडेसर को विदा किया और सोचने लगी ,इस युग में कृष्ण को नकारा जा रहा है ,राधा को नकारा जा रहा है ,राम के जन्म स्थान पे विवाद खड़े किये जा रहे हैं ,इन्हें केवल राजकुमार या युद्ध का पात्र बना दिया गया है ---केवल इसीलिये  कि  उन्होंने अवतार लेना स्वीकार किया।  किंवा अब हम अधिक बुद्धिमान हो गए हैं ! --तो फिर क्यों नहीं कोई व्यास मुनि ,कोई वाल्मीकि ,कोई शुकदेव ,कोई नारद आता जो इस विकसित समाज के लिए भी कुछ नियम बनाये ,क्यों हमें प्राचीन  संस्कृति को  ही तकना पड़ता है ,हजारों बाबा और आध्यात्मिक गुरु बैठे हैं अपनी दुकान लगा के ,फिर क्यों नहीं कोई मौलिक साहित्य बन रहा। सत्य यही है कि  परमात्मा ही अवतार लेके आये बारम्बार अपनी शक्तियों के साथ इस धरती में।  ऋषि मुनि ,तपस्वी ,ये सब परमात्मा का ऐश्वर्य थे --वो सहज विश्वास  का युग था --मानव को सीख देने का ,राह  दिखाने का युग था पर अब कल पुर्जों का युग है --इस युग की  बस एकमात्र यही सुंदरता है जो अन्य सभी युगों से भिन्न है कि  अब परमात्मा हम सभी के भीतर वास करता है।  कुछ समय बाद तो गंगा जमुना भी विलुप्त हो जायेंगीं --वैसे भी कह  ही दिया गया है ,मन ही में गंगा मन ही में यमुना मन स्नान करे ,हमारे तीर्थ कौन करे --और शायद तीर्थ भी मन में ही आ जाएंगे --जो होता हुआ लग रहा है। आज जब कि  मस्तिष्क बड़ा होता जा रहा है ,सब कुछ एक क्लिक में मिल जाने पे ,वो ;अपनी शक्ति खोता जा रहा है ,आधी से अधिक आबादी ने तो कुछ भी याद रखना छोड़ ही दिया है इससे मस्तिष्क ने जो शक्तियां अर्जित की थीं वो वो धीरे धीरे क्षीण हो थी हैं --ऐसे में मेरे कान्हा का गीता में कथन कि  हे अर्जुन तू और मैं कई जन्मों से साथ-साथ रहे हैं , मुझे सब याद है पर तुझे  नहीं ,क्यूंकि मैंने अपने मस्तिष्क को विस्तार दिया है --क्या आज की पीढ़ी के लिए शोध का विषय नहीं हो सकता ; प्रश्न नहीं समाधान है ;कान्हा का ही दिया हुआ वो भी गीता में --प्राणायाम। भविष्य में हो सकता है दिमाग में कोई ऐसी चिप फिट हो जाए जो सदियों को समेट  ले अपने में --शायद यही कल्कि अवतार हो। आभा।।

















Monday, 27 April 2015

माता च पार्वती देवो पिता देवो महेश्वर: ----
देवाधिदेव महादेव ,जिनकी रामजी भी आराधना करतेहैं ----दीन ,हीन ,अक्षम ,और समाज के अशुभ ,अपशकुनी ,चर- अचर को भी अपनी शरण में लेने वाले ,विश्व के हित हेतु गरल पान करने वाले ,सर्पों को ,और कलंकित चन्द्रमा को भी अपना आभूषण बना पूजनीय बनाने वाले , भक्ति की पराकाष्ठा --सती ने राम की परीक्षा के लिये सीता रूप धरा तो उन्हें माँ सामान मान समाधि में चले गए ,प्रेम की पराकाष्ठा ---सती ने दक्ष के हवन कुण्ड में प्राणों की आहुति दी तो उसके शरीर को लेके ब्रह्माण्ड के चक्कर लगाने लगे -- भोले भंडारी ---अनेकों वर , भक्त की भक्ति से प्रसन्न होके दे देते हैं --रावण , भस्मासुर और अनेकों उदाहरण -- मित्रता की पराकाष्ठा --राम कृष्ण के साथ सदैव रूद्र रूप में रहे --कल्याण हेतु गंगा के प्रवाह को अपनी जटाओं में धारण करने वाले ,लोभ ,मोह मद ,काम क्रोध से परे - कल्याणकारी देवता परम पिता --क्या कभी संहारक हो सकता है ? इंसान के रूप में जो पिता है जब वो अपनी संतानो के लिये बुरा नहीं कर सकता --वरन इस धरती का पिता कई बार अपने बच्चों की भलाई के लिए सारी बुराई -सारे कलंक अपने सर ले लेता है --तो क्या कारण है की हम किसी भी शिव धाम में आपदा आने पे उसे शिव तांडव का नाम देदेते हैं --शिव तो गुरु हैं --वो हर विधा के ज्ञाता है --तांडव भी नृत्य की एक विधा है न कि विनाश का द्योतक। शिव पूर्ण काम हैं। उनका तीसरा नेत्र उनकी दूर दृष्टि है न की भस्म करने का आयुध ----शिव क्रुद्ध हो ही नहीं सकते।
ये तो प्राकृतिक आपदाएं हैं। प्रकृति हमें देती है पर वो किसी एक की नहीं है वो निर्लिप्त है। जब हम रहने के साधारण नियम भूल के प्रकृति के निष्ठुर और निर्लज्ज दोहन पे उतर आते हैं तो इस तरह की आपदाएं आती हैं।
केदारनाथ की आपदा --जहां प्रकृति ने ५० जन के रहने लायक जगह दी वहां ५०० तो मजदूर और खच्चर ही पहुंच गए और स्थानीय निवासी - पर्यटकों का बोझ भी। जहाँ कुछ अदद घर होने चाहिए थे वो भी काष्ठ के या झोपड़ीनुमा या फिर टेंट, वहां हमने हर पहाड़ी ढलान पे कंक्रीट का जंगल खड़ा कर दिया --ऊपर से गंदगी का अम्बार और निर्लज्जता इतनी कि हम नदी के मुहाने तक बस्ती बनाते चले गए --नतीजा अपने ही लालच में खूबसूरती पे बदनुमा दाग लगा बैठे और अपना ही जन धन का नुकसान कर बैठे और हमने बाबा केदार का क्रोध कह के पल्ला झाड़ लिया।
कश्मीर की आपदा --जो शहर झीलों के शहर के नाम से ही जाना जाता है -कहते हैं कश्यप ऋषि ने बहुत सोच समझ के इसकी कुछ झीलों को सुखाया था और कुछ के मुहानों को दूसरी झीलों औ
र नदियों की और मोड़ दिया था----- हमने उन उसकी झीलों को पाट के संकरा कर दिया और -+जमीन पे कब्जा --झीलों ,नदियों का रकबा कम कर वहां मकान --गंदगी ,शहरीकरण --बेतरतीब
फैलाव प्रकृति का निर्लज्ज दोहन नदियों के मुहाने तक घर और गंदगी --नतीजा बारिश में जल प्रलय और दोष भोले बाबा अमरनाथ जी पे !
नेपाल तो आता ही भूकम्प पट्टी पे है , पहले भी विनाश कारी भूकम्प आये हैं वहां पे --पर पर्यटन उद्योग की मोहमयी छलना और बरसते सिक्कों की झंकार के बीच सरकारें इन खतरों को भुला देती हैं --हर पहाड़ी ढलान पेहोटल वो भी नियमों को ताक पे रख के -- जहां आबादी विरल और घर एक विशेष तकनीक से बने होने चाहियें वहां कंक्रीट के जंगल और गंदगी और दोष शिवपर --पशुपतिनाथ जी क्रोधित हुए --बार बार पिता को दोष देना -जन्मजन्मांतर के लिये पापों की गठरी बाँध लेना होता है।
और अंत में हमारे प्राचीन शिवालय हों ,देवीके धाम हो ,या राधाकृष्ण ,राम ,विष्णु धाम हों ,जितने भी तीर्थ हैं प्राचीन ,वो सब विशेष चुंबकीय विधुत तरंगीय क्षेत्रोंमें विशेष वास्तु तकनीक से निर्मित हैं --आप किसी भी तीर्थ पे जाइए --कितने ही थके हो ,तीर्थ के पुण्य क्षेत्र के स्पर्श मात्र से ही आप नयी ऊर्जा से भर जाते हैं। वहां पे जाने के कुछ नियम हैं कुछ वर्जनायें हैं, इन्हें हमें मानना ही होगा -देवता तो आपको अपनी शरण में ले ही लेगा वो माँ है वो पिता है पर उस क्षेत्र विशेष में जो अदृश्य तार बाड़ है , वहां जो विधुत -चुंबकीय तरंगें हैं वो ,वो तो अपना असर दिखाएंगी ही।
दुर्गम साधनविहीन,कठिन परिस्थियों में रहने से ऊब चुके जन मानस को उबारने के लिए सरकारों को पहल करनी होगी --ताकि पर्यटन से होने वाली आमदनी के लालच में तीर्थों के ये प्रहरी अपने को ही न छलें। प्रकृति का निष्ठुर और निर्लज्ज दोहन रोकना ही होगा --इसे भोले भंडारी का कोप कहके कल्याणकारी शिव को बदनाम न किया जाए आभा 

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Monday, 13 April 2015

       ''  शब्द पहचान मेरी ''
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अक्षरों की बूंदाबांदी ,
शब्दों के ओले ,
उजलापन शब्दों का ,
झरा  वाक्यों का झरना।
जो हैं हम ,
वही तो झरेंगे ,
मन आसमां में  है ,
वही  रंग बिखेरेगा।
शब्दों का झरना ,
मधुर ,शीतल फुहारें ,
झंकृत कर दे प्राण ,
भिगोये  तन -मन ,
सृजता हरियाली ,
      ,अथवा ,
गंदला बरसाती दरिया ,
वेग से  उमड़ा ,
 बह चला,दिशा हीन  ,
तोड़ता तट-बंध ,
लट्ठों -पत्थरों संग ,
  कठोर !शब्दों का वेग
सब बहाने को आतुर ,
दूरी बढ़ाता दो किनारों की ,
तोड़ दे  दृढ सेतु  को भी।
एक उजाड़े  दहशत दे ,
एक मन प्रांगण का
अंतर भिगो, पुलक दे  ,
हरियाली दे ,आनंद दे।
अक्षरों की बूंदा-बांदी तो वही
शब्द हमें चुनने हैं ,
वाक्य हमें बनाने हैं ,
बनाएंगे तो वही न ,
जो अंतर में होगा।।



यादों के जंगल में --उपवन बनाना ,मुश्किल होता है खुद को पाना।।आभा।।






Tuesday, 24 March 2015

स्तुतिजपार्चनचिंतनवर्जिता
                             न खलु काचन कालकलास्ति  में।।
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वासंतिक  नव रात्रि  देवी की पूजा अर्चना और  चैत्र में रामजी का  जन्म  भी। तप और उत्सव एक साथ।  चार नवरात्रि दो गुप्त और दो में उत्सव --दोनों में कर्मकांड ,पूजा अर्चना कुछ बंधन कुछ वर्जनायें। क्यों होती देवी की अर्चना   इन त्यौहारों में ही ? देवी पूजा के पर्व संक्रमण काल में ही होते हैं। इस समय ब्रह्माण्ड में सूक्ष्म हलचल होती हैं , शरद और ग्रीष्म का मिलन काल। मिलन की हर बेला उमंग भरी होती है ,आत्मा का परमात्मा से मिलन , और इस मिलन पर्व में सौंदर्य का ही महत्व सबसे अधिक होता है फिर  यहां तो साक्षात माँ ही है सामने ,तो उसकी आराधना में कुछ भी कमी न रहे ,जप तप मंत्र ,आराधना।  ऋतू चक्र बदलता है ,प्रकृति में नव धान्य  ,विभिन्न  पुष्प ,फल , यानी सृजन का काल ,तम से सत  की ओर, अन्धकार से प्रकाश की ओर और सबसे अधिक शांत चित्त की आवश्यकता इसी समय होती है। देवी पूजन अपनी समस्त चेष्टाओ को जागृत ,चैत्यन  करने का और चंचल प्रकृति को स्थिर करने का तप है। ''तारिणी दुर्ग संसार '' जननी में ही ये शक्ति है ,वो शिव की शक्ति है ,शिव ने गरल  को कंठ में रोका  वो कुक्षी में धारण करती है ,फिर सृजन के समय उसकी ही अर्चना होगी न। तम अर्थात जड़ और सत  अर्थात चैतन्य।  जड़ और चेतन का संगम होगा तो रज उतपन्न होगा ,,इच्छा ,आकांक्षा ,लोभ ,मोह माया के बंधन ,इन्ही उद्वेगों को साधने के लिये  पर्व और उनमे माँ की अर्चना। माँ का रूप अप्रतिम है -
-'' ॐ  उदयद्याभानुसहस्रकान्तिमरुणक्षौमां  शिरोमालिकां  रक्तालिप्तपयोधरां  जपवटीं विद्यामभीतिं वरम्। हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं  देवीं बद्धहिमांशुरत्नमुकुटां वन्देरविन्दस्थिताम्।।'' --
-- वो मनोहारी है , करुणा की मूर्ति हैं पर केवल ममता करुणा से युक्त सौंदर्य ही तो पर्याप्त नहीं है सृष्टि को सुचारू रूप से चलाने के लिए ,साथ में शक्ति भी चाहिये  ---
'' सिर्फ ताल सुर लय से आता जीवन नहीं तराने में।
निरा सांस का खेल कहो  यदि आग नहीं है गाने में।
है सौंदर्य शक्ति का अनुचर जो है बलि वही सुंदर।
सुंदरता नि:सार वस्तु  है हो न साथ में शक्ति अगर ''----
बस इसी लिए माँ शक्ति भी है ,वो राक्षसों का सामूहिक विनाश करते हुए सृष्टि से  मालिन्य  मिटाती है और अपनी संतानों को निरापद करती है।  देवी की आराधना के साथ  ही मर्यादा  पुरुषोत्तम का जन्म --शक्ति भी और मर्यादा भी , वो बच्चे के लिए रातों रात जागती है ,ममतामयी   है तो कठोर भी है चाबुक या सोटी भी हाथ में ले लेती है बच्चे को सुधारने  के लिए। ,संसार में रहते हुए नव द्वार जो अशुद्ध हो कर हमें शिथिल और अस्वस्थ कर देते हैं उन्हें माँ का चाबुक ही सुधार  सकता है ,सो हमारे परिमार्जन के लिए ही ये नौ दिन हैं , कुछ तप ,कुछ जप कुछ वर्जनाएं ,आडंबर रहित शुद्ध -सात्विक नौ दिन ,सृजन में हरियाली ,तरंग और कम्पन --घंटा मृदंग और शंख ध्वनि ,जो सारे रोग-शोक कष्ट ,डिप्रेशन दूर करके वातावरण को उमंगित तरंगित कर दे। सात्विक  आहार शरीर के विष को दूर करके ,निर्मल ऊर्जावान कर दे और विषाणुओं को मारने के लिए --सरसों के तेल का दीपक ,शुद्ध घी ,कपूर ,गूगल की आरती अंतिम दिन हवन जो सर्वांग शुद्ध करे।
बस शुद्धि ,निर्माल्य ,चेतना ,मर्यादा का ही नाम है नवरात्रि यानी देवी पूजन ,जो  प्रति  दिन तो हो ही
पर कुछ समय ऐसा हो जब सर्वांग शुद्धि हो तो दो नवरात्रि। ---बस यूँ ही उनींदी आँखों का देवी चिंतन ---मेरे लिए खास पर सब के लिए बेमतलब की बकवास। आभा।।








Wednesday, 4 March 2015

''थी कभी अपनी भी होली ''
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फागुन तो बौराने की ही ऋतू है ,आम का बौर ,नीम के फूल ,आडू ,सेब खुबानी ,नीम्बू के फूलों की मादकता भरी सुरभि हवाओं में तैरती रहती है ,अपनी पूरी नजाकत और कमनीयता के साथ पहाड़ों में फ्यूली फूल जाती है ,नव- नवीन पल्लव ,सरसों के पीले फूलों से सजी धरती ,और साथ ही सुनहरी होती गेहूं की फसल् . टेसू ,गुलाब ,गेंदा ,चमेली ,रातकी रानी ,हरसिंगार ,चंपा .मोगरा के सौरभ से पवन देव भी अनंग के रूप का ही विस्तार प्रतीत होते हैं .और इस सब से इतर महुआ और पलाश भी अंगड़ाई लेने लगते हैं .मानव को बहकाने का पूरा -पूरा सामान होता है फागुन में प्रकृति के पास ....
प्रकृतिके इन रंगों से रंग और खुशबू उधार ले कर हमारी संस्कृति में होली का पर्व रचा गया ,टेसू ,केतकी ,चमेली गुलाब ,गेंदा गुडहल ,इन सब फूलों से रंग और इत्र तैयार कर होली का त्यौहार मनाया जाता था ,राधा कृष्ण ,गोप ग्वाले ,प्रेम के रंग में रंगे हुए ,प्रकृति के साथ एकाकार हो जाते थे पारिजात और कदम्ब की डाल के नीचे यमुना किनारे सुमन और सुरभि की होली और यमुना जल से अठखेली ,होली मानो जायसी की नायिका का रूप धर आई हो . होली है ही सामाजिक समरसता और बराबरी का त्यौहार .
पर होली केवल रंगों और अठखेलियों का ही नाम नहीं है ,पकवानों और खुशबुओं का ही नाम नहीं है ,पिया के रंग में रंगने का ही नाम नहीं है -----------------यह तो एक क्रांति कारी विचार धारा है , बन्धनों में जकड़े समाज को आजाद करने की सहज सरल ,स्वीकारोक्ति ,,वर्ष भर बुर्जुआ समाज के नियम कायदों में पलने वाली घूँघट में रहने वाली स्त्री के लिए उन्मुक्त ,उल्लास ,और आनन्द का त्यौहार और बरसाने की लट्ठमार होली ,यानि सत्ता का हस्तान्तरण ,बरजोरी की, तो !खैर नहीं ,.,और तारीफ ये की पूरी मस्ती और आनन्द के साथ छूट होती है रंग खेलने की ,दुश्मन को भी गले लगाने का त्यौहार कोयल की कुहुक के साथ -साथ पंचम सुर में आंगन में गाना गाने का त्यौहार ,...
ये ऋतु सर्दी से गर्मी में संचार की है अत: गर्म पानी से ठन्डे की ओर जाने को एक पूरे दिन हलकी हलकी धूप में होली के रंगों की फुहारें ,,,जिन में टेसू गुलाब ,नीम गुडहल गेंदाऔर मेहंदी के रंग हों ,इत्र हों,,,, त्वचा को कमनीय बनाती हैं और चर्म रोगों से बचा के ठन्डे पानी के प्रयोग के लिए तैयार करती हैं ,,,,
भंग के पकोड़े ,और ठंडाई ,पुदीना की चटनी ये सब संतुलित मात्रा में लेना होली की एक परम्परा है अब ये साबित होने लगा है कि भांग में कितने गुण हैं ये कैंसर से तक बचाव करती है गुझिया और पकवान को होली में खाकर फिर काले लाल गाजर की कांजी से पचाने का जुगाड़ ,,,इस संक्रमण काल में जब शरीर की रोग प्रतिरोधी क्षमता कम हो तो ,ये खान पान चमत्कारिक असर करता है ,.........इस तरह से मेरे विचार से होली पूर्णत: एक वैज्ञानिक सूझबूझ वाला त्यौहार है ,...बस हम केमिकल रंगों ,अति नशे ,से बचें ,,होली की आत्मा को पहचानें उसे कुरीतियों से बचा के प्यार और रंगों के द्वारा ताजगी भरे उल्लास और आनन्द के त्यौहार की तरह ही मनाएं ................********************.......आप सभीको होली की ढेरों शुभकामनाएं ,*******************....आभा ************..