Tuesday, 20 February 2018

ऊपर वाले; तेरी ,छतरी के नीचे ,
क्यूँ बचपन के ;
मासूम -प्यार के बन्धन टूटे ?
जन्मों से जन्मों तक कसमे
बचपन पर ये सब क्या जाने
हाथ पकड़ हम इक दूजे का
दो जन एक प्राण ही तो थे
प्रीत प्यार का बंधन क्या है
हम तो बस खेला करते थे
एक दूजे के सखा बने
इक दूजे की आदत-साधन थे।
बड़े हुए तो क्यूँ हम बिछड़े ?
क्यों मासूम प्यार के बंधन टूटे ?
सूखी आँखें सागर महसूसें
अधरों पे अहसास प्रणय का
जीवन अमावसों की गठरी 
सच सपने मन की बाहों में
प्राण मुखर, हाँ ना की दुविधा
कर्म भाग्य की परिधि सीमित
बरखा बून्दें   लड़ियां  साँसें
टूट -टूट धरा पे बिखरें
सागर की लहरों सी मचलें।
वो लज्जा वो संकोच पलों का
मिलन !या - मिलने की चाहत ?
कभी तीर  पे वो होता
या ;  खड़ी तीरे  ''मैं'' नापूं दूरी
गूँगे पल , प्राण  पियासा 
आतुर चाह समर्पण चाहे
मृग छौनों सा चंचल  मन
बादल सजल भावों  के लेकर
रिमझिम -रिमझिम बरस- बरस के
तन- मन- प्राण भिगोता क्यूँ है ?
मन  अंगारों की फुलझड़ियों से
एकाकीपन क्यूँ अभिसारित ?
प्राणों का  ही हवन प्राण में
मौन समर्पण, कम्पित तन मन
साँसों में साँसों  का गोपन
फिर भी --
ऊपर वाले तेरी छतरी के नीचे --
प्रणय -प्यार के बन्धन टूटे --क्यूँ टूटे ? ----
====================-॥ आभा ॥
केन संकल्पिते श्राद्धं कस्मिन् काले किमात्मकम्।
श्राद्ध कब प्रचलित हुये और किसने सर्वप्रथम इसका संकल्प और प्रचार किया ?
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 युधिष्ठर के पूछने पे भीष्म पितामह ने बताया -
-ब्रह्माजी से महर्षि अत्रि की उत्पत्ति हुई। वे बड़े प्रतापी ऋषि थे ,उनके वंश में दत्तात्रेय जी हुये। दत्तात्रेय के पुत्र थे राजा निमि जो बहुत बड़े  तपस्वी थे ,इनके एक पुत्र था -नाम था श्रीमान। श्रीमान भी तपस्वी और सर्वगुण सम्पन्न था पर कठोर तप -स्वाध्याय प्राणायाम में लीन रहते हुए इनका जीवन से मोह भंग हो गया और मोक्ष हेतु उन्होंने प्राण त्याग दिये।
पुत्र वियोग में निमि बहुत व्याकुल और शोक-संतप्त हो गये। उन्होंने पुत्र की आत्मा की शान्ति के लिए अमावस्या को पुत्र की सभी प्रिय वस्तुयें ,शास्त्र विदित सभी श्राद्ध में देने योग्य वस्तुयें एकत्रित कीं , सात ब्राह्मणों को बुला उनकी पूजा अर्चना की ,तदन्तर कुश आसन दे पुत्र "श्रीमान" के नाम गोत्र का उच्चारण कर कुशों पे पिंड दान किया एवं ब्राह्मणों को यथायोग्य दान दिया।
मोह वश निमि ने ये श्राद्ध कर्म स्वयं ही सम्पन्न कर तो दिया पर फिर पश्चाताप करने लगे -क्यूंकि शास्त्र में तो कुलगुरु ,या विद्वान ब्राह्मण आदि द्वारा ही श्राद्ध कर्म का विधान है।
निमि ने अपने पितामह अत्रि ऋषि को अपने मन का संशय बताया। ब्राह्मण कुपित होक शाप न दें इसके लिये भी उनके मन में भय था।
अत्रि ऋषि ने निमि से कहा
निमे संकल्पितस्तेsयं पित्रियजितपोधन।
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तपोधन निमि -पुत्र तुमने यह जो पितृयज्ञ किया है इससे डरो मत ,ये ब्रह्म का ही प्रावधान है।
अपने प्रिय के लिये उत्तम ,त्रुटिरहित ,मङ्गल विधान स्वयं के सिवा कोई नहीं कर सकता। श्राद्ध कर्म प्रिय हेतु किया जाने वाला पवित्र और पुण्य कर्म है ,इसकी पवित्रता और शुद्धता को बनाये रखना प्रिय के सिवा और कौन कर सकता है। जिस श्रद्धा और स्नेह से तुम इस कर्म को करोगे कोई अन्य नहीं कर सकता चाहे वो कितना ही विद्वान क्यों न हो।
निमि के इस प्रकार पितृयज्ञ करने और  ब्रह्मापुत्र अत्रि ऋषि की संस्तुति के  पश्चात सभी ऋषि -महर्षि -देव -मानव नित्यप्रति पितरों की याद में पितृयज्ञ करने लगेऔर पितरों को अन्न देने लगे । भूले बिसरे सभी पितृ प्रसन्न हो कर तिल -जल के साथ स्वादिष्ट व्यंजनों का भी आनंद लेने लगे। पितृलोक से मृत्युलोक तक आवागमन नित्य ही होने लगा ,घर महालय बन गए -पर मृत्युलोक को छोड़ चुके और केवल जल-तिल से तृप्त रहने वाले पितर बहुत शीघ्र ही तृप्त हो गये अब उन्हें अजीर्ण होने लगा -
अजीर्णेस्त्वभिहन्यन्ते ते देवा पितृभिः सह।
सोम्मेवाभिपद्ध्यन्त तदा ह्यन्नाभिपीडिता --
सोम के पास जाके पितर बोले देव हम श्राद्धान्न से बहुत कष्ट पा रहे हैं -हमारा कल्याण करिये। सोम ने पितरों को ब्रह्मा और ब्रह्मा ने अग्नि के पास भेजा -तब अग्नि ने कहा अब से हम केवल श्राद्ध पक्ष में ही अन्न ग्रहण करेंगे  तब  मैं आपके साथ ही रहूंगा ताकि आपकी जठराग्नि प्रदीप्त रहे -तब से पहले हवि अग्नि को दी जाती है और फिर पितरों को पिंडदान होता है।
कथा विस्तृत   है ,बहुत बातें बहुत सुंदर और मनोवैज्ञानिक रूप से समझाई गयी है।
यदि हम शास्त्रों को स्वयं पढ़ें तो जान पायें हमारे शास्त्रों में रूढ़ियों का कोई स्थान नहीं है ,देश काल परिस्थिति के अनुसार ,श्रद्धा ,सुविधा और पवित्रता पूर्वक जो भी विधि-विधान कर सकते हैं करें ये आदेश है ,
ब्राह्मण से करवाएं स्वयं करें ,बस श्रद्धा पूर्वक हो। कुछ नहीं कर सकें तो केवल जल-तिल से तर्पण -दक्षिण दिशा में।
एक स्थान पे तो ये भी लिखा है कि कुछ भी संभव नहीं है तो बस दक्षिण दिशा में खड़े हो पितरों को श्रद्धा पूर्वक याद करें  दो आंसू ही बहा दें।
पितरों को ढोंग -ढकोसला कुछ नहीं चाहिये ,बहुत अधिक खीर पूरी कद्दू कचौरी से उन्हें अजीर्ण हो जाता है। बस शुद्ध श्रद्धा और हो गया श्राद्ध। ---





















श्राद्ध में ब्राह्मण कैसा हो --महाभारत से --
स्वयं ही श्राद्ध कर्म कर सकें तो अतिउत्तम। किन्तु परन्तु हरकोई अपने से करने में सक्षम नहीं होता। कभी न कभी मनन होता है किसी अच्छे से ब्राह्मण को बुलवा के श्राद्ध कर्म करवाया जाये। ये भी पितरों के प्रति हमारी श्रद्धा का ही द्योतक है। सभी कर्मकांड प्रसन्नता पूर्वक सम्पन्न होने पे हमारे मन को अपार संतुष्टि मिलती है और तब हम मन ही मन ये भी मान लेते हैं कि हमारे पितृ देवता भी अवश्य संतुष्ट हुये होंगे -बात भी यही होती है -बच्चे प्रसन्न तो पितर भी संतुष्ट।
अब बात उठती है कि ब्राह्मण कैसा हो। तो महाभारत में इसके विषय में पूरा अध्याय है।
"कीदृशयेभ्य परदातव्यं भवेच्श्राद्धं पितामह।
द्विजेभ्य कुरूशार्दूल तन्मे व्याख्यातुमर्हसि।।"
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युधिष्ठर पूछ रहे है भीष्म से ,श्राद्धके दान के लिए कैसे ब्राह्मण को निमंत्रण दिया जाये।
--भीष्म --
"ब्राह्मणान् न परीक्षेत क्षत्रियो दानधर्मवित्।
दैवे कर्मणि पित्र्ये तु न्यायमाहुः परीक्षणम्।।"
--राजन् !  क्षत्रियों को -देवकार्य ,धर्म या दान हेतु कर्मकांड के हेतु  ब्राह्मण की परीक्षा नहीं करनी चाहिये किसी भी ब्राह्मण को बुलवा के श्राद्धापूर्वक कर्म में प्रवृत हो जाओ पर श्राद्ध कर्म और पितृयज्ञ हेतु ब्राह्मण की परीक्षा न्याय संगत मानी गयी है ---
अर्थात पितृयज्ञ या तो स्वयं करो और दान सुपात्र को जिसे उसकी आवश्यकता है दे दो -पर ब्राह्मण को निमंत्रित कर रहे हो तो उसकी पूर्ण जानकारी होनी आवश्यक है।
"श्राद्धे त्वथ महाराज परीक्षेद् ब्राह्मणान् बुध: |
कुलशीलवयोरुपेर्विद्ययाभिजनेन   च।| "
कुल शील रूप आचरण विद्या और पूर्वजों के निवास स्थान की जानकारी होनी जरूरी है।
पितृयज्ञ हेतु ब्राह्मणों को दो श्रेणियों में रखा गया है -
१-पंक्तिदूषक-पंक्तिबाहर।
२-पंक्तिपावन- पांक्तेय।
अब पंक्तिदूषक में --रोगी ,अनपढ़ जुवारी ,गर्भ गिराने वाला ,पर स्त्रीगमन करने वाला ,हस्तरेखा या ज्योतिष से जीविका निर्वहन करने वाला ,मंदिर में पूजाकरके दान -दक्षिणा से जीविका चलाने वाला ,पिता से झगड़ा करने वाला और भी कई   वर्जनाएं ---यहां तक कि जिसके छोटे भाई का पहले विवाह हो गया हो वो भी वर्जित है। -----
अब पंक्तिपावन -तृणाचिकेत नामक मंत्रों का ज्ञाता हो ---अग्नि मंत्र जो यम ने नचिकेता को बताये और नचिकेता के नाम पे ही यम ने इन मंत्रों का नामकरण नचिकेत मंत्र किया -
जो उपनिषदों-वेदों का परम्परा से ही ज्ञाता है -पीढ़ियों से श्रोत्रिय है ,सत्यवादी ,नियम पे चलने वाला ,कर्तव्यपरायण ,धर्मशील। क्रोध रहित ,जितेन्द्रिय और ऋत्विक हो -वेद की शिक्षा देता हो -
टोपी या पगड़ी पहन के भोजन न करे।
ये पढ़ने के बाद -कलयुग है ऐसा सोच के मंथन करने पे मुझे तो सारे ब्राह्मण पंक्ति बाहर ही  लगने लगे ,युग का प्रभाव तो सभी में होगा न। वेदपाठी भी क्रोधी देखे हैं मैंने ,कर्तव्यपरायण और धर्मशील हठी और मानिनी हो जाते हैं।
शांतिकुंज वालों ने तो सभी को किताब और झोला पकड़ा के ब्राह्मण बना दिया है।
मैं तो पितृयज्ञ स्वयं ही करती हूँ ,भूलचूक को 'आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनं '-क्षमा प्रार्थना से क्षमा मिलने की संतुष्टि --क्यों मन में कल्पें ब्रह्म कैसा हो और दान -वो भी कलयुग की निति रीति से --रूड़की में थी तो कांजी हाउस  ,मंदिर अनाथाश्रम -आपके पास काम करता गरीब -किसी बच्चे की वर्ष भर की फीस ,पौधे लगाना ,रक्त दान इत्यादि ----
बस यूँ ही महाभारत में श्राद्ध पढ़ते पढ़ते। आभा।











एक बार फिर "भानमती ने कुनबा जोड़ा "--
और पिटारे से बहने लगी भावनाओं की सरिता --
समझ न आये पोस्ट -तो कोई बात नहीं - दुनियादार लोग मेरे जैसे बावरे थोड़े ही हैं होते हैं --
-ईश्वरीय प्रेरणा के दर्शन सभी को हों ,सभी बुजुर्ग सकारात्मक रहें बस केवल इसीलिये चाप दिया विचारों का ये अंधड़ --इसे इरमा कहें या हार्वे --
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पहली सितंबर बड़कू और दस सितंबर छटकु का जनम्बार -जो दूर है उसे फोन कर दिया जो पास है उसे हैप्पी बर्थडे सामने से बोल दिया --बस यही तो रह गयी है अब जिंदगी।
हकीकत बयां कर रही हूँ -बुरा लगेगा ---माँ -बाप को भी और बच्चों को भी पर ईमानदारी से दिल पे हाथ रख के पूछिये अपने आप से तो पाएंगे कि बूढ़े हो रहे माँ-बाप तो पुराने फर्नीचर ही हो जाते हैं -कुछ बच्चे उन्हें कीमती फर्नीचर की मानिंद संभाल के रखते है कोई यूँ ही पड़े रहने देते कोने में -धूल अधिक हो गयी तो झाड़ देंगे। बहुत से बुजुर्गों को देख के लिख रही हूँ और शायद मैं भी कालांतर में इसी स्तिथि में आ जाउंगी
अति संवेदनशील होने में यही हानि -नुकसान है आप हर स्थिति में अपने-आप को फिट करके देखने लगते हो।
और मैं भी यही सोचने लगी --मेरे आशीर्वाद ,पूजा-पाठ या शुभकामनाओं से क्या हासिल होगा बच्चों को जब सबकुछ पूर्वनिर्धारित (predestined ) होता है। शायद क्षीण होती काया और हारता मन ये एक दूसरे के पूरक हैं। हम अपने को मजबूत ,सकारात्मक ,स्वस्थ और जिंदादिल रखने की कितनी भी कोशिश कर लें नितांत अकेले क्षणों में कभी न कभी अवसाद घेर ही लेता है -पे ये भी उतना ही बड़ा सच है कि यदि हम शीघ्र इस अवसाद से उबरने की ईमानदार कोशिश करें तो ईश्वरीय प्रेरणा स्वयं ही चल के आती है हमारे पास --
बात जनम्बार की --तो बच्चों को शुभकामनायें दे दीं ,पूजा-पाठ कर लिया ,पितरों से आशीष की फरियाद कर ली ----बाकी उपहार ,खाना ,पकवान तो प्रोटोकॉल के साथ ही होजाते हैं -और खुशियां पुढ़च्यावर्षी लवकरया” की पुकार के साथ आशीष में तब्दील '
--पर अब तो फेसबुक भी है न --प्रोटोकॉल में टाइमलाइन पे शुभकामनासंदेश लिखना भी तो शामिल हो गया है। ----
--ये जग जाहिर है कि आज की पीढ़ी अपनी टाइमलाइन पे कुछ भी शेयर करना पसंद नहीं करती -आप कोई भी फोटो तो इनको टैग कर ही नहीं सकते -ये हकीकत है -""यदि आप इससे इंकार कर रहे हैं तो आप बहुत बड़े हिप्पोक्रेट हैं -""
ऐसे में एक स्वाभाविक हिच होती है -पोस्ट बना के तो डाल दूँ पर क्या पता बच्चों को कैसा लगे ---मैं बुरा न मानूं इसलिये वो कुछ कहेंगे तो नहीं --पर नई पीढ़ी तो है ही --
समय की ऐसी बलिहारी रही कि मैंने इस वर्ष बच्चों के जनम्बार पे कोई पोस्ट नहीं लिखी या कहूं चाह के भी समय ही नहीं निकाल पायी।
मैं चाहती हूँ आप सभी देखे -अनदेखे स्नेहिल- अजीज मित्रों की शुभकामनायें मेरे बच्चों को मिलें पर इस वर्ष जाने अनजाने मैं चूक गयी आप सभी की शुभकामनायें लेने से।
-- ईश्वर चाहता है बच्चों को आपकी शुभकामनायें मिलें। तभी तो बेटे के जन्मदिन के दिन की मेरी एक कामना पूर्ण की और मुझे जन्मदिन के बाद ही सही पर पोस्ट लिखने का कारण दिया --- कामना भी क्या ? सुनके हँसेंगे सभी पर मेरे लिये अनमोल है।
पेड़-पौधों से बच्चों की तरह प्यार किया हम दोनों "अजयाभा " ने -अजय छूटे -मिटटी छूटी- कंक्रीट के जंगल में आयी पर अपनी क्षुधा को गमलों की हरियाली से शांत करने की कोशिश करती हूँ।
पिता की तर्ज पे बेटे ने दो " passion flower " की बेलें ला के दीं - बेटी की तरह ही पालनी पोसनी पड़ती हैं बेलें। रोज ममता लुटानी पड़ती है --मैंने बेल से कान में कहा --बेटी बाहर है- तो क्या ?तू ही भाइयों के जन्मदिन पर मुस्कुराना -अवश्य ! --एक -बस एक फूल खिल जाये मैं समझूंगी तू खुश है -ईश्वरीय विधान में बुजुर्गों की कामना की कोई कीमत है -मेरा होना प्रासंगिक है -----और आज सुबह उठने पे एक कली दिखी मुझे --झट से कैमरे में कैद किया -बेटे को बताने गयी -वो देखने आया तो फूल मुस्कुराता मिला। -देखा एक कली कल भी चटकी थी -कल घर में ताला था खुशियां सुबह मेरे घर में तो सायं बेटे के ससुराल में खिलखिलायीं -तो -मैं कल देख ही न पायी -बेटी बन मेरा कहना माना -बेल ने और फूल बन श्राद्धों में चली आयी घर में --
अनोखी ख़ुशी मनोकामना पूर्ण होने की ---भौतिक वस्तुएं तो बच्चे बटोर ही लेंगे --पर प्रकृति का ये आशीष --ये उन्हें हम फर्नीचर बन गए माँ-बाप ही अनुभव करवा पाएंगे। ऐसी छोटी-छोटी पर हकीकत में जीवन का विस्तार लिये हुई बड़ी अनुभूतियों को अनुभव करने का आह्लाद यदि हम बुजुर्ग बच्चों को सौंपने का बीड़ा उठायें तो प्रकृति माँ भी हमारी सहायता करती है। वो जगद्जननी सीता ही तो है --
"यस्या: स्वरूपं ब्रह्मादयो न जानन्ति तस्मादुच्यते अज्ञेया
यस्या लक्ष्यं नोपलक्ष्यते तस्मादुच्यते अलक्ष्या
यस्या जननं नोपलभ्यते तस्मादुच्यते अजा ''
महंगे फर्नीचर बनने से यदि हम बुजुर्ग इंकार कर दें और कुछ सार्थक करें तो ईश्वरीय शक्ति साथ देती है हमारा --फूल तो खिलेंगे ही पर मनचाहे समय पे आजायें ,तो आप क्या कहेंगे --कृष्ण -कान्हा तू है मेरे साथ ,यहीं कहीं -इस "राधे -श्याम ' फूल की सुगंध की तरह ---आभा --
कल के मुरझाये फूल की ,आज सुबह कली से फूल बनने की तस्वीरें --बस मेरी ख़ुशी --








हमारी राणी जिसे हम देवी मानते हैं उसे नाचते हुए क्यों दिखाया -
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मैं पिक्चर नहीं देखती -बच्चों की बहुत जिद पे पिछले बीस वर्षों बाद दंगल देखने गयी थी और मुझे ''बापू सेहत के लिए तू तो हानि कारक है ''गाने के सिवा पूरी पिक्चर वाहियात लगी -
ये पद्मावती पे विवाद ---वो भी पिक्चर के गाने में हीरोइन को नाचते देख के --क्या मजाक है। पहले तो ये एक पिक्चर है -बिना नाच-गाने के हिंदी पिक्चर की कल्पना भी नहीं की जा सकती। रानी क्यों नाची वो नचनिया थोड़े ही थी -अरे तुम मौजूद थीं क्या उसके समय में ,हाँ नई तो बोल तो ऐसे रहे हैं जैसे ये उस वक्त मौजूद थे -क्यों नहीं नाच सकती रानी ?
भारतीय अस्मिता तो उत्सवधर्मी है। वेद वेदांग पुराण सभी गेय हैं। चैतन्यमहाप्रभु से लेकर अनेकों संतों ने गायन वादन नृत्य से ही अपने प्रभु को रिझाया। भजगोविंदम सुनकर स्वयं ही कदम थिरकने लगते हैं।
हमारे देवाधिदेव महादेव तो स्वयं नटराज हैं ,तांडव से लेकर सृजन सभी उनके नर्तन का ही फलित है।
मेरे कान्हा का महारास ,गोपिका गीत सुनो कभी ! जिसे पढ़ सुन के आज भी तन मन की सुध बुध नहीं रहती।
---क्यों  रखना  चाहते हैं हम अपने पितरों को केवल त्याग और बलिदान की मूर्ति बना के ? क्या वो भी आपके मेरे तरह के  सामान्य मानव-मानवी  नहीं थे जो रोते -हँसते ,नाचते -गाते  कभी कोमलता से कभी वीरता से  समाज में रहते थे अपना कर्तव्य निभाते थे।
हमें राम -सीता के लिए विलाप करते तो स्वीकार्य हैं ,लक्ष्मण के लिए रोते  स्वीकार्य हैं पर उन्ही राम को कोई  यदि माँ सीता से अभिसार करते हुए दिखा दे तो  हम असहज हो जाते हैं ,समाज और संस्कारों की दुहाई देने लगते हैं ,ऐसे ही रूढ़िवादी स्वार्थी असहिष्णु समाज को कोई भी धोबी बंधक बना लेता है और माँ सामान सीता को आक्षेपों का शिकार होना पड़ता है।
यहां तक कि जब कालिदास ने शिव-पार्वती के अभिसार को लिखना चाहा -तो उनके रोगग्रस्त होने की बात फैला के उस ग्रंथ को उनकी संतति ने पूर्ण किया ऐसा इतिहास बना डाला।
तुलसी बाबा इस समाज के डर से -वाल्मीकि रामायण में सुंदरकांड में हनुमान जी ने रावण के महलों का जो आँखों देखा वर्णन किया उसे नहीं लिखा -जो हनुमान जी की चारित्रिक दृढ़ता का एक मात्र सशक्त प्रमाण है।
क्यों हम ये मान लें कि रानी पद्मिनी और राणा के जीवन में आनंद ,उल्लास , उत्साह के क्षणों में गायन वादन और नृत्य के लिए कोई जगह नहीं थी।
एक बुजुर्गवार जो अपने को रानी पद्मिनी की 37 वीं पीढ़ी का बता रहे थे के मुहं से सुना --हमारे यहां औरतें नचनिया नहीं होतीं फिर  वो तो रानी थीं -अरे तुम रूढ़िग्रस्त हो तो अपने पुरखों को क्यों बदनाम कर रहे हो भले मानस। रानियां और नचनियां दोनों कोमल भावों की मल्लिका होती हैं ,ये भेद तुम्हारे कुत्सित दिमाग की खोज है वरना रानियां तो नचनियाओं को भी अपनी सखी मानती थी -अनेकों उदाहरण मौजूद हैं -पर पढ़े कौन -
जो रानी गोरा -बादल को मनाने के लिये अपनी तथाकथित मर्यादा को छोड़ सकती है ,जो रानी अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए हँसते हुए जौहर कर सकती है --यहां जौहर और सती में अंतर् समझना होगा --क्यूँ न ये कल्पना की जाये कि जैसे उस वीरांगना ने मर्यादों की सीमा का उलंघन कर बादल-गोरा को अपने पक्ष में लिया और महाराणा को छुड़वाया वैसे ही उसने  अनेकों वीरांगनाओं को जौहर के लिए तैयार करने के लिये कालबेलियों द्वारा किये जाने वाले नृत्य का सहारा न  लिया होगा -- वो नाचते- नाचते विशाल अग्नि कुंड में कूद गयी हों।
---मुझे भंसाली या किसी भी फ़िल्मी व्यक्ति से कोई सहानुभूति नहीं है -समाज को विकृत करने और परिवार रूपी इकाई जो हमारे भारत की रीढ़ है को तहसनहस करने में इन फ़िल्मी भांडों का ही हाथ है -आर्ट तो हम इसे बिलकुल भी नहीं कह सकते -पर ये एक इंडस्ट्री तो है ही जो कई लोगों को रोजगार देती है।
इस इंडस्ट्री को किसी सेना के लोगों की रूढ़िवादिता या सरकार को बदनाम करने के लिए विपक्ष और मीडिया के एजेंडे के हवाले तो नहीं ही किया जा सकता।
फिल्मकारों का कोई एजेंडा हिन्दुओं के खिलाफ है तो आप उनकी पिक्चर फ्लॉप करवाइये ,मत देखिये ,उनकी कमर खुद -ब -खुद टूट जायेगी पर हिन्दू धर्म को असहिष्णु मत बनने दीजिये।
और अंत में ---ये जो छत्राणियां नंगी तलवारें लेके अपने संस्कारों को बचाने बैठी हैं --आपको अपनी किट्टी पार्टी में घूमर नृत्य करती हुई दिखाई देंगी ये मैं शर्तिया कह सकती हूँ --
चिट्टियां कलाइयां ,चिकनी चमेली ,कजरारे कजरारे पे ठुमके लगाने वाली क्या घूमर से बच पाएंगी --यकीन नहीं होता तो आने वाले शादी के सीजन में देख लेना --










" पंछी की साध "
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लहरों उछलो आओ पास मेरे
मैं ठिठका हूँ मुझे उछाह दो
शिशु हूँ ,मुझे प्यार दो
संभालो मुझे
लहर की नाव पे बिठा लो
कि
छोर तक जाना है मुझे -
क्या होगा उस पार ?
खड़ा सोच रहा मैं !
नीलम सा ये सागर औ
 भोर-सांझ के रंग
मछली भी होंगी !
भूखा न रह पाऊंगा -
शिशु हूँ  ;
 उस पार की दुनिया
कैसी है जाननी है मुझे
ऐ लहर ! एक वादा भी लेना है मुझे ;
 ले जाएगी उस पार
तो इसपार भी लाना होगा
सुनी है माँ से कहानी बहुत
मुझे भी उसको किस्सा सुनाना है
ऐ लहर इतनी ऊँची न उछल
शिशु हूँ फिसलने का डर है
नहीं ! मैं  नहीं डरता ,
पर  ; माँ दुःखी होगी -
सुन ! रहने दे आज नहीं
आज तुझे अपने पे काबू नहीं
सागर के हिंडोले में
पेंग ऊँची बहुत तेरी
शिशु हूँ '
अभी चलना सीख रहा हूँ
कल ही तो  ! ऊँचा उड़ने
की लालसा में -
पिता ने  सीख मुझे दी
उड़ो खूब ऊँचे उड़ो
पर जल्दी ठीक नहीं है
कच्चे हैं अभी पंख
थोड़ा धीरज धरो ,
परवाज भी मिलेगी
शक्ति अर्जन करो -
ऐ लहर उड़ूँगा में तेरे संग एक  दिन
आ तब तक हम यहां
छप-छप करें
तू  उसपार की कहानी सुना मुझे
मैं तुझे प्यार से देखा करूं यूँ ही।आभा। 
 ''  बैठे ठाले ''
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    बसंत की सुहानी दोपहर ,आम का हरा भरा पेड़ ,पेड़ पे ढेर सी बौर और हरी -हरी अम्बियाँ ...चारों ओर फैली बौर की मदहोश करने वाली सुगंध ,कोयल बहुत दूर से इसे महसूस करती है ,उडती हुई हुई आती  है और इस डाल से उस डाल, फुदक -फुदक के पंचम सुर में मस्ती से कुहू -कुहू गाने लगती है ..अम्बियाँ हवा के झूलों पे सवार मस्ती में झूल रही थीं . यौवन के प्रथम सोपान में  ,अल्हड़,अक्खड़ अपनी सुन्दरता की नीम बेहोशी में .उन्हें काली- कलूटी का रंग में भंग अच्छा नहीं लगा. कोयल बोली कुहू -कुहू मैं आ गयी!
आम्बियाँ इतराई ..और बोलीं अरी कलूटी कहाँ से आजाती है हर मौसम , कहाँ हमारी डालियों पे.. सुंदर सलोनी,सुनहरी , सुगन्धित बौर , हरी -हरी अम्बियाँ और कहाँ तू काली- कलूटी,. ...सारी छटा ही बिगाड़देती है .....कोयल बड़ी दूर से आयी थी ...उसे विश्वास था ,मैं तो पाहुनी हूँ बौर मेरी बलैयां लेगी ,अम्बियाँ गलबहियाँ डालेंगी ,सदियों से तो ऐसा ही हो रहा है ....बड़ी निराश हुई ....पर हार नहीं मानेगी ...वो तो कोयल है ..पंचम सुर में गाने वाली ...सोचने लगी अब आ ही गयी हूँ तो टिकुंगी  पर जुगत भिड़ानी होगी ...चलूँ कौवे से पूंछूं क्या बात है, इतना क्यूँ इतरा रही हैं अम्बियाँ ...खूब झूमके कुहू -कुहू सुनाया कौवे को..अम्बियों ने देखा और बोलीं .बेचारा चाल में फंस गया ..वैसे भी ये धूर्त कोयल हर वर्ष न जाने कितने कौवों के अंडे घोंसलों से गिरा देती है और वहां अपने अंडे रख देती है ..बेचारे को पता भी नहीं चलता ,और ये कलूटी धूर्त के साथ -साथ निकम्मी भी तो है ,कौवे से ही अपने बच्चे पलवाती  है ,आलसन ,माँ के होते हुए भी क्या बच्चे किसी और से पलवाये जाते हैं पर इसे तो बस गाना और आजाद रहना है  कोयल तो है ही मानिनी ,पर सुन के भी शान रही और कौवे से पूछा, ये माहौल में बदलाव क्यूँ है ...तो पता चला कि डेंगू फैला हुआ है और रामदेव बाबा ने कहा है की बौर को सुखाके उसका धुंआ देने से मच्छर भाग जाते है और आम के पत्तों के कोंपलों के टहनियों के अम्बियों के और आम के बहुत से आयुर्वेदिक प्रयोग सार्वजनिक कर दिए हैं ,तब से ये परिवार ज्यादा ही इतराने लगा है ..अब प्रभुता पाहि काहू मद नाहीं ,.....,,,,कोयल को बहुत बुरा लगा .इस मौसम की रानी तो मैं हूँ  और मैं ही रहूंगी मैं निकम्मी हूँ तो क्या !ये अम्बी ही कौन सा कुछ कर रही है ,बस पवन के संग -संग डोल रही है और इतरा रही है निठल्ली ..बस रूप रंग ही में तो अच्छी है तो मैं कौन बुरी हूँ कृष्ण वर्ण हूँ कान्हा की मुरली की भांति ही पंचम सुर में गाती हूँ ...क्या जुगत भिडाऊं .कि इसका घमंड झड़ जाए ---और फिर बहुत सोच के कोयल बोली -----अरी अम्बी सुन ....बहुत बन रही है न ---माली आयेगा और कच्ची को ही तोड़ के ले जाएगा ----आचार बनादेगा तेरा ,ये इठलाना ,इतराना पींगें बढ़ाना हवा के साथ -साथ -सब चार -दिन की चांदनी है फिर तो सारीउम्र मर्तबान में कैद रहेगी ..वो भी तेल में डूबी हुई ....अरे क्या कह गयी निगोड़ी !अम्बी सिहर उठी ..सच बात है पर कितनी कडवी ,लेकिन  हार न मानूंगी मैं ----बोली -----अरी कलमुहीं सुरक्षित भी तो रहूँगी न ,न सडूगी , न गलूंगी सुरक्षित रहने का अचूक नुस्खा ..आचार बन जाओ -----अपने घरके लोगों के साथ रहो ,थोडा नमक ,थोडा मसाला थोडा स्नेह [चिकनाई ]..कभी धूप में तो कभी छावं में---- हा हा हा ----पर तू सोच जब तेरे बच्चे होंगे और कुहू- कुहू बोलेंगे ! निगोड़ी तेरी तो पोल ही खुल जायेगी सब को कौवे से ही सहानुभूति होगी ...तेरी सुरीली आवाज भी तेरे उपर लगा धूर्तता और निकम्मेपन का दाग नहीं हटा पाएगी ...गालियाँ ही मिलेंगी तुझे और कर्मठ और सबकेसाथमिलके रहने वाला कौवा इक बार फिर, घर -घर पितृ -पक्ष में पूजा जाएगा ..और कागभुशुंडी का खानदानी होने का गौरव पायेगा ..जिरह पे जिरह  कोई भी हार न माने ....पर ...अब तक अम्बी और कोयल समझ चुकी थीं ,दोनों को साथ -साथ ही रहना है और थोड़े ही समय का साथ है तो क्यूँ न प्यार से रहें ,,दोनों में कुछ कमियां हैं, कुछ खूबियाँ हैं, तो दोनों एक साथ बोली चलो हम सहेली बन जाए और हंसके गलबहियां डाल लीं ..अम्बी बोली,  मैं डाल पे इतराऊंगी ,इठलाऊंगी और कोयल तू पंचम सुर में गाना ,अपने सुर की मधुर -मिठास मुझे देकर, इस पेड़ के सारे आमों को मीठा करदेना, मैं तेरा स्वागत करती हूँ ...कोयल ने भी ख़ुशी में गाना शुरू किया और दोपहर संगीत और सुगंध से सराबोर हो गयी ....पर एक बात है अम्बी तो अचार ,मुरब्बा ,चटनी बन के मर्तबान में सुरक्षित हो जायेगी,,कौवा कर्कश कांव-कांव करता हुआभी घर -घर पूजा जाएगा ----खीर खंडवा द्यों तोहे कागा ,सोने की चोंच मढ़ाऊं तोहे कागा .....पर कोयल अकेले रहने की आदत के कारण ,  दर दर भटकेगी ,,पंचम सुर में सुरीला गाना भी अकेलापन दूर न कर पायेगा ...................................मॉरल आफद स्टोरी ....वैसे तो कई सारी सीखें हैं पर ये पढने वाले पे निर्भर करेगा वो कौन सी सीख लेता है ....और कौनसा कहानी पढके अब कोई सीख लेता है ....मैंने तो खाली दिमाग शैतान का घर ,,,,लिख दी बैठे ठाले .....................आभा .............