Sunday, 17 June 2018

ठाली बैठे -सुधियों के जलधि में गोता लगाना -
'समय '
=====
पग- समय के,
छाया की मानिंद
पथ में ,चलते हैं साथ -
 सृष्टि के।
न आवाज ,
न आकृति
 पारदर्शी -
समय की पदचाप ,
सुनाई नहीं देती -
न आपको न मुझे।
पर हैं सभी -
इसी पथ पे,
फना होना - नियति।
जग से बंधन
कुछ निष्ठुर क्षणों के ,
मन की परतें खोलते -
बोलते -लिखते
पर ----
मज्जा से परत दर परत
अस्थि होती देह  -
 विषाद में जाएगा मन ,
सो न ----
देखने की जिद्द -
 उपेक्षा
या फिर प्रकृति की
अवहेलना !
छीजती देह -
समय संग -
करती कदमताल ,
कब होजाती
कंकाल ?
अब  सभी एक से !
न रूप न रंग
समय के पारदर्शी
रंग में रंगे।
देख कुछ कंकालों को
सुधियाँ करने लगीं
अट्टहास -----
सदियां कौंध गयी
 मन में----
बोल  !शब्द  ! सब
खामोश -आभा -












Wednesday, 13 June 2018


'' शब्द -शब्द ''

अक्षरों की बूंदाबांदी
उजलापन शब्दों का
झरा वाक्यों का झरना
जो हम हैं
वही तो झरेंगे
मन आसमान !
तो
शब्दों का झरना ,
रंग बिखेरेगा
" इंद्रधनुषी "

नदी भावों की
बन बहेगा
कलकल छलछल
छू जिसे शीतल मलय
झंकृत कर प्राण
आलिंगन कर अंबर का
बन शीतल फुहारें
सृजेगा हरियाली
"शब्दों के ओले "
गंदला बरसाती दरिया
वेग से उमड़ा ,
बह चला,दिशा हीन
तोड़ता तट-बंध
लट्ठों -पत्थरों संग
कठोर !शब्दों का वेग
सब बहाने को आतुर
दूरी बढ़ाता किनारों की
तोड़ दे दृढ सेतु को भी
एक उजाड़े दहशत दे
एक मन प्रांगण
अंतर भिगो
पुलकावलि भरे
हरियाली दे आनंद दे
अक्षरों की बूंदा-बांदी
मेघ नभ सी चंचल
शब्द हमें चुनने हैं
वाक्य हमें बनाने हैं
बनाएंगे तो वही न
जो अंतर में होगा
मन के जंगल को
उपवन बनाना ?
दुरूह होता है स्वयं को पाना।।आभा।।

 

Friday, 25 May 2018



“तपता सूरज -तपती धरती”

  ===============================
चढ़ा सूर्य को तेज बुखार,
मचा जगत में हाहाकार
दिन पर दिन वो तपता जाये ,
हो बेचैन हांफता जाये
मैया -मैया ; शोर मचाये ,
न कुछ पीये न कुछ खाये
छोड़- छाड़ कर सारे काम ,
मैया दौड़ी -दौड़ी आयी
बड़े लाड से गोद बिठाया ,
मुख चूमा , सिर सहलाया
बच्चे का मुहं लाल हो रहा ,
तपता जलता माथा ,अकुलाहट
बेचैनी से नींद  न आती ,
सांस उखड़ -उखड़ सी जाती
मेरा चंदा तड़प रहा है ,
ज्वर-ताप से झुलस रहा है
मैया ? मैया ही होती ,
लाड़-लाड़ में;
सूरज को भी चंदा कहती!
अरे! कोई तो वैद बुलाओ ,
मुन्ने का ज्वर ताप भगाओ
मेरा मुन्ना जग का पालक ,
ये यूँ  ही तपता जायेगा-
तो !
जीव जन्तु सब जल जाएंगे ,
चातक- कोकिल कुम्हलायेंगे
आसमान की परियों जाओ ,
वैदराज को ढूंढ के लाओ
परियों ने फिर ढूंढ मचाई ,
पवन वैद को संग में  लायीं
सर -सर ,फर-फर हवा चली ,
पल में ,लू में वो बदली
पास पवन आता जाता ,
मौसम और बिगड़ता जाता
धरती पे  भी लू चली  ,
पशु-पक्षी जन-जन अकुलाते
ताल -तलैया सूखे जाते ,
वन -उपवन सब ही मुरझाये-
सूरज मुन्ना व्याकुल होकर ,
मैया- मैया शोर मचाये
ना डर मेरे प्यारे मुन्ने
मैया संग -संग ही है तेरे।
क्रोधित हो मैया ने तब ,
पवन वैद को भगा दिया
परियों को आदेश हुआ ,
दौड़ो-- दूजा वैद ले आओ
अमलतास -गुलमोहर ने तब ,
परियों को है पास बुलाया
फूलों के कालीन बना,
देश-देश उनको पहुंचाया।
कोई वैद न कोई भेषज ,
कलयुग में '' महावीर ''कहाँ ?
लाडेसर बोला मैया से ,

मैया ! बादल मेरा प्रिय सखा है
बादल संग खेलूंगा तो
तापशाप सब गायब होगा
बादल - मैं  लंगोटिया यार -
तूने ही कहा सौ बार।
लुका - छिपी ,आइस -पाइस ,
स्टेपू और पकड़म-पकड़ाई
संग-संग जब हम खेलें कूदें,
कभी ताप ज्वर ना होता है।
तू भी व्यर्थ न अकुलाती है ,
जग सगरा चैन से रहता।
गयी बादलों को हुंकार ,
आओ-आओ सूरज द्वार
परियां ढूंढें घाट -घाट ,
जंगल- जंगल औ चौबाट।
पर बादल तो लुप्त हो गए ,

बेमौसम बरस  ! सुप्त हो गये
मचा सकल जग हाहाकार ,
सूरज का क्यूँकर , हटे बुखार !
पेड़ नहीं -कैसे बादल ,
जंगल कटे -नदियाँ सूखीं
हिम जगती की पिघल रही है ,
बादल!
कैसे बने; कहाँ से आयें ?
गईया -बछिया सोच रही हैं ,
धरती मइया सोच रही हैं
ये मानव मेरी ही संतान !
क्यूँ ब्रह्माण्ड को किया हैरान ?आभा।।

Tuesday, 8 May 2018


दो भाई थे। एक की उम्र 8 साल दूसरे की 10 साल।दोनों बड़े ही शरारती थे।
उनकी शैतानियों से पूरा मोहल्ला तंग आया हुआ था। माता-पिता रात दिन
इसी चिन्ता में डूबे रहते कि आज पता नहीं वे दोनों क्या करें। एक दिन गांव में एक साधु आया। लोगों का कहना था कि बड़े ही पहुंचे हुये महात्मा है।
जिसको आशीर्वाद दे दें उसका कल्याण हो जाये। पड़ोसन ने बच्चों की मां को सलाह दी कि तुम अपने बच्चों को इन साधु के पास ले जाओ। शायद उनके
आशीर्वाद से उनकी बुध्दि कुछ ठीक हो जाये। मां को पड़ोसन की बात ठीक लगी। पड़ोसन ने यह भी कहा कि दोनों को एक साथ मत ले जाना नहीं तो क्या पता दोनों मिलकर वहीं कुछ शरारत कर दें और साधु नाराज हो जाये।
अगले ही दिन मां छोटे बच्चे को लेकर साधु के पास पहुंची। साधु ने बच्चे को अपने सामने बैठा लिया और मां से बाहर जाकर इंतजार करने को कहा ।
साधु ने बच्चे से पूछा – ”बेटे, तुम भगवान को जानते हो न ?
बताओ, भगवान कहां है ?” बच्चा कुछ नहीं बोला बस मुंह बाए साधु की ओर
देखता रहा। साधु ने फिर अपना प्रश्न दोहराया । पर बच्चा फिर भी कुछ नहीं बोला। अब साधु थोड़ी नाराजगी प्रकट करते हुये कहा – ”मैं क्या पूछ रहा हूं..? भगवान कहां है ?” बच्चे ने कोई जवाब नहीं दिया बस मुंह बाए साधु की ओर हैरानी भरी नजरों से देखता रहा। अचानक जैसे बच्चे की चेतना लौटी। वह उठा और तेजी से बाहर की ओर भागा। साधु ने आवाज दी पर वह रूका नहीं सीधा घर जाकर अपने कमरे में पलंग के नीचे छुप गया। बड़ा भाई, जो घर पर ही था,ने उसे छुपते हुये देखा तो पूछा – ”क्या हुआ ? छुप क्यों रहे हो ?”
”भैया, तुम भी जल्दी से कहीं छुप जाओ” बच्चे ने घबराये हुयेस्वर में कहा।
”पर हुआ क्या ?” बड़े भाई ने भी पलंग के नीचे घुसने की कोशिश करते हुये पूछा। ”अबकी बार हम बहुत बड़ी मुसीबत में फंस गये हैं। भगवान कहीं गुम हो गया है और लोग समझ रहेहैं कि इसमें हमारा हाथ है!------------

यही है मासूम बचपन -काश फिर लौट आये -

Monday, 30 April 2018


मजदूर ======
म ====ओष्ठ्य
ज ====तालव्य
द =====दंत्य
ऊ ====कंठस्थ
र =====मूर्धन्य 
-------- जिव्हा ,तालु ,मूर्द्धा ,कंठ ,दंत ,ओष्ठ के संयोग से निकलने वाली ध्वनियों के अनुसार ही व्यंजनों का वर्गीकरण किया गया है। मजदूर एक ऐसा शब्द है जिसमे हर वर्ग के व्यंजन हैं --तो जो सबको लेकर बना वो समष्टि ही होगा और समष्टी में संघर्षो की कहानियां न हों ये तो हो ही नहीं सकता --व्यष्टि समष्टि के गर्भ से उपजती है और बड़े गर्व से मजदूर को मजदूर कहने का हक हथिया लेती है। पर उसे नहीं मालूम ये शब्द अपने आप में ही पूर्ण है कैसे देखिये ---
मजदूर -सर्वनाम तो है ही पर यदि हम व्यक्ति विशेष को नाम से नहीं ''मजदूर'' के नाम से ही पहचानते हैं तो उसे संज्ञा भी कह सकते है [ व्याकरणाचार्य मुझे माफ़ करें ]
मजदूर आ रहा है--एकवचन
मजदूर आ रहे हैं --बहुवचन --स्थितप्रज्ञ -जैसे का तैसा रहा सदियों से और ऐसा ही रहेगा सदियों तक ,एक वचन में भी और बहुवचन में भी - चाहे कितने ही मजदूर दिवस मना लो ,कितनी ही कॉन्फ्रेंस कर लो ,कितने ही नारे ''दुनिया के मजदूरों एक हो '' टाइप लगा लो --अरे मजदूर की नियति में तो व्याकरण ने ही रलेमिले हालात लिख दिए हैं मित्रों  --आप उसके हाल क्या सुधारेंगे  ? हाँ ! उसकी आड़ में दोचार जगह समोसे गुलाबजामुन की प्लेटें डकार आएंगे और हो सके तो अपने झोले में चम्मच भी चुरा लाएंगे।
अब देखिये मजदूर शब्द में जाती -लिंग का भी फर्क नहीं है --मजदूर स्त्रीलिंग ,पुल्लिंग दोनों है --तो क्या बदलेंगे आप ? यहां तो सब मिलीजुली संस्कृति है जनाब --सुबह सब अपने बच्चों को छोड़ काम पे चले जाते है --पीछे सभी के बच्चे खेलते कूदते ,मिटटी में लोटते कूड़े के ढेरों या आलिशान अट्टालिकाओं से निकले मलबे के पहाड़ों पे फिसलते चढ़ते ,एवरेस्ट पे चढ़ने उतरने का आनंद लेते हैं ,अपने जीने के लिए खुशियां ढूंढते इन बच्चों में अधिकतर बच्चे सायं माबाप के आने तक रोते हुए सो चुके होते है ,भूख से बिलखते बच्चों की भूख की गवाही ---उनके मिटटी सने चेहरे पे आंसू की लकीर देती है। क्या बदलसकेंगे इन हालातों को ?--नहीं ! बदलने को नीयत चाहिए होती है --न कि खुद को झोला छाप दिखा इन गरीबों को विद्रोही बनाने की कुचेष्टा।
मजदूर ---सर्वनाम है पर इस शब्द से ही निर्धनता ,गरीबी लाचारी और शोषित का बोध होता है तो इसे भाववाचक संज्ञा भी कह सकते हैं ---अब सोचने की बात ये है की जिस शब्द में ही करुणा है --वहां करुणा के दोनों पक्ष संयोग वियोग होंगे ही और ये जिसकी जिंदगी के हिस्से होंगे उसे वो अपनी स्तिथि के अनुसार ही परिभाषित करेगा सो कोई भी इनकी स्थिति कैसे बदल सकता है।
मजदूर --तो बस इतना हो जाये --ये जहां काम करते हैं वहां इन्हें मूलभूत सुविधाएं मिल जायें ,इनके बच्चों को भी राष्ट्र का भविष्य माना जाये --बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा का दायित्व उस सेठ का हो जहां वो काम करता है ---सरकारें यदि सख्ती दिखायें तो मजदूर भी मुख्य धारा में आ सकता है ---और यकीन जानिये वो अपना काम और अच्छी तरह से करेगा ---दिवस मनाने में खर्च करोड़ों रुपयों को भी इनके बच्चों को दिया जा सकता है ---पर बिल्ली के गलेमे घंटी कौन बांधेगा ? यहां तो रस्में रस्मअदायगी ही होती हैं बस -----मजदूर दिवस ----

Tuesday, 27 March 2018




बैठेठाले की बुढ़भस।।आभा।।
=================
पुस्तक पढ़ना प्रारम्भ करते  समय  लिखे  गये आलेख की पुनरावृत्ति - उसे -पूरा पढ़ने पे हो - निष्कर्ष वही हो पर  कुछ और प्रमाणिक्ताओं के साथ  हो तो आनंद गीता पढ़ने से मिलने वाले आनंद की तरह ही होता है ----पुनरावलोकन -पुस्तक  की समाप्ति पर ------

मैं  कई बार यही सोचती हूँ --वो समय जब गीता लिखी गयी ,समाज को संस्कारित करने का ,जीने की कला सिखाने का ,प्रकृति के महत्व को समझाने का ,साम दाम दंड भेद से मानव को सामाजिक प्राणी बनाने का समय था।  उस समय  हमारे ऋषि मुनि -जो कुछ ईश्वरीय गुणों और बुद्धि से युक्त ज्ञान के साथ पैदा हुए और तप से उसे बढ़ाया ( ईश्वर प्रदत्त बुद्धि और गुण आज भी बहुत से इंसानों में हैं ,जिसे  हम -giftedness  कहते हैं )   -समाजनिर्माण के कार्य में लगे हुए थे।  वेद उनकी प्रज्ञा में अवतरित हुए। मंत्र बने।  हम वेद पढ़ें तो मंत्रों में उनके ऋषियों का नाम भी पाएंगे -  इसीलिए --वेद ज्ञान -प्रभुवाणी है ,उन्हें ऋषिमुनियों ने संजोया , प्रत्यक्ष किया। वेद मंत्रों में  आदि मानव और समाज के लिए नियम बनाये गए , प्रकृति से मनुष्य का परिचय ,सामंजस्य और संवर्धन ये सभी बताया गया - पर जनसंख्या बढ़ने के साथ ही मानव के समक्ष अन्य बहुत सी चुनौतियाँ आने लगीं  -ऐसे में शिक्षा ही चपेट में आयी , मेहनत और शक्ति से सब मिलने लगा तो शिक्षा को समय बर्बाद  मान  उसकी अवहेलना हुई ( ये प्रवृति आज भी समाज में ज्यूँ की त्युं है )  फिर उसे राजघरानों की सम्पति मान लिया गया।  आम गृहस्थ के पास  ज्ञानार्जन का इतना समय न  था -कि इन मंत्रों को समझे  ऋषिमुनियों , शिक्षकों ,बुद्धिजीवियों ,वैज्ञानिकों ,और आमगृहस्थ में अंतर   था , जीवनयापन कठिन था , बस गृहस्थी चलाने लायक ज्ञान मिल जाए आम जन यही चाहता था तब भी। 
ऐसे समय में बुद्धिजीवियों को ये भय सताने लगा कि बिना शिक्षित हुए कहीं समाज अराजक न हो जाए। सबने मिलके समाधान निकाला कि वेद से इतर कोई उपनिषद हो जो क्लिष्ट न हो और सभी के लिए सुलभ हो। जीवन के प्रत्येक क्षण को सहज और सुंदर कैसे बनायें ये गान के रूप में हो -- मंथन के पश्चात इस सभी के लिए  " गीतागान " को उपयुक्त माना गया।  कृष्ण ने सूर्य को जो सृष्टि का राजा था  गीता ज्ञान दिया -जिसे उन्होंने लोक में - प्रतिदिन के  गान  के रूप में गृहस्थियों के लिए गाया।  
 प्रभु मुख से  निःसृत गीता -गान  -- संक्षिप्त था ,हर गृहस्थ के लिए था ,हर पल के लिये था -- उसे व्यास मुनि ने जन -जन के लिए प्रत्यक्ष किया --इसका प्रमाण भी कृष्ण ने गीता में ही दिया है जब वो अर्जुन से कहते है --ये ज्ञान बहुत पुराना है तब तू नही था --मैंने इसे सूर्य को दिया था --सूर्य वो ऋषि जो सूर्यलोक बना के  संसार का पिता बना और आज का प्रत्यक्ष देवता है --जिसके न होने से सृष्टि भी समाप्त ही समझो।
 साथ ही कृष्ण ये भी कह रहे है --मैं मुनियों में व्यास मुनि हूँ --- ऋषि व्यास को ही गीता महाभारत ,भागवत और कई अन्य पुराणों की रचना का श्रेय जाता है।
मेरी कल्पना तो यही है  कि गीता को वेदों के साथ ही रचा गया। वेद तब शिक्षा के लिए पाठ्यक्रम का हिस्सा थे - गीता को प्रतिदिन के पाठ  के रूप में गृहस्थियों के लिए लिखा गया  ,ठीक ऐसे ही जैसे वाल्मीकि रामायण और तुलसी रामायण।
समय का पहिया घूमता रहा - मनुष्य भौतिक वस्तुओं में उलझता गया -वेद और गीता समाज के एक छोटे से अंग के लिए ही सीमित हो गए ,यदाकदा लोग इनके पास जाते पर केवल हाथ जोड़ने के लिए।  
जीवन जीने की कला ,योग ,यम-नियम ,प्राणायाम एवं श्रद्धा ,संस्कार युक्त कर्मप्रधान ,त्यागमय भोग ,का मार्ग प्रशस्त करने के लिए उपनिषद थी  गीता पर किन्ही कारणों से ये उपनिषद लोकप्रिय (बेस्ट सैलर) की श्रेणी में नही आ पाया ,उस समय के ''बेस्ट सैलर'' का निर्णय पुस्तक की '1000' कॉपी बिकने पे नही होता था अपितु समाज का हर वर्ग उसे अपनाये ,उसकी चर्चा करे ,उस पुस्तक से अपने को जोड़े उस पुस्तक को जिये तब वो लोकप्रिय की श्रेणी में आती थी। 
शायद "गीता माफलेषुकदाचन '' के सिद्धांत पे गायी गयी।  वो युग भौतिक संसाधनों को बढ़ाने और संजोने की प्रारम्भिक अवस्था में था अधिकतर समाज के लिए भौतिक सम्पन्नता के आगे आध्यात्मिक सम्पन्नता का कोई मोल नहीं था। 
ऐसे में  " फल की चिंता मत कर " को अपनाने वाले समाज में केवल मुट्ठी भर लोग ही रहे होंगे। 
अब तक व्यास मुनि महाभारत  लिख चुके थे। महाभारत उस काल का इतिहास है ,जो मनु से प्रारम्भ हो के कृष्ण के समय तक का  लिखित दस्तावेज है -सरल और सहज भाष्य। इसमें मानव मन की प्रत्येक प्रवृति का वर्णन है -लोभ-लालच से लेकर वरदानों का प्रामाणिक आलेख ,जड़ों से जोड़ता उपनिषद जो अपने अतीत पे गर्व करना सिखा  रहा था और जीवन-यापन तथा सफलता-असफलताओं  के प्रामाणिक उदाहरण दे रहा था।  ये उपनिषद समाज में  गया -लोकप्रियता की कसौटी पे खरा उतरा , वो  सारे उपनिषदों में सबसे अधिक गाया जा रहा था ,इसमें और भी कई गीताएं थीं जो  विद्वानों के मुंह से गायी गयी थीं ,पर कोई भी पूर्ण नही थी --तो 
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् --
कृष्ण, वेदव्यास [कृष्णद्वैपायन ] इत्यादि ऋषियों ने मन्त्रणा की और सृष्टि के आरम्भ में  कृष्ण द्वारा गाये गए " गीतागान "  को समष्टि के लिए सर्वोच्च ग्रन्थ मानके उसे महाभारत में समाहित किया गया।
महाभारत के युग में  लोभ ,लालच स्वार्थ ने मानव को जकड़ लिया ,वेदों को क्लिष्ट समझ के छोड़ दिया गया --- ऐसे समय  में कृष्ण ने समाज को संस्कारित करने के लिए गीता का सहारा लिया।  वो भक्तियोग का समय भी था --
''ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्द्देशेअर्जुन तिष्ठति --मद्याजी मां नमस्कुरु " --
से सभी में ईश्वरीय तत्व है की  पुनर्स्थापना की गयी। 
गीता को प्रभावशाली बनाने के लिए उसे युद्ध  क्षेत्र में और युद्ध के प्रारम्भ में ही प्रस्तुत किया गया। जनता अहंकारी और पांडवों को पीड़ा देने वाले कौरवों का विनाश चाहती थी। अत: बड़े मनोयोग से युद्ध को देख रही थी। ....... 
  भाई -भाई ,सभी बन्धु-बांधव आमने सामने हों ,रणभेरी बज चुकी हो , जब सभी बड़े अपने क्षुद्र स्वार्थों और पूर्वाग्रह युक्त कर्तव्यनिष्ठा के लिये अत्याचारी शासन के साथ हों --ऐसे में अर्जुन का अवसाद , कृष्ण का गीताज्ञान --और उस ज्ञान से मिली जीत ,निश्चय ही समाज को गीता के उपदेशों पे विश्वाश  करने को प्रेरित करती। 
बस यही समय उपयुक्त समझा गया जब सृष्टि के आरम्भ में प्रभु के द्वारा गाये गए गान को ,जो मानव के लिये जीने  का आधार था -एक बार पुन: प्रकट किया गया।
महाभारत में स्पष्ट है कि युद्ध से पूर्व ,युद्ध टालने की हर छोटी से छोटी कोशिश की गयी। दूत भेजे गये ,यहां तक कि कृष्ण स्वयं दूत बनके गये ,एक- एक व्यक्ति से पूछा गया कि वो युद्ध होने की अवस्था में किसके साथ होगा --तो क्या अर्जुन जैसा वीर ऐन युद्ध के आरम्भ होने पे अपना गांडीव नीचे रख देता ? जबकि अर्जुन को कृष्ण  पूर्व में ही पूरी तरह से देख-परख के ठोक-बजा के युद्ध के लिए तैयार कर चुके थे। 
700 -श्लोकों के उपदेशों तक दोनों ओर की सेना प्रतीक्षा करती ! जबकि दुर्योधन शीघ्रातिशीघ्र पांडवों का अस्तित्व समाप्त कर देना चाहता था  । शकुनि जैसे अराजक तत्व युद्ध को शीघ्रातिशीघ्र चाहते थे ? क्या वो लोग अर्जुन को गांडीव भूमि पे रखते हुए देख चुपचाप खड़े रहते ! कौरव तो अनेकों बार अनैतिक व्यवहार और पांडवों को मारने की कोशिश कर ही चुके थे -तो- वो गीता के सातसौ श्लोक सुनने के लिए कैसे खड़े रह सकते थे ? 
गीता में प्रथम अध्याय ही युद्ध के सम्बन्ध में है अन्य सभी अध्याय समष्टि को कृष्ण का गान हैं।
क्या हम ये सोच सकते हैं कि प्रथम अध्याय कृष्ण की सहमति से इसमें क्षेपक किया गया और फिर इस गीतोपनिषद को महाभारत में डाला गया ? बीच-बीच में अर्जुन से वार्तालाप के द्वारा इसकी युद्ध में और महाभारत में होने की पृष्ठभूमी को भी परिभाषित किया गया। 
बस यूँ ही कुछ नया विचार यदि आपकी सोच से भी मिलता हुआ हो तो खाली पड़े दिमागी घोड़े दौड़ने लगते हैं। 
भगवद्गीता पे एक पुस्तक पढ़ी  --पुस्तक तो अंग्रेजी में है और अंग्रेजों के लिए ही लिखी गयी है -मैंने खरीदी भी पिछले वर्ष टेक्सास में ही थी --शायद -- EKNATH EASWARAN --केरल के विद्वान थे जो कलिफ़ोर्निया में रहने लगे उनके द्वारा लिखी गयी है ,पर है अच्छी। 
एक बात जो मेरे मन में भी चलती है वो मुझे इस पुस्तक में भी मिली --लेखक कहता है की गीता एक पूर्ण उपनिषद है। ये महाभारत का भाग हो ही नही सकता। इसमें वेदों का मंथन कर जीवनजीने की उत्कृष्ट कला का वर्णन है और ऐसा उपदेश लड़ाई के वक्त सम्भव ही नही। ये वेदों के समय में ही लिखा गया एक स्वतन्त्र उपनिषद है ,समाज में अधिक प्रचलित न होने के कारण इसे महाभारत के युद्ध काल के पहले डाला गया ,लोकहित हेतु । युद्ध के नाम पे गीता का केवल प्रथम अध्याय ही है।
"गीता की  विशेषता यही  है ,उसे मन की जिस अवस्था में पढो ,समाधान उसी के अनुरूप  मिलता है।"
मैं अभी इस लायक नही हूँ कि गीता का विश्लेषण कर पाऊं ,पर यूँ ही लिख दिया ,शायद किसी और की भी मेरे जैसी सोच हो--कि गीता अपने आप में एक संपूर्ण उपनिषद है जो वैदिक काल की रचना है --इसे महाभारत में डाला गया इसलिये ये महाभारत में भी है और उससे बाहर भी पूर्ण ही है ---कन्हैया और वेदव्यास जी से क्षमा प्रार्थना के आवेदन सहित-
गीता वैदिक काल का ही गान है ,पर उसके मंत्र उतने क्लिष्ट न होकर सरल और सहज हैं , भाषा वेदमंत्रों से अलग है -आम संस्कृत बोलचाल की भाषा - इस कारण कालांतर में बुद्धिजीवी इसे वेदों के साथ बना ग्रंथ नहीं मानते।
मुझे लो लगता है महाभारत में अन्य जितनी भी गीता हैं वो श्रीकृष्ण के मुंह से निःसृत गीता ज्ञान का ही सार हैं - "गीता "वो उपनिषद जो सृष्टि के आरम्भ में ही वेदों के साथ अवतरित हुआ पर कुछ स्थितप्रज्ञ  ऋषियों तक ही सिमित होके  रह गया। 
        कुछ जोड़ा -कुछ मिटाया और पुरानी रचना को " नवानि गृह्णाति नरोपराणि " का कलेवर -कैवल्य दिया -बैठेठाले की बुढ़भस।।आभा।।















Saturday, 24 March 2018



रामनवमी बधाई और पितृ प्रसाद 
=======
राम अब तुम्हारी न चलेगी
अब तो है रम का राज्य 
ररररराम तुम दीर्घ रूप हो 
रम तुम लघु रूप हो 
जब लघु से ही बनते काम 
तब दीर्घ का क्यों लें नाम 
राम तुमको जपने से 
ऋषि हो गए ग्यानी 
रम को पीने से मानव हो जाता वि --ग्यानी 
 विज्ञान का युग ही तो है ये   कलयुग।  
 राम अब रम की ही सजती  हैं दुकानें 
चमचमाते शीशों के पीछे 
जगमाती दुकानों में रम 
बड़े करीने से जाती सजाई
जितनी पुरानी उतने सुंदर लिबास में
पर राम तू तो है सबसे पुराना  
 तुझे तो तम्बू में ही रहना होगा 
क्यूंकि तू दीर्घ है ,सनातन है
आज की पीढ़ी के लिए रूढ़ि है
तुझे ये  अपमान सहना  होगा !
राम ! तू जनजन में क्या समाया 
तुझे घर से ही बेघर कर दिया 
तेरा मंदिर एक म्लेच्छ ने तोडा 
और हम अब तक देख रहे हैं -
वो सौदाई हैं वोट के 
वो नेता हैं -तेरा जन्म हुआ !
यही नहीं मानते -
तू जो कण-कण में समा गया 
बहस का विषय हो गया !
तुझे एक जरा सी जगह पे क्यों पूजें ?
बुद्धिजीवी यही तर्क हैं देते। 
हर शहर ,गाँव गली मुहल्ले में 
कितने ही रूपों में मिलती रम 
सस्ती से सस्ती महंगी से  महंगी 
ऐसे ही जैसे  तेरी तस्वीर या मूरत
कागज से लेकर चंदन से बनतीं 
रूपये से लेकर अरबों में बिकती ,
पर राम तू -क्यों  कण- कण में जा बसा  
तुझे रहना था अयोध्या ही में। 
तूने रावण जैसे शिवभक्त 
का किया था शिरोच्छेदन 
क्यूंकि ,  वो हो गया था पथभ्रष्ट! 
आज हैं  हम सभी पथभ्रष्ट  -
रम के नशे में है आधी आबादी -
पुनर्संस्थापन मांगती है  जगती 
तो क्या -प्रकृति बदला लेगी? 
हाँ ! मैं भी चाहती हूँ !
प्रकृति के रौद्र रूप में आओ राम -
एक नहीं अब लाखों हैं रावण-
जानकी का होता रोज ही हरण !
सब पे करना होगा शरसंधान। 
हे माँ सीता! राम का प्राकट्य दिवस 
कैसे दूँ बधाई ?
 मेरे इष्ट की मूर्ति तम्बू में है - 
क्षमा करो राम हमें  क्षमा करो 
तुम हो हममें  समाये 
पर , जन्मस्थान की गरिमा 
हम न संभाल पाए 
एक आतातायी के कुकर्म को 
हम आज तक हैं ढोते 
हर वर्ष नवरात्रि पे 
शक्ति आराधना कर 
रामनवमी की खोखली 
बधाई कहते -
हम तेरी नकारा संतानें हैं 
भेड़ हैं -बस-
 शुभकामनायें देने को अभिशप्त
 सुरा सुंदरी का ही वर्चस्व 
रम में हैं डूबे युवा एक तिहाई 
 है लक्ष्मण बिन सूनी  ठकुराई ,
गूँज रही रामनवमी की बधाई -
तेरे लिए बधाई ,मेरे लिए बधाई 
सबके लिए बधाई ,खूब बाजे बधाई 
पर राम तुझे कैसे दूँ बधाई !
राम ! तेरा नाम अब वोटों की फसल है 
मौसिम पे बस नेता ही करते हैं कटाई 
देके प्रजा को रम की बाटली की दुहाई
राम नाम की फसल काटते है सौदाई-
कैसे दूँ रामनवमी की बधाई  ।।आभा।।