Friday, 24 August 2012

s.apnon kae upvn me jb bhi main tum sae milnae aati hun ..

                                                    ( हर क्षण सपना सपने में बस तुम )
सपनों के उपवन में जब भी मैं तुमसे मिलती हूँ ,
हर किसलय के अधरों की आभा सी बन कर खिलती हूँ .
जीवन के मरु ,नंदन कानन में ,याद तुम्हें जब करती हूँ ,
मैं रोती नहीं !........वारती ......मानस ...............मोती हूँ
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जब उपवन में दिख जाता है कोई काँटा ,
दुःख दर्द विरह की कसक और बढ़ जाती है ,
तब चुपके से आकर कानों में कह जाते तुम !
मेरे प्रांतर में क्यूँ कांटे ही देखूं मैं ?
हर डाली मैं मुस्कान तुम्हारी आली है ,
हर क्यारी में पद- चिन्ह तुम्हारे दिखते हैं ,
शीतल शबनम की बूंदें प्यास जगाती हैं .
सपनों में सरिता की लचकीली लहरें ,
मन उपवन के अरमानों को डस जाती हैं .
पर शांत किन्तु गंभीर वह नि:स्वन तेरा ,
भ्रमरों सा गुंजित होता है रंध्रों में मेरे ,
मैं बन कर कली हवा में इठला जाती हूँ ,
उपवन में खिलती और झूमती जाती हूँ .
जो पौध कीचकों  की रोपी थी संग तेरे ,
उन क्वणित कीचकों के सुर में आनंद पाती हूँ .
अनियंत्रित भावों से हृदय निनादित होता है ,
सपनों के उपवन में जब भी मैं तुमसे मिलती हूँ ,
दृग युगल सींचने लगते हैं उस उपवन को ,
अवसादों के झरते फूलों की माला पहने ,
वेदना विदग्ध सपनों को मैं समझाती हूँ -----------
मेरा प्रेम नहीं सम्मोहन की हाला --
मेरा प्रेम नहीं विरह ,कटु -रस का प्याला ,
मैं बढती जाती हूँ नभ की ऊँची चोटी पर ,
औ व्यथित चित्त को बोध युक्त कर पाती हूँ .
मैने व्यथित हो जान लिया ,
विरहा में जल ज्ञान लिया ,
तन -मन का वह पावन नाता ,
वह अंतिम सच पहचान लिया .
मैने आहुती बन कर देखा ,
यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है .
मिलने के पल दो चार यहाँ ,
तप यज्ञ कल्प तक चलता ह.
सपनों के उपवन में मैं जब भी तुमसे मिलती हूँ ,
हर किसलय के अधरों की आभा सी बन कर खिलती हूँ ..
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.....................................................................................आभा ... यादों के झुरमुट से .......................................................................................................................................................................................


 

Thursday, 23 August 2012

Jo tum detae saath mera

                                            (  जो तुम देते साथ मेरा सपनों का लोक बसा पाती ) 
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भावों से भरा हृदय मेरा ,
चित्र बनाने को आतुर ,
निर्जन से साधारण वन को ,
, उपवन कर देने को आतुर .
स्वप्न तैरते जो मन  नभ में ,
साकार उन्हें मैं कर पाती .
झरती संध्या के फूलों में ,
कुछ रंग सुनहरे भर पाती .
जो तुम देते साथ मेरा सपनों का लोक बसा पाती ..
               प्रतिध्वनी लौटने को आतुर,
               मेरे मन के पाषाणों से ,
               घन गर्जन करते रहते हैं ,
               सपनों के  मेघों मेहर क्षण .
               सुंदर प्रसून मन भावों के,
               अविरत झरने को जो उगते .
               बिखरे मोती से इन भावों को ,
               गायन का प्रतिकार दिला पाती .
                जो तुम देते साथ मेरा सपनों का लोक बसा पाती ..
मेरे मन के तूफानों ने ,
अविरल चलते झंझावत ने ,
सुख नीड़ों को अंजाम दिया
हिम सर्द सरीखी हिम नद ने ,
लावे सी जलती श्वासों के
विध्वंसों को निर्वाण दिया
उस वितथ -वितत आडम्बर को ,
सच का पाथेय दिखा पाती .
जो तुम देते साथ मेरा सपनों का लोक बसा पाती ..
                 झरती संध्या के फूलों में ,
                 कुछ रंग सुनहरे भर पाती .
                 स्वप्न तैरते मन नभ में ,
                 साकार उन्हें मैं कर पाती ,
                  जो तुम देते साथ मेरा सपनों का लोक बसा पाती ..
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.....................................आभा ....................................................


 
                                                (  मैं हरी घास हूँ )

                  घास हूँ मैं ,
                  नहीं कुछ ख़ास हूँ मैं .
                  रौंदते प्रात: मुझे तुम ,
                  ताजगी देती तुम्हें मैं .
                  और हरियाली ये मेरी ,
                  चेतना देती तुम्हें .
                  काट देते हो मुझे तुम ,
                  रौंदते रहते मुझे ,
                  शून्य सब संवेदनायें ,
                  ना कोई अहसास तुमको .
                  पर यदि मैं जी गयी ,
                  मैदान के कोने कहीं ,
                  निरख जाती और खिलती ,
                  सुंदर भी क्या लगती हूँ मैं .?-------------------------------आभा -------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

Wednesday, 22 August 2012

ek thaa bachpan mera bachpan

                                                       मेरा बचपन
                    इक था बचपन मेरा बचपन ,
                    सरल सुकोमल निश्छल मादक .
                    नव कोमल सृजन के अंकुर ,
                    सुंदर भावों से परिपूरित .
स्वच्छ व्योम से निश्छल मन में ,
उमड़ -घुमड़ बादल से सपने ,
इंद्र धनुषी रंगों वाले ,
मृग छौनों के संगों वाले .
                     पल -पल बनते और बिखरते ,            
                     नित्य नये आकार वो धरते .
                     पंखों से भी कोमल -कोमल ,
                     हिम फाहों से सजते सपने .
छूलूं मैं ये गगन उछल कर ,
पार करूँ अंबुद तैर कर .
नीड़ बना लूँ शिखरों पर मैं ,
औ बारिश में आग जलाऊं .
                        बचपन भी क्या बचपन था वह ,
                        सारा जगत पाँव के नीचे .
                        आंगन में खेला करते थे ,
                        कितने सच्चे निश्छल बच्चे .
पर जग को जब मैने अपनाया ,
बचपन गया जगत को पाया .
मधुर सुकोमल सपने सारे ,
खो गये कहीं दूर हमारे .
                           बौर आम पर जब भी देखे
                           मन हर्षाया -----------------
                           चलो आम का सीजन आया .
                           इंद्र-धनुष जब बना गगन में ,
                           सोचा बारिश अच्छी होगी .
पार करें यदि अंबुद को तो ,
धन का प्रश्न सामने आया .
पर्वत शिखरों पर चढ़ने को ,
बुकिंग कराने जाना होगा .
बारिशें पीने पर हमको ,
वाइरल से पछताना होगा .
                              काश आज मन बचपन होता,
                              निश्छल होता चंचल होता .
                              नव कोमल सृजन के अंकुर
                              सुंदर भावों से परिपूरित .
जीवन की संध्या बेला में ,
जब यादों में खो जाती हूँ ,
देख-देख बच्चों को अपने ,
अपना बचपन दोहराती हूँ
                                  बचपन तो अब भी बचपन है ,
                                  मैं ही उसको छोड़ चुकी थी ,
                                  विगत स्मृतियों के झूलों में ,
                                  मन मेरा अब भी बचपन है .
---------------------------------------------------------------आभा ----------------------------------------------
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---------------------------------------------------मेरी माँ ------------------------------------------------------------
                 उषा की अरुणिमा है माँ ,
                 निशा का विश्राम ---माँ .
नित्य जिस पर पग धरें हम ,
गोद वसुधा की वही  माँ .
दे जनम मुझको बनाया ,
जगत से मुझको मिलाया .
इस क्षुद्र से व्यक्तित्व की ,
निष्पत्ति औ निस्वन है माँ .
                   जब कभी उल्लसित हुई मैं ,
                   माँ ने भी उल्लास बांटा .
                   डगमगाई जब कभी भी !-
                   निसा ,तृष्टि ,संतोष है माँ .
जगत को जिसने बनाया ,
उसकी भी पहचान है माँ .
पल -पल बदलती सृष्टि को ,
सृष्टि का वरदान है माँ .
                      हर पोर एक दीपक है माँ का ,
                      हर रोम एक बाती है उसकी ,
                      स्नेह की चितवन संजोये ,
                      कान्हा का अंजाम है माँ .
स्पर्श है ममता भरा ,
संघर्ष में साहसी बनाये .
हाथ सर पे रख यदि दे .
पंख लग जाते दुखों को .
                       वेदना की घन घटायें ,
                       क्षार में मधुसार है माँ .
                       शून्य के निश्वास में ,
                        श्वास का रोमांच है माँ .
हर साँस मेरी रागिनी ,
माने ही तो इस को सजाया .
कंटकित से इन सुखों के ,
परित्रास में परित्राण है माँ
-------------------------------
--------------------------------------आभा


,
                         
    

Wednesday, 18 July 2012

Shradhanjali....by abha

घोर तम निविड़ निशा ,चन्द्रहीन इक रात ,
नभ में उजले-उजले तारकगण ,और धरा पर उद्दुगन झलमल .
शांत धूमिल पर कुछ श्रांत ,खड़ी आंगन में वृक्षों की पांत -----
अलसाई सी सोच रही थी ,अंधियारे में छिपी हुई है -------------
-----------उषा एक उज्वल निर्मल सी ---------------------------
जान न पायी इस जीवन में उषा नहीं अब आने वाली ------
प्राची में सूरज ने जो कुंकुम बिखराया ,---------------------------
मेरे घर से ही था सूरज ने ,वो कुंकुम चूर्ण चुराया ----------------
अरुणोदय की वो लालिमा ,आयी करने वैभव-हीन मुझे ..

सुबह हुई क्या सुला गयी ,चिर-निद्रा में मेरे जीवन-धन को ,
ध्वस्त हुआ मंदिर मेरा ,सो गये चेतना के सब पाश .
सुबह बनी अभिशाप ,जगत की ज्वालाओं मूल ,
ईश का जो वरदान ,मैं कभी न सकती उसको भूल .
एक पहेली इस सुबह ने ,जीवन मेरा बना दिया ,
ढूंढ़ रही हूँ उस अपने को जो तिमिर गर्भ में खो गया .
ज्योति का प्रतिबिम्ब वह जीवन में फिर ना आयेगा
होगी न अब मेरी सुबह ,औ न प्रभात ही आयेगा .
हास्य का वह मधुर पर्याय ,शीतलता का वह उन्माद ,
मेरे मृग-छौनों का आलम्बन ,छोड़ गया था उनको आज .
हर-पल साथ रहते थे जो ,वो पिता ,आज कहाँ गये ?
करुण क्रन्दन और चीतकार ,पर ,शांत पिता की तरह खड़े .
अविरल विषाद इन आँखों से ,वर्षा-ऋतू बन बहता जाता ,
पर दग्ध हृदय से रुद्ध कंठ से माँ को सब समझाते हैं ,
पिता हमारे साथ खड़े हैं बस ,अब मन के भीतर चले गये ,
प्रतिनिधि बनकर वे पिता के,  मेरा आलम्बन बन जाते हैं .
आलोक रश्मि से बुनी उषा-अंचल ने ही, मेरा आंचल छीन लिया .
प्राची के फैले मधुर राग ने ही ,मुझे विराग किया
अब प्रभात की शीतल वायु ,आतप बन मुझे जलाती है ,
पर बच्चों की स्नेह दृष्टि उस पर जल बरसाती है .
निशब्द मौन विजन उषा ,हर रोज जगाने आती है ,
स्नेहसिक्त जिजीविषा पिताकी ,भी वह साथ ही लेकर आती है .
माँ बनाया प्रकृती ने ,पिता मुझे तुम बना गये ,
स्नेह सिक्त हो सींचू सब को ,वो पथ मुझको दिखा गये .----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------श्रधान्जली   अजय को ------------------------आभा ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------