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Sunday, 17 November 2013

''काना - फूसी करते अँधेरे ''
 ___________________

   रोशनी - खुशियों की आहटों को ,
 टीन की दीवारों  फटी धोती के पर्दों के पीछे ,
 कान लगा के सुनते अँधेरे |
  सामने बनते मल्टीप्लैक्स का बिखरा मलबा ,
  कई मंजिल इमारतों को बनाते -बनाते ,
 खुद ही ईंट -गारा -पत्थर बन गये ये लोग |
  रेत की ढूह पे खेलते बच्चे इनके  ,
  बारिश के पानी से भरे गड्ढे हैं ,
   स्विमिंग पूल जिनके |
मजदूरी पे गये माँ बाप ,छोड़ गये हैं पीछे ये आवारा बच्चे ,
रुको ! क्यूँ कहें आवारा इनको ?
समय बिताने का है कोई सामा इनके पास !
न इनका  स्कूल ,न इनका क्रेच ,न पार्क न खिलौने ,
बड़े -बड़े मकान ,सडकें ,पुल बनाते इनके माँ बाप ,
बस ! जुटा पाते हैं दो जून की रोटी ,तन ढकने को कपड़ा |
सीमेंट में रेतऔर घटिया सरिया लगाता ठेकेदार ,
बड़ी गाड़ी में आता है -बड़ी सी तोंद लिए |
बनवा दिए हैं टिन-शेड लेबर के लिये,
न रसोई न बाथरूम न शौचालय ,
ये नहीं हैं इंसान मालिक की नजर में ,
होते है ये भी सामान मकान बनाने का |
क्यूँ पढ़ाया जाय इनके बच्चों को ?
क्यूँ सोचा जाय इन सब के लिए ?
पढने लगे और साफ रहने लगे तो ,
सोचेंगे अपने और परिवेश के बारे में |
चेतना जागेगी ,समझेंगे इन्सान अपनेको ,
महसूस करेंगे दिल का धड़कना |
प्यार होने लगेगा  अपने से ,अपने परिवेश से ,
और अपने बच्चों के भविष्य से |
फिर ! फिर ,मकान कौन बनाएगा ,
बिल्डर क्या करेगा ? कहाँ जायेगा ?
और जो इनमे सोचने की शक्ति आ गयी तो !
इनका भी जमीर जाग गया तो !
ये अल्लम-गल्लम ,भ्रष्टाचार को,
 महसूस करने लगे तो !
तो क्या इन्कलाब ही न आ जाएगा |
एक हल्की सी जिन्दगी की सुगबुगाहट ,
एक धीमी सी रेख रोशनी की ,
पर्दे के पीछे से सुन देख लेते हैं अंधेरे  इस बस्ती में ,
और दौड़ के जाते है चुगली करने साहब से ,
फिर रची जाती हैं साजिशें ,
पहले डराया -धमकाया जाता है ,
न माने तो सौगातों के नाम पे भीख बांटी जाती है ,
और फिर भी बात न बनी तो ! तो फिर क्या ?
आ जायेगी एक नयी लेबर >>
गरीबों की कमी थोड़े ही है ;
दो जून की रोटी और सर पे छत तो चाहिए ही |
जहाँ भी जायेंगे ये ही मिलेगा ,
फिर ! यहाँ ही अच्छे है ,टिके तो है |
 अंधेरों की साजिशें यूँ ही चली हैं ,
यूँ ही चलेंगी ! ये बस्ती यूँ ही गुलजार रहेगी ,
 विकास और समाज  को चिढाती हुई |................आभा



  

Friday, 2 August 2013

                                                             [  जीवन फिर भी जीवन ]
                                                             *************************
     बसंती बयार में सुबह की सैर ;
     शाखों से टूटे बिखरे .सूखे----
      पत्तों पे चलने  का स्वर ;
      चर -मर, चर -मर ,चररमरर ;
      यूँ  ही    चरमराता   जीवन !
      बारिशों  से   भीगी   गीली ,
     फिसलन भरी पहाड़ी पगडंडी ;
     चप्पलें   हाथ   में    लिए ,
      छाता    कंधे    पे    टाँगे 
      अपने गाँव की चढाई चढना ;
      सपनों की टूटन तक पहुंचना !
      दरकते पहाड़ों से गिरती बालू ,
      मिट्टी के साथ बरसते पत्थर ,
       घाटी     से      चोटी      तक ,
      पेड़ों की याद में रोते पहाड़ों का दर्द ;
       हाथों  से  छूटती  जिन्दगी !
      भूखी माँ के सीने से चिपका ,
       .............. बच्चा ...............
       कंकाल  हो  चुके  शरीर  से ,
       सडकें  खोदने को मजबूर  ,
       गैंती     चलाता        पिता ;
       दुश्वारियों में जीवन संवारने की नाकाम सी  कोशिश !
       जीवन फिर भी जीवन ;
       जीने  को  मचलता  है ! ........................
.................आभा ........................

Tuesday, 30 July 2013

                                                                   '' मिटने का सुख  ''
                                                                  *****************
 बसंत  ! प्रकृति की चेतना  का आभास ,
  वृक्षों ने पहने कोंपल के गहने .
 चेतन  के स्पर्श का ,करने अभिनन्दन .
 चलना होगा --  बागीचे में  ,
  वृक्ष से अविरत--
  झरते  पत्तों की सेज पे .
  चर-मर ,चर-मर ,चररमरर --------
   उछल रहे हैं  नन्हे बच्चे --
   लय बनी इस चररमरर पे 
     पुलकित ,मन से --
   बना रहे कुछ मीठे सपने ,
   औ  मैं बैठी सोच रही हूँ --
  पत्तों की इक  पूरी पीढ़ी ने ,
  किया निछावर अपने को ,
   नव सृजन ,नव  कोपलों हेतु .
   एक हरा वृक्ष फिर से सूखा ,
   बसंत में नया होकर ,निखरने को .
    पीताम्बर ओढ़े ,अमलतास के वृक्षों की पांत ,
    रोज नए पुष्प- गुच्छ की लटकती झालरें ,
    प्रकृति के श्रृंगार को ,  ईश्वर का उपहार ---
    पर सुगन्धित बयार के लिए ,
    असंख्यों सुमन ,पल पल मिटते है ,
    ब्रह्म-मुहूर्त में ही -छोड़ देते है डाली ,
     नयी कलियों के चटखने की खुशी में .
     एक पीढ़ी को मिटना होता है ,
     नई को पुष्पित ,सुरभित करने को .
     आज एक नया गुलाब खिला ,
      गर्व से शीश उठाये ,
       अपने सौन्दर्य  औ मादकता पर इठलाता हुआ .
      उसे क्या पता ----------
      अभी -अभी जो बड़ा सा ,सुंदर गुलाब मुरझाया है ---
     उसके  मादक पराग की सुगंध ने ही ,
     इस कली  को चटकाया है।
      देखते है हम,  माता -पिता  को ,अपने साथ ही ,
       युवा  से बुजुर्ग होते हुए .
        अपना स्व निछावर कर ,पीढ़ी को पोषित करते हुए .
       डूबता सूरज तो प्रतीक्षा है ,
       झरने नदी में ,नदी सागर में .
       एक का अस्तित्व मिटा --
       दूसरा पूर्ण हुआ ...
       पूर्णता या शून्यता , दोनों के एक ही माने ,
      अस्तित्व का तिरोहित हो जाना .....
      एक सुखद मौन ...आगत के स्वागत की राह बनाता ...
      खो जाना ,मिट जाना ..ऊर्जामय हो जाना ,
      नयी पीढी के सृजन हेतु ,
      अग्नि में जलके --माटी  में मिल जाना .
     नए पुराने का वर्तुल ...
      एक  सत्य ,शाश्वत सत्य ...
        जो मिट जाता है वही बचता है ...........आभा ......

Tuesday, 9 July 2013

बचपन को बचपन लौटाना होगा ..

 **********नन्हे -नन्हे बच्चे --ऊर्जा के अजस्त्र श्रोत खेल रहे हैं पार्क में।। .गीली मिट्टी की सोंधी महक से मन -प्राण प्रफ्फुलित हो रहा है .ये बच्चे भी हमारे देश के भविष्य के लिए गीली मिट्टी की सोंधी महक ही हैं ,बैठ के अपने देश के भविष्य को देखना -----एक सुखद अनुभूति है ,आँखें सुख पाती  हैं और मन शांत और सुरभित हो जाता है .पर आज मैं मुक्त मन से सोच नहीं पा रही हूँ। प्राण चिंता मग्न है।---------- हमारी पीढ़ी ने विकास की जिस यात्रा को देखा है वो शायद ,अन्य किसी ने नहीं। ----पिताजी का स्थानान्तरण सुदूर उत्तराखंड में भटवाड़ी में जब हुआ तो १८ किलो -मीटर की पैदल यात्रा से ,घोड़ा ,बग्घी ,बैल -गाड़ी  ,और आज संसाधनों का जाल ,तख्ती -कलम दवात से लेकर की -बोर्ड ,प्रकार पेंसिल रूलर से ,कैलकुलेटर से अब लैपटॉप ,,टैबलेट और नजाने क्या -क्या ,चिट्ठी मनिऑडर से अब नेट ,विडियो कौनफ्रैन्सिंग से भी आगे की दुनिया ,नए नए सेटेलाईट और हर क्षेत्र में उच्च  वैज्ञानिक तकनीकि  । विकास, विज्ञान ,ज्ञान ,तकनीक ,पूंजीवाद ,बाजार वाद इस सबमे हमने एक चीज को खो दिया है -----वह है हमारे देश का बचपन ! आज हमारे देश की या यूँ कहें विश्व की सबसे बड़ी समस्या है यह ---खोता बचपन ------जिस ओर हम ध्यान ही नहीं दे पा रहे हैं । विश्व का आज पुराने से मोह भंग होता प्रतीत हो रहा है .........रोमांटिक कैशोर्य भी अब आह्लादित नहीं कर रहा है विश्व को ....और बुद्धिवादी प्रौढ़ता से सब ऊबने लगे हैंसब  ...विश्व शायद अब फिर से सहज उद्दाम  सहजता की ओर जाना चाहता है ...लोक -गीत ,नौटंकी ,खो -खो ,कब्बड्डी ,रामलीला ,गिट्टू ,पिट्ठू -गर्म ,कठपुतली ये सब फिर से रोमांस  पैदा कर रहे हैं ...पर क्या ये संभव है की ये शताब्दी जो एक आँख से अपलक संवेदनहीन होते संस्कारों की क्रूरता और मानवता को तिरोहित होते हुए देखे और दूसरी आँख मूंद -कर शैशत्व में खो जाए ,सहज और निर्मल हो जाये ...आज हर पीढ़ी में यह द्वैत स्वाभाव सहज रूप से व्याप्त है ....अंधी प्रतिद्वंदिता ,अर्थ -उपार्जन की ललक में अनर्थ की परिणिति बचपन से ही महत्वपूर्ण होने की ललक ,रियलिटी- शोज में बच्चों को बाजार वाद की और ढकेलना ,अशोभनीय लिबास पहनाकर टैलेंट- हंट के नाम खेलने की उम्र में  कठिन मेहनत करवा के [फूहड़ नृत्य और गाने गवा कर ],बाल मन को फूहड़ता की और ले जाना -अति महत्वाकांक्षी और अदूरदर्शी माता -पिता का पहला कर्तव्य बन गया है। ....वे बच्चों की संवेदनाओ और मासूमियत को विध्वंस के कगार पे पहुंचाने के अपराधी हैं ....बच्चों के शोज़ को बालपन की वेश -भूषा उर्ज्वसित ,उल्लसित करने वाले गीतों और कार्यक्रमों के माध्यम से भी प्रदर्शित किया जा सकता है ...पर नहीं छोटी- छोटीबचियों और बच्चों को शीला की जवानी और दारु देसी जैसे गीतों पे नौटंकी करने को मजबूर किया जाता है ,एक से एक अदूरदर्शी बेदिमाग लोग जब उन्हें जज करते हैं तो माँ -बाप अपने को धन्य समझते हैं ..........
              समस्या सुरसा के मुहँ की तरह बढती जा रही है ..तमाम समाजशास्त्रियों और दार्शनिकों की चेतावनियों के बाद भी कोई समाधान नहीं दिख रहा है .....बाजार की निरंकुशता को व्यवस्था और समाज ने खुली छूट दे दी है ....एकल परिवारों के बच्चों को दादा -दादी ,नाना -नानी ,या और रिश्तों कोई सरोकार नहीं है ,उन्हें अपनी बाइक ,मोबाइल ,और कम्प्यूटर गेम्स चाहिए ...बुजुर्गों की खांसी से उन्हें वितृष्णा होती है ,नींद में खलल होता है ...चारों तरफ फैले ग्लैमर ,कोचिंग -क्लासेस ,गेम -क्लासेस ,म्यूजिक -डांस ,स्विमिंग जैसी असंख्यों क्लासेस ,और इलेक्ट्रोनिक डिवाइसेस की भरमार  में बच्चे कहीं खो गए हैं ...उनके पास अपने लिए ही समय नहीं है ...अपने घर के लिए ही संवेदना नहीं है ...वो प्रकृति को क्या देखेंगे ...कैसे संवेदनशील बनेंगे ...खिलौनों के नाम पर काले ,भूरे ,धूसर ,सलेटी ..मटमैले रंगों के डायनासोर ,स्पाइडर मैन ,मनहूस शक्ल वाले बैट -मैन ,तरह -तरह की बंदूकें?? सुन्दरता जो कोमलता और सहज प्रकृति की चेतना होती है पूरी तरह से लोप हो रही है ,गुडिया भी है तो बदसूरत बार्बीडाल ,,थोड़ी ही देर में बच्चा बिना कार्टून और मोबाइल गेम्स के बोर होने लगता है ..कहने वाले इसे डेवलेपमेंट भी कह सकते हैं ...............शोर- शराबा है ,तीक्ष्ण ज्ञान -विज्ञान है ,तकनीकी है .आगे बढ़ने के अनन्य श्रोत हैं ......पर बचपन में निष्पाप ,उन्मुक्त खिलखिलाहट नहीं है ,भोलापन .खूबसूरती ,समवेदना ----इस बाजारू समय ने बचपन से छीनना शुरू कर दिया है ... शिशु शैशवत्व से विपन्न होटा जा  रहा है इस खोये बचपन को वापिस लाने की जिम्मेदारी किसकी है ?...यदि ये बचपन वापिस न आया तो मनुष्यता खंडित  हो जायेगी और दोष हमारी पीढ़ी पर ही होगा .... विश्व एक आँख को बंद करके जिस रोमांस को महसूस करके रोमांचित हो रहा है उसे हम अपने बच्चों को दें , ये दायित्व हमारा ही है  ...बचपन को बचपन लौटाना ही होगा ........................इति शुभम .....

Saturday, 6 July 2013

manv kaa lalach ..prakriti kaa vinash

कितना है बदनसीब जफर , दफ्न के लिए ..
दो गज जमीन भी न मिली कूये यार में ....
...........................मुगलिया सल्तनत का बादशाह ,जो हिंदुस्तान की सरजमीं का सर-परस्त था ,कैसी हकीकत बयाँ कर गया --------------------असल में यही हकीकत है ,यही सच्चाई है .........ये जमीन कब किसी अपनी हुई ,जिसपे हम पुरखों की थाती ,पूर्वजों की कमाई मान के कुंडली मार के बैठ जाते हैं और अपना जन्म सिद्ध अधिकार मान के, अपनी संतति के लिए लड़ाई -झगड़े की नीव रख देते हैं ---वो कब हमें बेदखल करदे ये उस को ही मालूम है ....बड़े -२ राजा -महाराजा ,अवतार ,धनिक ,वणिक सबने अपने और अपनी संततियों के सुरक्षित भविष्य के लिए बड़े -२ महल- दुमहले बनवाये .अपनी सीमा, जमीन ,घर के लिए लडाइयां ,मुकदमें -----------पर क्या कोई सुनिश्चित कर पाया अपनी जमीन पे अपनी दावेदारी हमेशा के लिए ......क्या हम कह सकते हैं कि आज हम जिस जमीन - मकान के मालिक हैं कल भी ये जगह हमारी ही होगी ? --------------पढ़ के ,सुन के ,देख के और अनुभव कर के भी हम समझना ही नहीं चाहते हैं ----------------हमें घर चाहिए हर शहर में ,एक होटल ,एक अदद दुकान ,शहर -२ में ऑफिस ,और भी न जाने क्या- क्या ...............अपने लालच से सामाजिक पारिस्थितिकी को बिगाड़ने के लिए .........लालच -२ -२ .........क्यूँ अपने लालच के वशीभूत होकर ,या फिर अपने को समाज में बड़ा दिखाने की प्रवृति के कारण हम इस शश्य -श्यामला धरती को कंक्रीट का जंगल बनाने पे आतुर हैं .....जीवन -यापन को जितना चाहिये उससे अधिक -और अधिक -२ ...हम संतुष्ट होना ही नहीं चाहते ....अपने से ऊपर ही देखते हैं और मजे की बात ये की ये प्रतियोगिता या कहें होड़ केवल संसाधनों के लिए ही है ........कार्य -कुशलता ,कर्तव्य -निष्ठा ,ईमानदारी ,और ज्ञान -वर्धन के लिये नहीं है .....................हर कोई सोच रहा है उसकी शर्ट ,मेरी शर्ट से अधिक सफ़ेद क्यूँ ?येन -केन -प्रकारेण हमें संसाधनों से लैस होना है। .प्रकृति का दोहन -दोहन और दोहन .परिणाम जल -जंगल -जमीन -पूरा पर्यावरण प्रदूषित और इंसानी लालच के बोझ तले दबा हुआ ......
...................अब तो हमारी पीढ़ी इस लालच की एक बानगी उत्तराखंड की वादियों में देख चुकी है .....हमने लालच में आकर जहाँ पे भी जमीन दिखी ,रहने खाने और भोग विलास का साजो सामान स्थापित कर लिया .बिना ये जाने की ये नदी का मुहाना है या किनारा ...प्रकृति को अपने लिए ही जान के हम ने निर्णय लिया! १० वर्षों से नदी यहाँ पे नहीं आयी है तो अब क्या आयेगी .....हमारी सरकारों ने भी इसमें हमारा साथ दिया ,क्यूँ ?घपल -चौथ में सरकारी तन्त्र की भी पौ -बारह होती है ..और फिर टैक्स वसूली तो है ही ......नतीजा पहाड़ की सुरम्यवादी वीराने में तबदील हो गयी .........ये जीवन की बहुत बड़ी सच्चाई है की हमें प्रकृति से उतना ही लेना होगा जितना हमें जीवन -यापन को चाहिए ..........कबीर के शब्दों में ..........................
..........................................साईं इतना दीजिये जामे कुटुम्ब समाय ...
..........................................मैं भी भूखा ना रहूँ ,साधु न भूखा जाय .......
.....यही हमारी सनातन संस्कृति है जिसकी वजह से हम प्रकृति का अरबों वर्ष तक संरक्षण कर पाए .....हमें सनातन संस्कृति का पुन:-संस्थापन करना होगा ...तभी हम अपनी संतति को एक स्वस्थ -सुरम्य और आनन्दमयी धरती ,,जो हमारी एक मात्र थाती है सौंप पायेंगे ....................कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें .
.................................................इतनी जगह कहाँ है दिले दाग दार में ...
ये धरती ,ये प्रकृति ये हमारा दिल ही तो है ......इसे अपनी हसरतों की भेंट न चढ़ाएं .....इससे एक प्रेमिका की तरह प्यार करें यही हमारी साधना होनी चाहिए ,,वरना तो ये बात दीगर है की जमीं बेवफा होती है ...और उसकी बेवफाई पे हम ईश्वर और कुदरत को कोसते हैं .............इति शुभम ............आभा .................

Monday, 7 January 2013


 14 महीने हो गये, अजय को गये ,मैं जीने की कोशिश कर रही हूँ ब्रह्म का एक दिन हमारे एक कल्प के बराबर होता है ये सही है शायद वो भी तो अकेला ही होता है श्रधान्जली अजय को.
......................................
गहन अन्धकार ,निशब्द मौन ,हृदय तल में .
शब्द हो रहे हैं तिरोहित सारे ,
शाश्वत मौन ,
शांत ,स्व -सत्ता .
स्वर -हीन संगीत ,
लय -बद्ध शांति ,
विगत की सुहास ,
गहन मौन ,
कोई नहीं है ,
मै भी नही,
रिक्त नहीं हूँ मैं ,,
अलौकिक दिव्यता है ,
अस्तित्वमय मौन है ,
मन में सुवास है ,
जो अन- जानी सी है ,
संगीत का पवाह है ,
निशब्द मौन में ही सुना जा सकता है
एक आलोक जो अनोखा है ,\
शांत चित से ,
अंत:-चक्षुओं से ही देखा जा सकता है ,
मैने चखा है ,
अपने अंतर-जगत का स्वाद ,
परिपूर्ण ,असीम ,शाश्वत .
बस मैं ,सिर्फ मैं ही पहुँच सकती हूँ वहां ,
आहट! तेरे होने की है जहाँ ,
सुवास! हवाओं में तेरे होने की है जहाँ ,
मेरे मौन में है तू ,यही सच है ,
इसे ही जीना है ,
हृदय-तल में मौन स्थापना ,
संगीत-मय मौन ,
गहन मौन ,
लय -बद्ध शांति.
मधुर -स्वर -हीन संगीत
........................................
...............श्रधान्जली अजय को ...
...............आभा ...................

कहां रहेगी चिड़िया

कहां रहेगी चिड़िया ?
आंधी आई जोर-शोर से
डाली टूटी है झकोर से
उड़ा घोंसला बेचारी का
किससे अपनी बात कहेगी
अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी ?
घर में पेड़ कहाँ से लाएँ
कैसे यह घोंसला बनाएँ
कैसे फूटे अंडे जोड़ें
किससे यह सब बात कहेगी
अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी ? 

Friday, 4 January 2013

                   देश का दुर्भाग्य है कि सभ्य मूल्यों के विनाश की अपेक्षा ,,निजी प्रतिष्ठा  और अप्रतिष्ठा को बड़ा खतरा माना  जा रहा है ।
             चाहते क्या हैं नेता, चाहता क्या है मीडिया ?.........................................................................................................................
                  हमारे धर्म का मूल है,ब्रह्मचर्य ,आत्मनियन्त्र् ण ....हम तब तक दूसरों पे शासन नहीं कर सकते !जब तक अपने पर शासन 
                  करना न सीख लें। हम हिंदुस्थानी हैं ऒर हमारी धरती का धर्म हिन्दू ही है ।हिन्दू धर्म केवल  साम्प्रदायिकता या रीतिरिवाज
                  निभाना नहीं है,वह तो व्यक्तित्व का निखार है --जो हम हैं --उससे बेहतर कुछ बनना --जगत के अंतिम रहस्य में भाग लेने 
                 के लिए तैयार होना -- समाज की बेहतरी के लिए हमें धार्मिक होना ही पड़ेगा ।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
                            .........................भय  बिन न होय न प्रीति गुसाई ...................................................................................................
                भय भी आवश्यक है ,--यदि हमारे पूर्वजों ने --पीपल के भूत  का  भय ,बरगद  पे  ईश्वर का भय ,नीम को काटने से पाप लगने
                 का  भय या भिन्न -भिन्न व्रत और तीर्थों को न करने से विनाश का  भय न दिखाया होता तो  ये वृक्ष और ये  प्रकृति  क्या हम
               अपनी संतानों के लिए संरक्षित कर पाते ।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
               हमें धर्म की ओर लौटना ही पड़ेगा ।राज्य धर्म -निरपेक्ष हो ,, लेकिन धार्मिक हो ,,उसका अपना एक धर्म हो ,,जिस भूमि पे वह 
               खड़ा   है ! वहां  के धर्म  का पालन  करे ,और अ न्य धर्म  भी उसके  अंचल  में  ख़ुशी और स्वतंत्रता  से  रहें , शायद  यही  हमारे
               निति- नियंताओं की   धर्मनिरपेक्षता  की अवधारणा भी रही होगी जो प्रकारांत में हिन्दू -धर्म के विरोध में परिभाषित होने लगी,.
              समाज में आई विकृतियों को सुधारने के लिए हमें धार्मिक होना ही पड़ेगा ,आत्मा में आस्था पुन्ह्संस्थापन करना ही पड़ेगा हमारी 
            आर्थिक दीनता ने आज हमें धुनी हुई कपास की तरह बिखरा दिया है ,सच्ची देश भक्ति और अपनी अंतरात्मा का आज आभाव हो
             गया है  ...................स्वामी विवेकानंदजी के शब्दों में ........................''..किसी देश का स्थाई भाव राजनितिक प्रभुत्व होता है ,किसी 
            का आर्थिक वैभव ,किसी का केंद्र -बिंदु कलात्मक अभिव्यक्ति होता है।भारत का मूल तत्व या स्थाई स्वर धर्म है ,हमारे राष्ट्रीय 
            जीवन --संगीत का यही वह स्वर है ,जिसके चारों ओर हमारे गुणों का विकास होगा ।यदि हम किसी अन्य दिशा -राजनितिक 
              या औद्योगिक प्रगति को अपना लक्ष्य बनायेंगे तो वहां भी धर्म की शक्ति से हम सबको अपने गुण -कर्म और स्वभावानुसार अपना 
             मार्ग चुनना होगा .प्रत्येक राष्ट्र को भी चुनना होगा ,हमारा देश यह चुनाव युगों पूर्व कर चूका है ।वह है धर्म का चुनाव--आत्मा में आस्था 
             के मार्ग का चुनाव हमें इस मार्ग से कोई विचलित नहीं करसकता है ।हम अपना स्वभाव कैसे छोड़ सकते हैं "....................................
                       हमें अपने बच्चों को अपनी धार्मिक विशेषताओं से अवगत करवाना ही होगा ।त्याग धृति ,धैर्य ,क्षमा और ब्रह्मचर्य के महत्व का 
            पुनर्संस्थापन हमें अपने घरों से ही करना पड़ेगा ,समाज में कड़े कानून का भय ,और घरों में नैतिक  मूल्यों का कोड़ा अब ये ही दो तरीके हैं
            समाज को सुधार ने के ।व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अवधारणा से तो हमें मुक्त होना ही पड़ेगा ,अन्यथा अंत विध्वंसकारी ही होगा .........
.........................................................................आभा ..............................................................................................................................

Wednesday, 2 January 2013


आज चाँद ने है मुझसे पूछा !जानती हो व्योम के संगीत को तुम ?
शांत ,नीरव तम घिरे उस व्योम के संगीत को सुनने लगी मैं ,
करने आलिंगन धरा का ,व्यथित होकर व्योम रोता ,
तारकों में जगमगाती झिलमिलाहट ! ,अश्रु पूरित नयन उसके ,
मौन नभ में, व्योम के सुनसान घर में ,चिर मिलन के गीत गाते ,,
अश्रु जब नयनों से नभ के ,उस कंटकित से सुख को पाने ,
करने आलिंगन धरा का ,टूट कर चल कर गगन से ,
वेदना बन कर विरह की तरु तृणों वन पुष्प पल्लव में सुशोभित ,
उषा की पहली किरण संग ओस की बूंदों में ढल कर
मधुर कोमल स्पर्श से अंचल धरा का चूमते हैं
रंग प्राची में सुनहरा फ़ैल जाता ,
अरुणिमा कुमकुम से सज कर गीत गाती ,
और शबनमी आंसू जो आये थे गगन से ,
जज्ब हो करके धरा में ,लिख दिया करते हैं! सीने में ! कथा पी के मिलन की
संगीत करुणा से भरा जो व्योम का था ,चेतना बन कर जगाता है उषा को ,
है अनोखा व्योम का संगीत यह तो मौन चेतनता यहाँ देती दिखाई ,
अब तो बस तारों में देखू छवि तुम्हारी ,
औ व्योम के संगीत को सुनने हु आती चाँद से बातें करू ,
मैं ढूंढने लगती हूँ तुम को ,इस जमी से व्योम तक तुम ही देते हो दिखाई ,
............................................... ...........................................तुम ही देते हो दिखाई !!!
,,,,,,,,,,,,,,,,बिछुड़ता कोई नहीं है जज्ब हो जाता है दिल में ,,,,,,,,,,,,,,आभा ..

कैलेंडर के पन्ने बदलते- बदलते साल कब बदल जाता है पता ही नहीं चलता है ।
हर आने वाले वर्ष में शुभ -कामनाओं का आदानप्रदान एक रस्म अदायगी होता है ,
वर्ना सबकुछ तो वाही रहता है । यदि हमारी शुभ -कामनाओं में कुछ दम होता तो क्या 
करोड़ों शुभकामनायें एक नन्ही सी जान को न बचा पातीं मेरे लिए तो व्यक्तिगत रूप से 
पिछले दोनों वर्ष विध्वंस कारी रहे हैं ,फिर भी कहते हैं .............
पत्थर में फूल खिला, दिल को इक ख्वाब मिला,
क्यूँ टूट गये दोनों ,इसका न जवाब मिला ,
जीवन फिर भी जीवन जीने को मचलता है ,,,
ये जीवन है तो चलेगा भी और शुभ की चाहना भी होगी ,क्यूंकि बलिदान ,अवसान उस लहर की तरह है
जो तट पर आकर मिटती है और करुणा की संवाहक बन कर दूसरों को प्रेरणा देती है ।हमें सोचना है की दुःख में डूबे
या अवसान को निर्माणों का द्योतक बना दें , आज जो मशाल समाज में युवाओं ने थामी है वो बुझे ना जलती रहे ,
कोपलों पर गिरी ये आंसुओं की रेख सूखे ना तब तक जब तक शा शक वर्ग का गर्वोनत सर ना झुक जाए ।देश हमारा है ................
चन्द लोग इसे बंधक नहीं बना सकते हैं ,युवा -शक्ति जागी है ,यही आने वाले वर्ष के लिए शुभ सूचना है ,
जहाँ युवा जागते हैं धीरे धीरे नव निर्माण होता ही है ।दुःख के सजल दृगों में ही हम नई मधुर कहानी लिखने की तैयारी कर रहे हैं ,
आशा है सफलता मिलेगी ,पंथ पथरीला है ,पर युवाओं के स्वेद-कण विधुत बन अन्तरिक्ष से बरसेंगे और उनकी चिंगारी भस्म कर देगी
देश के भस्मासुरों को ............................शुभेच्छा और नव निर्माण की शुभ -कामनाओ के साथ .....आप सबका नव वर्ष मंगलमय हो .............आभा ....................।।

करुणा जीवन की उच्चतम घटना 
=======================
बुद्ध के विचारों में ,
करुणा की परिभाषा --
प्रेम और ध्यान का जुड़ना ।।
करुणा और प्रेम जागे तो -
एक राजकुमार बुद्ध बना ।।
बुद्ध का प्रेम -जरूरत नहीं ,
बुद्ध का प्रेम- लालसा नहीं ,
बुद्ध का प्रेम -एक समर्पण .
बुद्ध का प्रेम -एक सहभागिता .
बुद्ध का प्रेम -कोई चाहत नहीं .
बुद्ध का प्रेम -कुछ मांगता नहीं .
बुद्ध का प्रेम -भिखारी नहीं .
बुद्ध का प्रेम एक सम्राट का प्रेम .
प्रेम के बदले कोई मांग नहीं .
प्रेम में केवल देने को तत्पर .
प्रेम देता है ,उसे देने की ख़ुशी है .
प्रेम में बुद्धत्व प्राप्त होना ---
प्रेम में सम्राट बन जाना ,
करुणा का सम्राट ,हृदय सम्राट .
ध्यान और प्रेम से पैदा हुई घटना ---करुणा
करुणा का सागर हिलोरें ले हृदय में .
प्रेम ध्यान करुणा -यानि --
शुद्ध सुवासित जीवन --
चारों ओर सुरभि !मधुर अहसास
तिरोहित अस्तित्व ---
अकारण आनन्दित मन ,
प्रेम ध्यान से निकली करुणा का आनंद .
जो! परिस्थिति जन्य नहीं है ,
जो ! भंग नहीं हो सकता ,
अन्तस् जाग जाता है ,
आत्मा का आत्मा से मिलन .
अस्तित्व परमात्मा बन गया . ....abha..

Wednesday, 7 November 2012

yadon ke jharokhon se

                                 {   दुःख मधु से भरे दो नयन ,पारद झील में मानो राजहंस   }
                                  ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
         नयनों की नीलम सी सुंदर दो झीलें ,
         मधु यादों के मोती तैरा करते इनमे .
               नयनों में नीर भरा जो यह .
               अश्रु नहीं कह सकती इनको ,
               ये तो मानसरोवर मेरे -
               स्वर्णिम यादों के तेरे ,
               राजहंस हैं इनमे तिरते .
        ब्रह्म कमल से  खिल - जाते हैं
        तेरी यादों के सब साये -------
        करुणा की यह नहीं बानगी  ,
        ये अश्रु मेरे आलम्बन हैं .
                 धरोहरें हैं ,कुछ -कुछ हैं सीखें .
                 साथ -साथ जो सुलझाई थीं ,
                 कठिन सरल जीवन की उलझन .
                 जो कुछ तूने सिखलाया था ,
                 वारूं मैं अपनी संतति पे ,
                 मधुसार सी वह स्नेहिल चितवन ।
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,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,आभा ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,यादों के राजहंस




     
                             
            

                                                              

Wednesday, 3 October 2012

Vah Pitaa Hmara Pthprdrshk Brhm-Prem Ras -Dhara Hai

                                                                   {   पिता को समर्पित }
  

अपने जीवन में सब दो पिताओं को बहुत नजदीक से देख ते हैं।एक अपने पिताको और एक अपने बच्चों के पिता को दोनों की जिजीविषा और  कर्मठता ही हमारे परिवार का अधार  होती है। यह कविता मेरे  इन्ही कुछ भावो को प्रकट करती है ........................................................................................................................................
....................................................................................................................................................................
        जीवन के इस महा समर में ,घिर जाते हैं जब हम तम में ,
        राहू -केतु  बन विपदायें दावानल सी दहलाती हैं ,
        कर्मयोगि बन पथ को साधो ,निर्माणों का मार्ग दिखाता है .
        वह पिता हमारा! पथ-प्रदर्शक, ब्रह्म-प्रेम, रस-धाराहै ......................
 माँ के कोमल सुरभित भावों को ,जीवन पथ पर दृढ़ता देता है ,
 अटल विश्वास ,ध्रुव चेतना संग -असी- धारा पे चलना सिखलाता है ,
 अपने विवेक ,मर्यादा  औ अनुपम व्यवहारों से ---------------
 बाधाओं के गिरि शिखरों पर जो, हमको ,चलना सिखलाता है ,
           वह   पिता हमारा पथ-प्रदर्शक ,ब्रह्म-प्रेम ,रस-धारा है ........................
 तोड़ कर श्रृंगों का सीना ,सरिता बन बह जाओ तुम ,
  कोटि दावानलों की लौ में, शलभ बन जल जाओ तुम ,
  दृढ हृदय के सामने यातनायें भी थकेंगी
  जीवन की वैतरणी तरने को -स्थिति -प्रज्ञ बन जाओ तुम ,
कटु प्रहारों को सह कर जो ,दृढ रहना सिखलाता है ,
लक्ष्यपर चलते रहो ,उद्यम का मार्ग दिखाता है ,
       वह  पिता हमारा ,पथ -प्रदर्शक ,ब्रह्म -प्रेम ,रस -धारा है .................
  संतानों के लिये पिता -चिंता-दावानल में जलता है ,
  पर दृढ-प्रतिज्ञ सा धीर- वीर वह,तरुण तपस्वी लगता है ,
  ध्येय-निष्ठा से कर्म-वीर वह ,गरल  पान करता रहता ,
अपमानों या स्नेहों  की कभी नहीं नहीं चिंता करता।
   कर्मयोग के पथिक पिता तुम मुझको सम्बल देते हो
   चल उठ कर फिर शक्ति साधना ,उल्लासों से भर देते हो .
   अनुलेपन सा मधु-स्पर्श तुम्हारा ,नव जीवन भर देता है ,
श्रम-सागर मथने को उधत होऊं ,कर्तव्य दीक्षा  देते हो ,
     वह मुस्कान अनोखी है जो ,शिव का भाव जगाती है .
     मधुर हास्य वह पिता तुम्हारा ,मेरा सम्बल बन जाता है .
              आज मैं नैवेद्य बनकर ,
               श्रधा सुमन की लेखनी ले ,
               दृढ़ता की घंटियां बजाकर ,
               अर्चना के थाल में ,
               दीप पिता की सीखों के जलाये ,
               पद वन्दना करने हूँ आयी ,
               नमन पिता को करने हूँ आई


    





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Monday, 1 October 2012

Buddhaa hogaa teraa baap ...budhaape ki trunaayi

                                                                  {  बुढापे की तरुणाई }
                                                                   ...............................
भ्रर्तहरी जी कह गये वे नर पशू समान ,काव्य कला संगीत का जिन्हें नहीं है ज्ञान .              
जिन्हें नहीं है ज्ञान समझलो उनको ऐसे ,पूंछ -सींग से रहित जानवर होता जैसे .
आज आस पास बिखरे मेरे ऐसे ही कुछ पशु मायावी ,
हास्य रस का घोट गला बुद्धिमानों पर हावी .
इसीलिये हम हो गये आज मंच आसीन ,
हंसें हंसाये व्यंग करें अपने सुर में लीन .
अपने सुर में लीं सुनायें कविता ऐसी ,
चहके महफिल पढने सुनने वाले पीटें  ताली ,
कहें वाह-वाह कवियत्री क्या ही मृदुल ,मोहक ?भाषा वाली .
    तो मेरे बुद्धिमान कद्रदान ,अकलमान दोस्तों ,----
तरुणाई जब बुढापे की तरफ बढती है ,
कैसे-कैसे गुल खिलाती है ;-----------
क्या कहते हैं ?बच्चों को ही जवानी आती है ,
जी नहीं बुढापे भी तरुणाई छाती है .
बुढापे की तरुणाई ,पूरी तरह से खेली -खायी ,
बालों पे आई है चांदी उतर ,
दांत भी छोड़ रहे हैं साथ ,
चलें चार कदम तो फूलती है साँस ,
रह -रह कर उठता है दिल में दर्द .....
    शायद बूढा लगा है होने तन !!!तो क्या गम ???
मन में तो मेरे आज भी उठती है उमंग .
रूपसी कन्या हो या हो प्रौढा युवती ,
देख मन में आज भी हिलोरें उठती ,.
नाचने लगताहै मन का मोर ,मन गुनगुनाये ,
आज फिर जीने की तमन्ना है ,
मधुबन में राधिका नाचिरे ...
    अक्ल से लबालब है बुद्धिमान बुजुर्ग ,
पर क्या नाजुक मिजाज इश्क उठा पायेगा --
                    अक्ल का बोझ ?
60 साल के बूढ़े पर छाया कैसा रंग ,
मन में कैसी उठ रही तरुणाई की उमंग ,
जब अगल -बगल हों सुमुखि -सयानी ,नाजुक मुग्धा ,
छोड़ इन्हें कैसे कर लूँ मैं भज -गोविंदा .
नहीं -नहीं अभी नहीं अभी उम्र नहीं है होई ????
अब तो आई अक्ल है इश्क करन की मोहि .
आगे पीछे अब रहे मृग-नयनियों का अम्बार ,
गयी जवानी अब चढ़ा बुढउ को इश्क बुखार .
   जवानी में जो झिझकती थी हमसे ,---
अब तो वह भी करें ठिठोली ,,,,,,,
मन करता है इश्क से भरलू अपनी झोली ,
बूढा और बच्चा एक सा होता है लल्ला ,
बुढापे में अक्ल का हो जाता दिवाला .
बूढा जब सठियाय समझले यही समय है ,
इश्क के लिये बची बस कुछ ही उम्र है ,
उम्र रह गयी थोड़ी अब तो जोश दिखा दे ,
गयी जवानी को समेट ले चंग बजादे .
   देख किसी मुग्धा को जब तार दिल के झन्नायें ,
तुझे छूट  है जाकर तू उससे गपियाले
करते हुये तारीफ़ उससे हाथ मिलाले
अपनी नीरस जिन्दगी का रोना यदि तू रोय ,
खुद ही बात करेगी वो बेचारा जान के तोय .
तू छक के कर रसपान आखों से प्यारे ,
इससे ज्यादा आयेगा ना कुछ हाथ तुम्हारे .
यदि दिल आया कमसिन पर तो बेटी उसे बनाले ,
जन्म दिन पे गिफ्ट दे फिर घर में उसे बुलाले .
            श्रीमतीजी को साथ देख कर फंस जायेगी बेचारी ,
फिर तो सरे  आम तू उस को गले लगाले .
हैप्पी -बर्थ डे कह कर उसकी पप्पी ले प्यारे .
मन में ग्लानी भाव न तेरे आने पाये ,
इसके लिये हम तुम्हें बतायें एक उपाय,
अपनी सभ्यता संस्कृति को तू याद किये जा
पौराणिक आख्यानो में ऐसे प्रसंग हैं आये ,
तू शिक्षक है इसका तू अफ़सोस न करना ,
याद कर अपने अतीत को कभी न डरना ,
यह कमबख्त उम्र ही कुछ ऐसी होती है ,
बड़े-बड़े ज्ञानी को विज्ञानी कर देती है .
नारद -मुनी की घटना याद है ना तुझको ,
विश्व-मोहिनी के सौन्दर्य में जो वो ना आते ,
ना होते राम न हम रामायण गाते ,
ऋषि पराशर जो न केवट कन्या को पाते
तो कैसे वीत- वैराग्य के गीत बनाते
विश्वामित्र जैसे तपस्वी भी देख रह गये दंग ,
ऐसी रूपसी मेनका तुझमे भी जगाये तरंग .
जो जागी है तरंग तो क्या है बुराई ,
संस्कृति का पोषक है तू इसे अपनाले भाई .
और यदि होना चाहता है फेमस तू भइया
मटुकनाथ जुली से ले गुरु मन्त्र ता -ता थैया ..
इस कलयुग के तो वही विश्वामित्र मेनका ,
मचा दिया दोनों ने मगध यूनिवर्सिटी में तहलका .
तरह- तरह की एस-एम-एस, ई -मेल्स बूढों को आयें ,
रूपवान कमसिन कन्याएं एम,एम एस .भिजवायें ,
तरुण युवक सब यूनिवर्सिटी छोड़ कर भागे ,
बूढ़े ही बूढ़े रह गये अब क्या आगे .
और आज इस बूढों के दिन पे ,
घरवाली ने दी है सब को छूट
अपनी ढलती तरुणाई को 'फुल टाइम कर लो यूस
क्यूंकि ............................................
खूँटे की गाय है ,खूंटे पर ही आय ,
सुबह  दोपहर कहीं रहे सांझ घर में ही रम्भाय .
युवा जनों को प्रवचन अब न तुम पिलाओ ,
बूढों की बुद्धि भी शुद्धि ना करवाओ .
जीवन का संधि काल है इसका पर्व मनाओ।।।।।।
.......................................................................आभा


      ....................................................................................
.............................................................................................जूली मटुकनाथ के काल की एक कविता जो मैने आइ .आइ टी  रूडकी में संस्कृति लेडीस क्लब के मंच से पढ़ी थी।.आज सीनियर सिटीजन दे पर उन्हें अर्पित शायद कुछ हंसा सके।

काका से प्रेरणा लेकर




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Wednesday, 19 September 2012

                                                                 {  निशब्द मौन }
                                                                ..............................
मौन को सुनने लगी मैं ,
  निशब्द मौन हृदय तल में ,
  शान्ति नैसर्गिक -सरलता ,
  शिव -शाश्वत परम -पावन .
स्व-विहीन सत्ता यहाँ पर .
स्वरहीन है संगीत -मधुरम ,इक
लय-बद्ध शांति-गान सुंदर .
ध्वनि तिरोहित हो चली हैं ,
गहन मौन! गहनतम है ,
कोई नहीं ,मैं भी नहीं हूँ ,
पर रिक्त सा कुछ भी नहीं है
मौन है अस्तित्व-मय यह ,
ईश्वरीय सुवास है अब ,
है प्रवाह संगीत का इक ,
अनजान सा  मृदु- मधुर कोमल,
गहरा रही है शांति अनुपम ,
सुवास जो अनजान सी है ,
पहचान सी मेरी है इससे ,
जानती सदियों से हूँ मैं ,
इस गंध को ,संगीत को मैं ,
आलोक है इक अनोखा ,
मैं उतरने सी लगी हूँ ,
और गहरे में हृदय के ,
मैंने है चखा स्वाद अपने ,
अंतर-जगत का हृदय-तल का ,
अन्तश-चक्षुओं से है देखा ,
हृदय-तल का दृश्य अनुपम ,
है मनोरम -परिपूर्ण है यह ,
शाश्वत-है असीम है यह ,
मौन है बस मौन है यह ,
बस यहाँ मैं ही हूँ ,मैं बस ,
लय -बद्ध शान्ति स्वरहीन सरगम ,
मौन मेरे हृदय का ,
आज मुखरित हो रहा है ...आज मुखरित हो रहा है ......
..........................................................................
...............................आभा ......................................






 

Friday, 24 August 2012

s.apnon kae upvn me jb bhi main tum sae milnae aati hun ..

                                                    ( हर क्षण सपना सपने में बस तुम )
सपनों के उपवन में जब भी मैं तुमसे मिलती हूँ ,
हर किसलय के अधरों की आभा सी बन कर खिलती हूँ .
जीवन के मरु ,नंदन कानन में ,याद तुम्हें जब करती हूँ ,
मैं रोती नहीं !........वारती ......मानस ...............मोती हूँ
..................................................................................
जब उपवन में दिख जाता है कोई काँटा ,
दुःख दर्द विरह की कसक और बढ़ जाती है ,
तब चुपके से आकर कानों में कह जाते तुम !
मेरे प्रांतर में क्यूँ कांटे ही देखूं मैं ?
हर डाली मैं मुस्कान तुम्हारी आली है ,
हर क्यारी में पद- चिन्ह तुम्हारे दिखते हैं ,
शीतल शबनम की बूंदें प्यास जगाती हैं .
सपनों में सरिता की लचकीली लहरें ,
मन उपवन के अरमानों को डस जाती हैं .
पर शांत किन्तु गंभीर वह नि:स्वन तेरा ,
भ्रमरों सा गुंजित होता है रंध्रों में मेरे ,
मैं बन कर कली हवा में इठला जाती हूँ ,
उपवन में खिलती और झूमती जाती हूँ .
जो पौध कीचकों  की रोपी थी संग तेरे ,
उन क्वणित कीचकों के सुर में आनंद पाती हूँ .
अनियंत्रित भावों से हृदय निनादित होता है ,
सपनों के उपवन में जब भी मैं तुमसे मिलती हूँ ,
दृग युगल सींचने लगते हैं उस उपवन को ,
अवसादों के झरते फूलों की माला पहने ,
वेदना विदग्ध सपनों को मैं समझाती हूँ -----------
मेरा प्रेम नहीं सम्मोहन की हाला --
मेरा प्रेम नहीं विरह ,कटु -रस का प्याला ,
मैं बढती जाती हूँ नभ की ऊँची चोटी पर ,
औ व्यथित चित्त को बोध युक्त कर पाती हूँ .
मैने व्यथित हो जान लिया ,
विरहा में जल ज्ञान लिया ,
तन -मन का वह पावन नाता ,
वह अंतिम सच पहचान लिया .
मैने आहुती बन कर देखा ,
यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है .
मिलने के पल दो चार यहाँ ,
तप यज्ञ कल्प तक चलता ह.
सपनों के उपवन में मैं जब भी तुमसे मिलती हूँ ,
हर किसलय के अधरों की आभा सी बन कर खिलती हूँ ..
...................................................................................
.....................................................................................आभा ... यादों के झुरमुट से .......................................................................................................................................................................................


 

Thursday, 23 August 2012

                                                (  मैं हरी घास हूँ )

                  घास हूँ मैं ,
                  नहीं कुछ ख़ास हूँ मैं .
                  रौंदते प्रात: मुझे तुम ,
                  ताजगी देती तुम्हें मैं .
                  और हरियाली ये मेरी ,
                  चेतना देती तुम्हें .
                  काट देते हो मुझे तुम ,
                  रौंदते रहते मुझे ,
                  शून्य सब संवेदनायें ,
                  ना कोई अहसास तुमको .
                  पर यदि मैं जी गयी ,
                  मैदान के कोने कहीं ,
                  निरख जाती और खिलती ,
                  सुंदर भी क्या लगती हूँ मैं .?-------------------------------आभा -------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

Wednesday, 22 August 2012

ek thaa bachpan mera bachpan

                                                       मेरा बचपन
                    इक था बचपन मेरा बचपन ,
                    सरल सुकोमल निश्छल मादक .
                    नव कोमल सृजन के अंकुर ,
                    सुंदर भावों से परिपूरित .
स्वच्छ व्योम से निश्छल मन में ,
उमड़ -घुमड़ बादल से सपने ,
इंद्र धनुषी रंगों वाले ,
मृग छौनों के संगों वाले .
                     पल -पल बनते और बिखरते ,            
                     नित्य नये आकार वो धरते .
                     पंखों से भी कोमल -कोमल ,
                     हिम फाहों से सजते सपने .
छूलूं मैं ये गगन उछल कर ,
पार करूँ अंबुद तैर कर .
नीड़ बना लूँ शिखरों पर मैं ,
औ बारिश में आग जलाऊं .
                        बचपन भी क्या बचपन था वह ,
                        सारा जगत पाँव के नीचे .
                        आंगन में खेला करते थे ,
                        कितने सच्चे निश्छल बच्चे .
पर जग को जब मैने अपनाया ,
बचपन गया जगत को पाया .
मधुर सुकोमल सपने सारे ,
खो गये कहीं दूर हमारे .
                           बौर आम पर जब भी देखे
                           मन हर्षाया -----------------
                           चलो आम का सीजन आया .
                           इंद्र-धनुष जब बना गगन में ,
                           सोचा बारिश अच्छी होगी .
पार करें यदि अंबुद को तो ,
धन का प्रश्न सामने आया .
पर्वत शिखरों पर चढ़ने को ,
बुकिंग कराने जाना होगा .
बारिशें पीने पर हमको ,
वाइरल से पछताना होगा .
                              काश आज मन बचपन होता,
                              निश्छल होता चंचल होता .
                              नव कोमल सृजन के अंकुर
                              सुंदर भावों से परिपूरित .
जीवन की संध्या बेला में ,
जब यादों में खो जाती हूँ ,
देख-देख बच्चों को अपने ,
अपना बचपन दोहराती हूँ
                                  बचपन तो अब भी बचपन है ,
                                  मैं ही उसको छोड़ चुकी थी ,
                                  विगत स्मृतियों के झूलों में ,
                                  मन मेरा अब भी बचपन है .
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