Showing posts with label shradhanjli by ABHA. Show all posts
Showing posts with label shradhanjli by ABHA. Show all posts

Sunday, 27 January 2013

                                     [गीतों के बीज ]
                                   ..........................
      मन की बगिया में ,गीतों के बीजों को बो दूँ तो ,
       रंग रंगीले भावों के कितने अंकुर उग आयेंगे 
      शिशु की मानिंद झूम ख़ुशी में मन गुन -गुन बहलायेगा 
     तरह तरह के भावों में रंग भर तितली बन पंख पसारेगा .
     मन की बगिया में ,गीतों के बीजों को बो दूँ तो ,
     पंथ रंगीला हो जाएगा ,सुर से सुर ,,मिल जाएगा 
     मन बगिया बन जायेगी ख़्वाब - गाह हर पाखी की ,
     नखत उतर सब आयेंगे जीवन की इस बगिया में ,
     अंजुरी भर गीतों के बीजों की मन बगिया में बो दूँ मैं ,
     अंकुर आने की आशा में फिर हर दिन बगिया में घूमूं मैं .........
Add caption



....................................................आभा ...............................

Monday, 7 January 2013


संवेदनाओं के स्वरों का अर्थ क्या है ? जानती हूँ जग मैंतुझे पहचानती हूँ .
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी
मरुभूमि है डगर मेरी,कब तलक है उसपे चलना ?
साथ कोई दे न सकता ,हर पथिक उस पर अकेला .
रज कणों की तपन को पावों नेअब अपनालिया है ,
मोम की गुडिया थी जो पत्थर की मूरत हो गयी है .
दुःख तो बस मेरा अकेला ,क्यों किसी को मैं दिखाऊँ ?
जानती हूँ भेद यह मैं ,संवेदना जो है दिखाता!
मैं वेदना से मुक्त हूँ इस ख़ुशी को निज में छिपाता
में सुखी हूँ तू दुखी है ,
यह दर्द चेहरे पे झलकता है तुम्हारे
क्याकरूँ संवेदना लेकर तुम्हारी
संवेदनाओं के स्वरों का अर्थ क्या है जानती हूँ
जग मैंतुझे पहचानती हूँ ------------

abha

 14 महीने हो गये, अजय को गये ,मैं जीने की कोशिश कर रही हूँ ब्रह्म का एक दिन हमारे एक कल्प के बराबर होता है ये सही है शायद वो भी तो अकेला ही होता है श्रधान्जली अजय को.
......................................
गहन अन्धकार ,निशब्द मौन ,हृदय तल में .
शब्द हो रहे हैं तिरोहित सारे ,
शाश्वत मौन ,
शांत ,स्व -सत्ता .
स्वर -हीन संगीत ,
लय -बद्ध शांति ,
विगत की सुहास ,
गहन मौन ,
कोई नहीं है ,
मै भी नही,
रिक्त नहीं हूँ मैं ,,
अलौकिक दिव्यता है ,
अस्तित्वमय मौन है ,
मन में सुवास है ,
जो अन- जानी सी है ,
संगीत का पवाह है ,
निशब्द मौन में ही सुना जा सकता है
एक आलोक जो अनोखा है ,\
शांत चित से ,
अंत:-चक्षुओं से ही देखा जा सकता है ,
मैने चखा है ,
अपने अंतर-जगत का स्वाद ,
परिपूर्ण ,असीम ,शाश्वत .
बस मैं ,सिर्फ मैं ही पहुँच सकती हूँ वहां ,
आहट! तेरे होने की है जहाँ ,
सुवास! हवाओं में तेरे होने की है जहाँ ,
मेरे मौन में है तू ,यही सच है ,
इसे ही जीना है ,
हृदय-तल में मौन स्थापना ,
संगीत-मय मौन ,
गहन मौन ,
लय -बद्ध शांति.
मधुर -स्वर -हीन संगीत
........................................
...............श्रधान्जली अजय को ...
...............आभा ...................

Wednesday, 2 January 2013


आज चाँद ने है मुझसे पूछा !जानती हो व्योम के संगीत को तुम ?
शांत ,नीरव तम घिरे उस व्योम के संगीत को सुनने लगी मैं ,
करने आलिंगन धरा का ,व्यथित होकर व्योम रोता ,
तारकों में जगमगाती झिलमिलाहट ! ,अश्रु पूरित नयन उसके ,
मौन नभ में, व्योम के सुनसान घर में ,चिर मिलन के गीत गाते ,,
अश्रु जब नयनों से नभ के ,उस कंटकित से सुख को पाने ,
करने आलिंगन धरा का ,टूट कर चल कर गगन से ,
वेदना बन कर विरह की तरु तृणों वन पुष्प पल्लव में सुशोभित ,
उषा की पहली किरण संग ओस की बूंदों में ढल कर
मधुर कोमल स्पर्श से अंचल धरा का चूमते हैं
रंग प्राची में सुनहरा फ़ैल जाता ,
अरुणिमा कुमकुम से सज कर गीत गाती ,
और शबनमी आंसू जो आये थे गगन से ,
जज्ब हो करके धरा में ,लिख दिया करते हैं! सीने में ! कथा पी के मिलन की
संगीत करुणा से भरा जो व्योम का था ,चेतना बन कर जगाता है उषा को ,
है अनोखा व्योम का संगीत यह तो मौन चेतनता यहाँ देती दिखाई ,
अब तो बस तारों में देखू छवि तुम्हारी ,
औ व्योम के संगीत को सुनने हु आती चाँद से बातें करू ,
मैं ढूंढने लगती हूँ तुम को ,इस जमी से व्योम तक तुम ही देते हो दिखाई ,
............................................... ...........................................तुम ही देते हो दिखाई !!!
,,,,,,,,,,,,,,,,बिछुड़ता कोई नहीं है जज्ब हो जाता है दिल में ,,,,,,,,,,,,,,आभा ..

Thursday, 25 October 2012

                        {  आज 11 महीने हो गए हैं अजय। लगता है अभी कहीं से सामने आ जाओग।  }
                         ....................................................................................................................
   कल तक साथ चली मैं जिसके ,आज वही है इक सपना .
   ये सपना ही संबल मेरा है , मेरे जीवन की अभिलाषा है   .
   सपनों का मोल भाव न होता ,सुख -दुःख में न तोले जाते   हैं .
   धरती में ज्यों पावन गंगा ,नयन- व्योम में ये मधु -रस हैं .
   गंगा की लचकीली लहरों में ,तिरते सपनों को देख रही मैं ,
   कुछ धवल कुछ नारंगी सा-रोमांचित करता प्रकाश वह ,
   स्वर्णिम रेशम सी किरणों संग नीलम से नील व्योम सेआकर
   गंगा की लहरों पर पड़ता ,झिलमिल स्वर्ण रजत सा मोहक --
   लहरों को ज्यों पहनाया हो ,इंगूरी स्वर्णिम आभूषण .
   स्वर्णिम लहंगा पहने लहरें -यूं इठलाती गोता खाती ,
   ज्यूँ नखरीली दुल्हन कोई -पी के आने की आहट पाती .
  क्या ही स्वर्णिम दृश्य बना है ,झिलमिल लहरें जगमग-जगमग .
   कितने रूप -कितने रंगों में -लहरों पर जब पडती किरणे ,
   रोम-रोम पुलकित होता है -सपनीली दुनियां ही है यह ,
    आज साँझ की इस बेला में -भुवन-भास्कर क्रोधित से हैं ,
    कुमकुम रंगीं स्वर्णिम किरणे जन-जन को अकुलाती हैं .
   पर जब गंगा की लहरों पर आतप ,स्वर्णिम रेशम निर्झर सा झरता ,
   ऊष्मा उस भुवन -भास्कर की पल में शीतल हो जाती है .
    गंगा की लहर- लहरपर छवि मैंने अपनी देखी है ,
    लहर -लहर में छवि पडती है ,हर-एक लहर में बिखर जाती है .
   पर गहरे पानी में देखी ,स्थिर छवि वहीँ खड़ी है !,
   गति विराम हों एक जगह गंगा की धारा में मैंने देखा ,
   जीवन के दो सपने ऊष्मा और शीतलता संग संग ,
   गति विराम हों एक ही तल परगंगा में ही सच होते हैं
   समाधिस्थ सी यह गंगा सदियों से यूँ ही बहती है ,
    तुम ही मेरी सिद्धि बनों माँ ,तुम जैसी ही मैं बन जाऊं ,
   गति-विराम परस्पर जी लूँ प्रेम पगा हो मेरा जीवन ,
   साधक बन कर रहूँ जगत में ,मुझे नहीं विश्राम चाहिए ,
   गतिशीलता निरन्तरता ,इस जीवन का प्रवाह चाहिए .
   गति ही मेरा मानदंड हो ,पथ ही लक्ष्य रहे मेरा
   मेरे नयनों के सपनों को तेरा ही वरदान मिले .
   सूरज के आतप की शीतलता का दान मिले ,
   मेरे जीवन की आभा को ,तेरा अमृत -गान मिले
   सुर संगीत मिले लहरों सा ,गति हो लहरों सी चंचल .
  मन की गहराई में प्रियतम की स्थिर छवि का अभिमान मिले .
  स्वप्न अजय हो मेरा लहर -लहर में छवि वही
   ज्वालाओं के पार खड़ा जो तू उस पथ की खेवनहार बने ,
   एक यही जीवन अभिलाषा पथ ही मेरा लक्ष्य बने .........................
...........................................................................................
  कितना आसाँ है कहना भूल जाओ ,
  कितना मुश्किल है पर भूल जाना .................................................
........................................................................श्रधान्जली अजय ............आभा


 












Tuesday, 17 July 2012

Shradhanjali....

आराधन को प्रिय तेरे !-------
हृदय शूल के अक्षत लायी हूँ .
भावों के चंदन से महका कर !-----
मैं तुझे सजाने आयी हूँ .--------

साँसों की डोरी के अगरु जला ,---
सुरभित साँसों से महका कर ,----
दीप जला कर स्नेह सुधा का ,----
अश्रु जल का तेल डाला .----------
अभिषेक तेरा अश्रु जल-कण से ही करने आयी हूँ .
प्रिय तेरे आराधन को मैं हृदय शूल के अक्षत लायी हूँ .
रंग बिरंगे ,हंसते रोते ,
कुछ काँटों और कुछ पराग से ,
चुन-चुन कर स्वप्न सुमन ,
मैं ,भावों की क्यारी से लायी हूँ ,
दो नयन  पुजारी तेरे हैं ,
,देह पुजारन है तेरी ,-----------
उस पैर करुना का शंख बजा ,
आरत हरण को आई हूँ .-----------------------------------
जिन क्षणों में चले गये तुम ,
वे क्षण ही जीवन धन हैं मेरे ,
सुमधुर यादों की माला ही ,
अर्चन वंदन को लायी हूँ .
प्रिय तेरे आराधन को में हृदय शूल के  अक्षत लायी हूँ .
भावों के चन्दन से महकाकर मै तुझे सजाने आयी हूँ .----------------

सब के लिए अमावस की रात काली होती है ,मेरे लिये अमावस की सुबह काली है जो अजय को मुझ से छीन ले गयी 
मेरी और बच्चों की श्रधान्जली अजय को.--------------------------आभा ------------


जिन