Thursday, 22 May 2014

'' आज बैठे ठाले का फितूर -बेमतलब की बकवास                नहीं गीता से स्नेह लेने की इच्छा ''
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"गिरते हैं जब खयाल तो गिरता है आदमी ,जिसने इसे संभाला वो ही संभल गया " | और आदमी को संभालने के लिए गीता से इतर और कुछ हो सकता है क्या ? गीता कथाओं का ग्रन्थ नहीं है ये तो चिंतन है ,दर्पण में अपने को देखने की प्रक्रिया | ये माँ गंगा की भांति पतित पावनी -"कृष्ण कृपा संजीवनी " है |
कृष्ण अपने कई रूपों में ,जीवन के हर  पल और हर कर्म के लिए हमारे साथ हैं पुत्र से धर्म-प्रवर्तक   समाज-सुधारक तक | श्रृंगाररस  के संयोग वियोग दोनों पक्षों में  पूरा जीवन समाहित है और वहां प्रत्येक स्थान पे कृष्ण मौजूद हैं हमारे साथ | गीता के  स्पर्श  मात्र से ही कान्हा  की समीपता का अहसास होता है -हर श्लोक माँ के सामान बच्चे की ऊँगली थाम के जीवन की कठिनाइयों से पार ले जाता सा प्रतीत होता है |
तनाव से बाहर निकलने को ,अशांति को शांत करने को ,गीता को पढना ,समझना और जीना ही एक मात्र साधन है |  दूसरे अध्याय का ४८ श्लोक -----
   योगस्थ: कुरू कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय |
   सिद्धयसिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ||_____से यदि दिन का प्रारम्भ हो इसे  प्रात:काल पढ़ के जीवन में उतारा जाय तो मजबूत दिनचर्या का मांगलिक आधार बन जाएगा एक प्रबोधात्मक प्रेरणा ,पुरुषार्थ के प्रति जागरूकता ,जहाँ योग शब्द को प्रभु ने मन की समता से जोड़ा है ,कर्म  के अहंकार से दूर ,कृपा भाव से कर्म  , मैं इस कर्म को या कर्म से क्या दे सकता हूँ न कि मुझे क्या मिलेगा |यही गीता की दिव्यता है जो भी कर्म कुशलता और निष्ठा से किया जा रहा है  वो योग है तुझे कर्म के कर्तव्य की दृष्टि हो देने वाला तो मैं हूँ | सुबह सवेरे अपने कर्मों को प्रारम्भ करने से पहले का श्लोक --फिर किसी भी गलती की सम्भावना ही नहीं |
 भोजन से पहले का श्लोक ____यज्ञशिष्टशिनसंतो मुच्यन्ते सर्व किल्बिषे |
        अध्याय ३ का १३ _______  भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पच्न्त्यात्मकारणात् ||
                                                                      और
       अध्याय ४ का २४ -_______ब्रह्मार्पणम् ब्रह्म ह्यविरब्रह्माग्नो  ब्रह्मणा हुतं |
                                                 ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं  ब्रह्मकर्म समाधिना     ||______और अधिक नहीं इन दो श्लोकों को ध्यान करके यदि भोजन का इंतजाम हो और भोजन किया जाए तो कोई भी भूखा न रहे | कोमल कन्हैया कठोर वाणी में आदेश देते हैं कि केवल घी और आहुति के होम को ही यज्ञ नहीं कहतेहैं ,यद्यपि ये भी यज्ञहै  अपितु खिला के खाना और परोपकार की भावना ही असली यज्ञहै   ,गो ग्रास , श्वान के लिए ,पक्षी के लिए यहाँ तक किसांप के लिए दूध  भी क्यूंकि वो भी प्रकृति का शोधक तत्व है तेरे निवाले से जाना चाहिए | समत्व भाव ,परोपकार ,प्रकृति संरक्षण और जितना चाहे बस उतना ही लो प्रकृति से -अपरिग्रह ,सब भोजन यज्ञ में ही निहित है | "त्वमेव वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पयेत " आस्था ,श्रधा ,विश्वास ,समर्पण --यदि गोविन्द को समर्पित करके खाओगे तो भक्ष्य ही खाओगे जो तुम्हारे लिए अमृत होगा ,चिन्तन में श्याम सलोना होगा , तो मीरा के विष की तरह हर पदार्थ अमृत हो जाएगा |दुराग्रह की स्थिति नहीं ,चिन्तन की स्थिति यदि केवल भाव बदलने से प्रभाव बदल जाए तो क्या बुराई है ईश्वरी भाव होगा तो विराट उदारता होगी ,शुद्धता होगी और फिर मन और देह का सारा कूड़ा कचरा बह  जाएगा |''आहारौ शुद्धौ सत्य शुद्धि ,जैसा मन वैसा अन्न '', भीतर सात्विक भाव तो आरोग्यता ,तो हुई न गीता भोजन से पहले आचमन करने वाली गंगा | गीता में कार्य स्थल पे जाने से पहले से लेकर दिन भर के कार्यों के विश्लेष्ण तक के सभी श्लोक हैं जो जीवन के लिए मन्त्रों का कार्य करते हैं और निष्काम कर्म,जागरूकता और कर्तव्य निष्ठा से जीवन को  सुगम बनाने का मार्ग प्रशस्त करते है | आवश्यकता है गीता को एक बनिया के बहीखाते ,एक शिक्षक के हाजिरी - रजिस्टर या एक शेयर ब्रोकर के शेयरों की तरह प्रति दिन देखने की |
 और पूरे दिन भर की भाग दौड़ ,आपा-धापी और थकन के बाद रात्रि में बिस्तर पे जाने से पहले कान्हा का दुलार तो देखिये वे कहते हैं ___------
                                                 सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणम् व्रज |
                                                 अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि  मा शुच: ||
कितना दुलार ,कितना लाड करते है कन्हैया ,कोई भी भूल है उसे अपना तनाव न बना तू तो बस मेरी शरण में आजा पगले ,'मा शुच':., मैं देखूंगा तेरे सब पापों को ,५०१५० वर्ष पूर्व कहा गया ये वाक्य किसी मत ,सम्प्रदाय या पन्थ का नहीं है | ये तो उस विराट परमात्मा की एक प्यारी सी ममत्व भरी लाडली वात्सल्यमय पुकार है |वो कह रहा है मेरे लाडले ,दिन भर के क्रिया कलापों में जो तेरे कर्तव्य नहीं थे ,जैसे ईर्ष्या ,राग द्वेष वो भी तूने अपने ऊपर लाद लिए उतार  फेंक इस कलुष को ,मुझ पे विश्वास  कर ,जैसे माँ कीचड़ में सने अपने बच्चे को धो के साफ़ करदेती है वैसे ही मैं भी तुझे अभय देता हूँ तू मेरी ये लाड़ली पुकार तो सुन ! मेरा तो बन !  मेरी शरण तो आ ! यह श्लोक दिव्य  आह्वान  है कान्हा का मानवता के लिए,' मा शुच' की लाडली पुकार ,अज्ञान के आवरण को उतारफेंक और मेरे पास आ ,जहाँ परमात्मा है वहां सत् है शुचिता है ,निर्भयता है और सुमति है
 मेरे जीवन को तो गीता का ही सहारा है ,कृष्ण मेरे प्राण हैं ,उनकी लाडली पुकार मेरे लिए अभय का संकेत है |
गीता निर्भय जीवन की प्रेरणा है ,जिज्ञासू को जागृत करती है ,खंडन नहीं परम्पराओं का प्रतिष्ठापन है सब कुछ भूल के गोविन्द की विराट गोद में विश्राम है |
 गीता हमे स्वयं पे विश्वास और क्षमा दोनों सिखाती है ताकि हमपे ताकत हो ये कहने की कि ____
 जिन्दगी का सफर मैंने यूँ आसां कर लिया ,
कुछ से माफ़ी मांग ली कुछ को माफ़ कर दिया ||आभा ||












Tuesday, 6 May 2014

    " बैठे ठाले का फितूर ,बेमतलब की बकवास "
                      (जिन्दगी की बाराखड़ी)
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बरसों ये सूरज चाँद सितारे जुगनू मेरे साथ जले ,चमके जगमगाये टिमटिमाये , आज भी सबकुछ वैसा ही है प्रकृति  उतनी ही हसीन है ,बस सांझ ढलने  पे अपनी  पोटली बांधने और चलने की तैयारी मैंने शुरू कर दी है | कितना कुछ है इस पोटली में शायद कुछ व्यक्त से अव्यक्त में भी साथ जाए अनन्त की यात्रा में |नदी, पहाड़, झरने ,जंगल, बाग़, बगीचे तितली, फूल, भंवरे, परिंदे और सागर; आज भी मन में वही तरंग जगाते हैं ,ताली बजाके उछलने का मन आज भी होता है कोई पागल समझे तो ये उसकी समझ का दोष है शायद हर उम्र में एक बच्चा तो इन्सान के भीतर रहता ही है जो बंधन में नहीं रहना चाहता है मन के किसी  कोने से  बाहर आने की कोशिश में रहता है और नकारने पे हमें खींच के बचपन की यादों के बागीचे में सैर करने को मजबूर कर देता है |  'ॐ नम: सिद्धम्  ' के साथ स्लेट या पुती हुई तख्ती पे  आड़ी तिरछी रेखायें खींचते हुये कब बच्चा बाराखड़ी और पहाड़ों के फेर में पड़ जाता है उसे पता भी नहीं चलता |और बस यहीं से ९९ के फेर में पड़ने का सिलसिला प्रारम्भ |
   हाँ ! ये जिन्दगी  भी तो बाराखड़ी की तरह ही है ;अ से प्रारम्भ होके सभी स्वरों को साथ लेते हुए व्यंजन और व्यंजनाओं में डूबती उतरती नैया की मानिंद ज्ञ तक का लम्बा रास्ता तय करती है | फुर्सत के क्षणों में चिंतन जब बीते हुए पलों में गोता लगाता है तो सारी यादें ,सारे बीते पल स्वरों और व्यंजनों की तरह उछल-कूद करने लगते हैं मन की कापी के पन्ने पे, कभी सपाट और कभी  करीने से खींची गयी लाइनों पे चलते से -अलग -अलग रंगों की स्याही से लिखी इबारत , हर पल ,हर घटना ,हर मूड का अपना सुलेख ! कहीं  मोती से उकेरे गये अक्षर हैं  मानो मानसरोवर में राजहंस तैर रहे हों और कहीं  लिखाई  आकाश में बिखरे  बादलों की  मानिंद -जहाँ किसी भी अक्षर का कोई आकार ही नहीं है -अपना ही लेख पढना समझना कुछ दिनों बाद मुश्किल |
जिन्दगी की बाराखड़ी के रस्ते में शायद   पूर्ण विराम नहीं है अव्यक्त से व्यक्त और अनन्त की यात्रा कभी प्रकाश तो कभी अंधकार -चरेवेति-चरेवेति एक राह से दूसरी राह एक चोले से दूसरा चोला --
''  वासांसि जीर्णानि यथा विहाय ,नवानि गृह्णाति नरोपराणी '' की निरंतरता | हाँ ! हलन्त् तो हम इसे बना ही लेते हैं ,जहाँ से आगे न बढ़ना हो ,किसी का साथ छोड़ना हो ,कहीं से मोड़ मुड़ना हो तो हलन्त् हमें खूबसूरत अंत सिखाता है ठीक वैसे ही जैसे सृज् धातु से सृष्टि बनी  पर वहां भी अव्यक्त से व्यक्त की यात्रा है, निरंतर;  पूर्ण विराम के स्थान पे हलन्त् ही है और मेरे जीवन को  तो हलन्त् ने ही  पकड़ रखा है ,आधी-अधूरी ख़ुशी ,पूर्ण निष्ठा और समर्पण के पश्चात भी कार्य न होना, सफल असफलताओं का अम्बार , ढेरों पूर्ण विराम थे जीवन के जो मैंने हलन्त् की खूबसूरती के साथ स्वीकार कर लिए ;जीवन का ककहरा सीखते हुए कैसे जिन्दगी कभी मूर्ध्यन्य हो गयी कभी तालव्य की तरह गोल-गोल घूमने लगी पर "ॐ तत्सत् " के साथ अपनाने से  किसी भी परिस्थिति में मिठास कम नहीं हुई |आधे को हलन्त् की खूबसूरती देके पूरे का अहसास और फिर चल पड़ना  दूसरी राह् ठीक वैसे ही जैसे अनजाने में तत्सम -तदभव् शब्दों में य र ल व् श स ष ह के साथ अनुस्वार के स्थान पर चन्द्रबिन्दु का प्रयोग वर्तनी की अशुद्धि है  पर अर्थ स्पष्ट है  | ऐसा नहीं है कि जीवन में हमेशा अनुस्वार की खूबसूरत सी बिंदी या चन्द्रबिन्दु का ताज नहीं रहा  ( माँ होने पे तो ये साथ -साथ ही चलता है ) अपितु असंख्यों बार तो विसर्ग ने  भी जीवन के सुलेख  में जुडके उसे खुबसूरत अर्थ दिया है  पर इसका आभास होने में समय लग गया  | दुःख में विसर्ग : ने जुड़ के उसे कितने सुन्दर शब्द में ढाल दिया  यदि दुःख में विसर्ग न होता तो दुख नग्नता का आभास देता | ये विसर्ग यदि समझ में आ जाए तो दुःख के पल सिमट जाते हैं मन के किसी कोने में विसर्ग की खुबसूरती लिए हुए वरना तो अनुस्वार कब खिसक के नीचे आ जाए और नुक्ता . बनके तालव्य को गले में जाने को मजबूर कर दे भान ही न हो |
  बच्चे को बाराखड़ी और वो भी ॐ नम: सिद्धम्  के साथ सिखाना ,सुलेख लिखना ,स्लेट पे बाराखड़ी लिखना फिर मिटाना फिर लिखना ,फिर तख्ती पे अभ्यास वो भी तख्ती की रंगाई पूताई के साथ फिर कलम की कत बना के सुंदर अक्षरों को उकेरने की प्रेरणा शायद जीवन  रूपी रंगमंच की घटनाओं का रिहर्सल ही होता है |संयम ,,धैर्य ख़ुशी ,खोना- पाना ,दुःख -सुख सारे रसों से बालपन में ही परिचय ताकि सनद रहे |
यूँ ही बैठे ठाले अ से ज्ञ तक घूम आयी और एक बार बाराखड़ी फिर से लिख ली फिर से तख्ती पोती ,कलम में कत बनाई ,होल्डर की निब घिसी और सुलेख के बाद अब बाग़ में तितली के पीछे क्यूंकि दिल तो बच्चा है जी || ....आभा ...













Wednesday, 30 April 2014

    " रुख हवाओं का जिधर है उधर के हम हैं "
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पतझर के पात को हवा जिधर उड़ा ले चले उधर ही उड़ चलता है | ऐसे ही हवा के संग -संग बह रही हूँ मैं भी, देखने ; क्या सच में सबै भूमि गोपाल की ही है और तामे वही समाय का अहसास होता है या ?
    पहली बार इंटरनेशनल फ्लाईट पे अकेले जाना ,मेरे सिवा सब ही हल्की सी चिंता में थे |बच्चे भाई बहन सब ही सिखा पढ़ा रहे थे |ये तैयारी वो तैयारी पर मैं तो कान्हा के भरोसे हूँ सो निश्चिंत थी ,जो वो करवा रहा है सब ठीक ही होगा हम सोच के भी क्या कर लेंगे ,जिस राह पे जिस मोड़ पे चलने का इशारा कर देता है चल देती हूँ |
मेरी तरह की ही कई प्रौढ़ायें  भी थी एयर-पोर्ट में |अधिकतर के घरवालों ने उन्हें व्हील चेयर पे बैठा दिया था ताकि सफ़र में मदद मिलती रहे | कई पति-पत्नी पहली बार जा रहे थे उम्र के अंतिम पड़ाव में अपना देश छोड़ना और भाषा न समझ आना , उनके असमंजस का अनुमान उन्हें देख के ही लगाया जा सकता है |भाग-दौड़ तो है ही एयर-पोर्ट में चौक्कना रहना और सारे एनाउन्समेंट को सुनना तो पड़ता ही है ,पर साथ ही कुछ ऐसे सहयात्री भी है जो काफी डरे हुए हैं उन्हें भी हौसला देना और समझाना ---हालाँकि घर से सख्त हिदायत थी कि हर किसी से मत बोलना पर हम भी आदत से लाचार हैं लाख दिल को मारतेहैं ओंठ दबाते हैं मगर किसी को असमंजस में देख के मुहं खुल ही जाता है उसे सही रास्ता बताने के लिए वो कहते हैं  न --
  '' हर चंद अपने शौक को रोका किया वेले -
    एक आध हर्फ प्यार का मुहं से निकल ही गया  |''
शायद न समझने वालों को समझाना मेरे चारों ओर सकारात्मक घेरा सा बना रहा था | (खैर हर कोई इसे ना अपनाये क्यूंकि न जाने किस भेष में बाबा मिल जाए नटवरलाल रे -ये कलयुग है मेरे भाई ) | और लो सेक्युरिटी चेक के दूसरे राउंड में मशीन खराब हो गयी ( ओ डार्लिंग ये है इण्डिया ) तीन-तीन  बार खूबसूरत बालाओं ने आके हाथ जोड़ के कहा-'' क्षमा चाहते है  मशीन में कुछ खराबी हो गयी है पन्द्रह -बीस मिनट लगेंगे आप तब तक घूम फिर सकते हैं '' | इतनी लम्बी लाइन ,इतनी दूरी तय करके आये हैं अब कौन हिले, हम एक सवा घंटे यूँ ही खड़े रहे ,जैसे -तैसे मन्युअल चेकिंग शुरू हुई और जाने कैसे अफरातफरी का फायदा उठा के  एक-एक व्हील चेयर वाले या वाली के साथ दस -दस लोग चले आये ( जुगाडू तो यहाँ अधिकतर लोग होते ही है और हम चंद लोग जो लाइन में सबसे आगे थे सबसे पीछे हो गये | खैर नो टेंशन की तर्ज में खड़े रहे आखिर प्लेन हमें छोड़ के थोड़े ही उड़ जाएगा --और तब तक मशीन भी ठीक हो गयी |
अपने लिए ही जीने की प्रवृति यदि देखनी हो तो ये जगह और ये समय  बहुत माकूल है |हर व्यक्ति केवल अपने में लीन |बस  मैं चेकइन से निकल जाऊं दुनिया जाए भाड़ में मुझे क्या पड़ी ___'ऊपर से गुड़िया हँसे अंदर पोलमपोल' वाली हालत ,हर हंसी; मशीनी और परेशानहाल |
और लो अचानक पैरों के नीचे से जमीन निकल गयी ! ऊंचाई पे जाने का इससे अच्छा तरीका और क्या हो सकता है -- पन्द्रह घंटे के  सफर के लिए  कुछ किताबें तो रखी ही थी वही तो मेरे जीवन की सच्ची साथी है ,पर कहते हैं जाकी रही भावना जैसी --मेरे साथ की दोनों सीटों पे दो लडकियाँ अपने दो छोटे -छोटे बच्चों के साथ यात्रा कर रहीं थीं | अकेली माँ का दो छोटे-बच्चों के साथ का सफर कितना मुश्किलों भरा होता है बस उन्हें मदद करने में और स्वाध्याय में  समय का भान ही न हुआ | ये भी कान्हा कृपा थी   लग तो  रहा था मैं उनकी  मदद कर रही हूँ पर मुझे भी अपरोक्ष रूप से सफर की दुश्वारियों और उबाऊ पन से निज़ात मिली |सामने स्क्रीन पे नक़्शे पे अपने प्लेन से 9500mi की दूरी पे आते शहर ,नदियाँ, सागर ,खाड़ी पर्वत इत्यादि देखना एक रोमांच ही है ,घंटों आप पानी के ही ऊपर उड़ते है ,जमीन का नाम ही नहीं |और लो पहुँच ही गये निवार्क, फिर कनेक्टिंग फ्लाईट की भागमभाग ,सामान लेना , सिक्युरिटी चेक ,ऐन वक्त पे गेट का चेंज हो जाना ,'ममा कम हियर ,गो दियर , ममा यू स्वीट ,मेक फ़ास्ट ,हैप्पी जरनी ममा | सीक्युरिटी चेक के दौरान ममा यू फिनिश (आपका हो गया ) मैं बोली कनी फूटी कपाली यू  फिनिश बोलणी ,तेरा घिच्चा बल ढुंगा पड्यो ,व्हाट ममा ,मैं बोली ओह आई ऍम ब्लेसिंग यू  हनी !,वो बेचारी खुश | और जमीन कब आ गयी पैरों के नीचे भान ही न हुआ |अनजानी धरती पर , अनजाना जैसा तो कुछ भी नहीं है ,वही धरती ,वही आकाश ,वही हरियाली ,वही बारिश ,वही सूरज --और बिटिया से सालभर बाद मिलने की वही ख़ुशी , उसने एयर-पोर्ट में पैर छुए तो आस-पास के चेहरों पर भी वही ख़ुशी --आर्जुओं की एक दुनियाँ सी बसी है _________
  मौसिमे अब्र है -बादल भी है ,
गुल है -गुलशन भी है -पर तू नहीं है ,
तेरे जाने के बाद जो हम जीते हैं ,
उम्र ने हम से बेवफाई की है | अहसास भी वही !
डेलास बहुत ही खूबसूरती से बसाया गया शहर है ,साफ सुथरा ,शांत , हर आने जाने वाला आपको देख के अपनी भाषा में राम राम करता है ,(  हनी हाउ आर यू ,गुड डे ,) और एक जीवंत सी मुस्कान तो अवश्य ही देता है ,जैसे कभी हमारे गाँव में हुआ करता था |  सबै भूमि गोपाल की ही है ,  अहसास भी वही हैं ,बस दिल्ली से आने पे यूँ लगता है कि किसी भीड़ भरे मेले ठेले से निकल के आये हों ....आभा ..

Wednesday, 2 April 2014

   ''तव च का किल न स्तुतिरम्बिके !''
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यस्या स्वरूपं ब्रह्मादयो न जानन्ति तस्मादुच्यते अग्येंया |----हाँ स्त्री अग्येंय ही तो है | दुर्गम भी और सरल भी ,कठोर भी तो ममतामयी भी ,शीतलता और अग्नि एक साथ | स्त्री के मन की थाह पाना दुस्तर ही नहीं असम्भव भी है |
   क्यूँ होता है एकस्नेहशील-प्यार की मूरत को समझना इतना कठिन इसका उत्तरदुर्गा शप्तशती में  मिलजाता है |जब महिषासुर नामक दैत्य ने देवताओं {माँ के दर्शन से लौटते हुए तन -निढाल औ  मन प्रफ़ुल्लित"}   को पराजित कर उनकी नाक में दम कर दिया      ******************************************* तो सारे देवता ब्रह्माजी की अगुवाई में भगवान शंकर और विष्णुजी की शरण में गये | शायद देवाधिदेव और परमपिता किसी अन्य मन्त्रणा में व्यस्त थे सो उन्होंने  महिषासुर वध के लिए अपना तेज देवताओं को दे दिया | ये तेज एक स्त्री रूप में था , ये स्त्री उनकी सखी ही रही होगी या कोई कलीग होगी जो उनके समान ही शक्ति संपन्न और प्रखर बुद्धि की स्वामिनी  होगी |   अब ऊपर से आये रिसोर्स की सबने जम के आवभगत की और अपनी अपनी विधा में उसे पारंगत किया--{भाई देवाधिदेव  महादेव शिव और परमपिता परमात्मा  विष्णु भगवान , की निगाह में तो सबको ही आना था न } | जैसे , ब्रह्मा ,शंकर ,विष्णु इंद्र चन्द्रमा वरुण वासु कुबेर अग्नि संध्या और वायु ने अपना-- तेज -सुन्दरता चपलता -चातुर्य -द्रुतगति -संकल्प शक्ति -नीरक्षीरविवेकी बुद्धि -अनन्य बल और शक्ति उसे प्रदान की | यही नहीं  उसे एक नयनाभिराम सुंदर और अतुलनीय  रूप की स्वामिनी भी बनाया जिसे देखते ही आँखें उस स्वरूप को आत्मसाध कर लें | आजकल भी तो पार्लर में जा के कोई भी अपना काया कल्प करवा सकता है फिर वो तो सुर थे उनके लिए अलौकिक रूप को गढ़ना क्या मुश्किल था |  बाह्याभ्यन्तर इस बालिका को तैयार कर फिर उसे शस्त्रों से लैस किया गया| शंकर ने शूल ,विष्णु ने चक्र ,वरुण ने शंख ,अग्नि ने शक्ति ,वायु ने बाणों सी गति ,इंद्र ने वज्र और घंटा ,यमराज ने दण्ड , काल ने चमकती हुई ढाल  और तलवार ,वरुण ने, पाश , क्षीरसागर ने उज्ज्वल हार , उज्ज्वल वस्त्र साथ ही अपने गर्भ में स्थित रत्नों से बने कुंडल ,कड़े ,हार .नूपुर .केयूर हंसुली  अंगूठी आदि कई दिव्य आभूषण ,विश्वकर्मा ने फरसा और भी कई देवताओं ने अनन्य वस्तुयें  भेंट कीं| हिमालय ने सवारी के लिए सिंह ,कुबेर ने मधुपात्र दिया साथ ही नागों के राजा ने बहुमूल्य मणियों का हार दिया | और भी जितने छोटे -बड़े देवता थे सभी ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने के लिए उस स्त्री को अपने गुणों और अस्त्र-शस्त्रों का उपहार दिया | अब बनी वो सर्व गुण संम्पन्न देवी ,जो अजेय थी ,जिसमे कमोबेश सभी बड़े -छोटे देवताओं के गुण और शक्तियाँ निहित थीं | जहाँ एक ही व्यक्तित्व में इतने सारे रूप समाहित हों उसे समझना तो फिर देवताओं के लिए भी संभव नहीं है ,मनुष्य की तो बिसात ही क्या | और इतने सारे रूपों को समाहित करने पे भी एक उसका अपना व्यक्तित्व है जिसके कारण उसे महिषासुर वध का उत्तरदायित्व मिला |उस  अनुपम सौन्दर्य की स्वामिनी , अतुलित बलशाली और विदुषी स्त्री की ही संतानें हैं सबस्त्रियाँ ,तो उन्हें समझ पाना क्या इतना आसान होगा | वो कब अबला है और कब सबला हो जायेगी ,कब प्रेम की शीतल धारा है तो कब अग्नि बाण बन जायेगी ?   जो  इतनी शक्तिशाली और अगम्य हो गयी कि शिव को  भी उसको शांत करने को उसके पैरों पर आना पडा |
  शायद देवताओं ने कभी भी ये नहीं सोचा होगा कि जिसे हम सब अपनी कायरता और कर्महीनता को छुपाने के लिए दैत्यों से लड़ने के लिए भेज रहे हैं कालान्तर में उसे ही समझना हमारे लिए टेढ़ी खीर होगा अन्यथा वो स्वयं ही संयुक्त रूप से दैत्यों से लड़ लेते |
  दुर्गा- शप्तशती  में देवताओं की ये आदत देखते ही बनती है कि वो आमोद प्रमोद में मस्त हैं और जब भी कोई आपदा आती है तो देवी का स्तवन करने लगते हैं और वो दया ,करुणा और ममता की मूरत अपनी परवाह न करते हुए शरणागतों की रक्षा करने को तत्पर रहती है --यही है स्त्री का असली स्वरूप -प्यार के दो बोल से कोई भी उसे छल सकता है |  और तब से वो छली ही जा रही है अष्ट भुजाओं का काम करती हुई घर परिवार,समाज  को संभाल रही हैऔर अपने आप में संतुष्ट रहती है जब तक उसे छेड़ा न जाए |   ये सदैव याद रखाजाना चाहिए कि---
        सौम्य वेष में आये नारी तो उसको कल्याणी समझो ,
        रौद्र -रूप में आये नारी तो उसको काली समझो ,
        नारी तेरे रूप अनेक ,समझ न पाए ऋषि मुनि जिसको ,
              मत उसको अबला समझो ||




Monday, 31 March 2014

           " नवमं सिद्धिदात्री च नव दुर्गा प्रकीर्तिता "
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 माँ अपने बच्चों के लिये सिद्धिदात्री  ही तो होती है | बच्चे को  सदैव ये विश्वास माँ पे होता है कि उसे माँ के आंचल में अपनी मन मांगी मुराद मिल ही जायेगी यदि न भी मिले मन वांछित वस्तु तब भी  स्नेह प्यार ममता करुणा का अथाह समुद्र तो है ही जिस पे उसका पूरा अधिकार है जितना चाहे उलीच ले | माँ भगवती जो सकल ब्रह्मांड की माँ हैं हम पे कृपा करें,उनके  स्नेह की शीतल छाँव सदैव हमारे ऊपर रहे | अंधियारे पथ में भी सूरज की भांति हमें सही मार्ग उपलब्ध हो माँ की अनुकम्पा से |
हिन्दू मनीषा सदैव से ही शक्ति उपासना का प्रतीक रही है | चार नवरात्र जिनमे दो गुप्त हैं ,मात्रि शक्ति के पूजन अर्चन और नमन के ही द्योतक हैं | जो माँ सृजन पालन संवर्धन कर रही है उसका विनियोग ,उसका श्रृंगार ,उसकी आराधना करने का पर्व | उसको उपहार  देने - वन्दना -पूजा -अर्चना -और नमन करने का पर्व ताकि पालन करता को भी अपनी शक्ति का ज्ञान रहे ,कितनी सुंदर व्यवस्था है | नव रात्र में हिन्दुओं के घरों में श्रीदुर्गा सप्तशती पढ़ी जाती है वैसे तो ये नित्य संध्या में पढने वाला ग्रन्थ है ,पर नवरात्रि में अधिकतर इसको पूजा और पढ़ा जाता है |  देवी के नौ रूपों की हम पूजा अर्चना करते हैं | आज मैं देवी के इन नव रूपों का कन्या से माँ बनने की प्रक्रिया में ही निरूपण करने की कोशिश कर रही हूँ | माँ मुझे आशीष दें |
यदि हम ध्यान  दें तो  ये ग्रन्थ कन्या धन की उपयोगिता और  संवर्धन की ही कहानी कहता हुआ प्रतीत होता है  तथा साथ ही कन्या के बचपन से माँ की गरिमा तक पहुँचने के कठिन और संस्कारित सफर को भो बयाँ करता है | आवश्यकता है समझ के पढने की न कि तोते की तरह दोहराने की |
 ये ग्रन्थ हमें स्त्री के गुणों ,क्षमताओं और विभिन्न रूपों से परिचित करवाता है | सिद्दिदात्री बनने के लिए जो सफर तय  करना पड़ता है वो आसान नहीं है ,वहां तक पहुँचने के लिए प्रथम सोपान है शैलपुत्री ,जो दुर्गम में रहती है कठिनाइयों से गुजरती है वज्र की तरह कठोर , बर्फ की मानिंद नाजुक और शीतल है ! 'शैशवावस्था ' फिर अनुपम रूपसी पर ब्रह्म चारिणी ,इतने सारे लालची और खोटी नीयत के देवताओं के मध्य रहके भी अपने कौमार्य को अक्षत रखना इसके लिए स्त्री को कितना मजबूत ,कठोर , शक्तिशाली  और अपने पे विश्वास  रखने वाली होना होगा  | सजग ,शक्ति सम्प्पन विद्या बुद्धि और बल से सम्पन्न 'किशोरी'| तृतीय चन्द्रघंटा, जो चंद्रमा के सामान अमृत से पूर्ण शीतल और सबको सुख देने वाली है जिसकी ओर सब आकर्षित हैं क्यूंकि वो चंद्रमा के सामान ही आह्लाद्कारी है ,उसकी उपस्थिति ही सबका दुःख हर लेती  है |'तरुणाई ' |अब चतुर्थ अवस्था जब वो माँपिता के आगोश से बाहर निकलती है शादी ,यानि 'दुल्हन 'कुष्मांडा , जो अपने संस्कारों और गुणों के तेज से सबको चमत्कृत करती हुई ,सूरज को भी राह दिखाने की अदभुत क्षमता रखती है | ऐसी विभूति जो अपने रूप श्रृंगार से तो सब को मोहती ही है विदुषी भी है और हर तरह की परिस्थिति में धैर्य और बुद्धिमता का परिचय देती हुई दोनों कुलों की लाज को संभाले रखती है | अब वो माँ है ,स्कन्दमाता -पाँचवा पड़ाव | जो सनत्कुमार जैसे सबप्रकार से योग्य संतान की  जन्म दात्री है |जो सृजन ,पालन और संवर्धन करती  हुई ,संस्कारों और प्रकृति को अक्षुण रखती है | एक  ऐसी कन्या जिसे  अपनी कार्य सिद्धि और वंश वृद्धि के लिए महर्षि कात्यायन जैसे ऋषि भी अपनी कन्या बनाने को लालायित रहते है षष्ठं कात्यायिनी च |
और सिद्धिदात्री बनने का अंतिम पड़ाव --समय आने पे काली का रूप धारने में सक्षम होना , सत्य ,धर्म , सृष्टि की रक्षा के लिए स्थितिप्रज्ञ होकर अपने पराये सबको दंड देने की क्षमता रखना , असत्य और दानवी शक्ति के विनाश का कारण और कारक होना | इतनी कठोर परीक्षाओं और दुर्गम सफर के पश्चात  वो कन्या सिद्धिदात्री " माँ " बन पाती है | ऐसी ममता की मूरत जो अपनी करुणा से सबका ताप हर लेती है और अपनी विद्वता और तेज  से अपने घर के सूरज को भी सही मार्ग दिखाती है |
  सप्तशती का पाठ करते हुए , देवी  के इन सभी रूपों का पूजन करते हुए समाप्ति में कन्या पूजन का विधान शायद इसीलिए बनाया गया होगा ताकि हम कन्या धन का संवर्धन करने का संकल्प लें | स्त्री जाति अपनी कन्याओं को सिद्धिदात्री बनाये ताकि वो पुरुषों को भी सही मार्ग दिखाने में सक्षम होवें |
 कालान्तर में स्त्री जाति अपनी शक्ति और गौरव को भूल के गुलामी की ओर अग्रसित हुई  तभी  पुरुषत्व का भी ह्रास हुआ | समाज में विकृतियाँ आने लगीं | आज भी हम यदि दुर्गा शप्तशती को पढ़ते हुए उसे अपने जीवन में भी उतारें तो  सामाजिक विकृतियाँ कम हो सकती है |  शायद , इसके लिए मातृशक्ति को ही आगे आना पड़ेगा | उसे ही अपनी पुत्रियों को बचाना होगा और सिद्धिदात्री बनाना होगा ताकि वो आने वाली संतति और अपने आस पास के समाज में गर्व से जीवनयापन करे और समाज के लिए कल्याणकारी हो -ताकि भूचरा: खेचराश्र्चैव ,सहज कुलजा माला डाकिनी शाकिनी ,ग्रह भूत पिशाच ,यक्ष गन्धर्व राक्षस ,इत्यादि उसपे कु दृष्टि डालते ही -'-नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते ' की ही तरह नष्ट हो जाएँ |
 आओ मिलके एक ऐसा समाज बनाएं जहाँ नवरात्री पूजन केवल व्यष्टि के लाभ के लिए न होकर समष्टि के लिए कल्याण कारी  होवे | सभी को नवरात्री की शुभकामनाएं |










Thursday, 27 March 2014

 मेरे बच्चों  और अनुजों  को समर्पित !जो कर्म  करो और फल की इच्छा न करो को ही गीता का उपदेश मानते हैं -----
 कर्मण्येवाधिकारस्ते  मा  फलेषु  कदाचन |
   मा  कर्मफलहेतुर्भुर्मा  ते  संन्गोSस्त्वकर्मणि ||४७ || (अध्याय २                                                                           श्रीमदभगवद्गीता )
तेरा कर्म पे तो अधिकार है फल पे नहीं ,अत: तू फल की इच्छा करके कर्मफल का हेतु भी मत बन | अकर्मणी -कर्म ना करने में भी -संग: माँ अस्तु  -तेरी आसक्ति न हो -अर्थात  यदि फल नहीं तो कर्म  करने की क्या आवश्यकता ऐसी सोच भी न बने ||
 श्री गीता जी के इस श्लोक का प्रत्येक व्यक्ति अपने अनुसार अर्थ कर लेता है | मेरा अनुभव है कि अधिकांशत: इस श्लोक का अर्थ कर्म  करने और उसके फल तक ही लिया जाता है जबकि इसका तो शाब्दिक अर्थ भी वह नहीं है | फल की इच्छा न कर ये तो भगवान कह ही नहीं रहे हैं |और वैसे भी सांसारिक-सामाजिक प्राणी होने पे फल की स्पष्टता और कार्य-पूर्णता पे उसके प्राप्त होने की सम्भावना और कामना ,इसके बिना तो कोई भी कर्म प्रारम्भ ही नहीं हो सकता है | (incentive)प्रेरणा के बिना कोई भी कर्म अराजक ही होगा |  वो तो बच्चों का खेल हो जाएगा जो पार्क में जा के  हंस-खेलके लड़ झगड़ के वापस आ जाते हैं |यदि ध्यान से देखें तो खेलने कूदने की इस निरुद्द्येश्य सी प्रक्रिया में भी  उनका शारीरिक और  मानसिक विकास निरंतर हो रहा है साथ ही सामाजिकता और परस्पर मेलजोल की महत्ता को भी वे सीख रहे हैं |  तो उद्द्येश्य विहीन कर्म भी किसी न किसी को कुछ तो देता ही है |
 गीता का आंशिक व् सीमित ज्ञान ही -बिना फल की इच्छा के कोई कर्म क्यूँ करें ,हम इतने महान नहीं होसकते कि फल को न देखें या फल न हो तो कर्म का क्या फायदा  -जैसी भ्रांतियां पैदा करता है | प्रभु कहाँ कह रहे हैं कि फल की इच्छा न करो -वो तो कह रहे हैं कि - "तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय: ||' अर्थात ये जीवन एक युद्ध का मैदान ही है , अत: संग्राम में  तो तू उतर ही चुका है | दृढ़ता संकल्प और समर्पण के भाव से ,निजी स्वार्थ को त्यागके लोक कल्याण के लिए अपने को झोंक दे इस युद्ध भूमि में |फल तो अवश्यम्भावी है मिलेगा ही ,''हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्ग जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् |'' | यहाँ तो पूर्ण समर्पण से कर्म करने पे कान्हा ! परलोक सुधरने का लालच भी दे रहे है | एक तरह से कृष्ण जीत के लिए ही उकसा रहे है क्यूँ कि मरना तो कोई भी नहीं  चाहता है , यदि पूरी कोशिश के बाद भी इच्छित फल न मिले तो भी कोई निराशा नहीं दूसरा लोक तो सिद्ध हो ही जाएगा | ऐसा प्रतीत होता है जैसे  प्रभू समझा रहे है कि मनुष्य को किसी भी अवस्था में कर्तव्य  का त्याग  नहीं करना चाहिये ,प्रत्युत उत्साह , लगन और तत्परतापूर्वक  कर्तव्य का पालन ही मनुष्यता है | पशु पक्षी भी तत्परता से अपना कर्म कर रहे है पर भोग योनि में होने के कारण उनके कर्तव्य निश्चित हैं जबकि मनुष्य कुछ नया करने को स्वतंत्र है |  जब प्रभु दूसरे जन्म या दूसरे लोक को सुधारने का भी लालच दे रहे हैं तो इस जन्म में फलकी इच्छा न कर ये कैसे कह सकते हैं ये तो मात्र छलना ही हुई -जो भी ये कहे कि मैं फल की इच्छा से कर्म  नहीं करता हूँ वो एक दिखावा ही है |निरर्थक और निरावश्यक कर्म तो अराजकता ही होगा | हाँ कृष्णा कहते हैं कर्म करने से पूर्व एक नक्शा अपने मन में बना कैसे कर्तव्य का पालन करना है ,तू कितनी दूर तक जाना चाहता है ,कितनी दृढ़ता है तेरे भीतर ,निजी स्वार्थ को पीछे रखके लोक कल्याण के लिए तेरा हर कर्म हो ,जीत हार सब सोच ले दूर दृष्टि और मजबूत ईमानदार इरादा  फिर निश्चय कर के झोंक दे अपने को कर्म में और कर्तव्यों का पालन करने में | अब फल से ध्यान हटा ले ,मैं दूंगा तुझे फल तेरे पुरुषार्थ , पूर्वजन्मों के कर्मों और प्रारब्ध के अनुसार |यदि तू कर्म करते हुए फल पे ही ध्यान रखेगा तो तेरे मन में द्वन्द बना रहेगा जो कर्तव्य निबाहने में बाधक भी हो सकता है ,तू समय समय पे विचलित भी हो सकता है ,आशातीत माहौल न देख के तू कर्तव्य पथ से भटक भी सकता है और निराश होके हार भी मान सकता है |यदि कर्म फल की आशा ,स्पृहा और आसक्ति को ही ध्येय बना लिया तो मन केवल फल में ही अटक जाता है और फिर येन-केन-प्रकारेण इच्छित फल प्राप्त करने के लिये -चाटुकारिता ,लोभ ,मोह लालच ,मक्कारी झूठ ,फरेब ,धोखा जैसे गुण मनुष्य में सहज ही आ जाते हैं जो व्यक्ति के लिए ही नहीं समष्टि के लिए भी घातक हैं | सो प्रभु कह रहे हैं  तू लाभ हानि सुख दुःख को मेरे हवाले कर और कर्तव्य पथ पे डट जा ________           सुखे दु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ |
                            ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमावाप्स्यसी  ||
जैसे  खेल कूद के पढके   बच्चा घर आता है ,भूख से बेहाल होता है तो माता पिता के संयुक्त प्रयासों से उसके लिए यथायोग्य भोजन तैयार होता है ,अब किस को क्या मिलता है ये उसके प्रारब्ध पे निर्भर करता है | नियति तो साथ ही चलती है पर मनुष्य कुछ नया सोच के  अपने पुरुषार्थ के बल पे कुछ नया करने की कूवत तो रखता ही है  प्रत्यक्षं किम प्रमाणम -.यज्ञं में जितनी समिधा उतनी ही अग्नि | अपनी नियति के साथ ही कर्मों का फल और दंड सब मिलेगा सो भगवन कह रहे हैं !  अपने कर्मों को कल्याणकारी बना और डट जा मैदान में ,तिनका भर भी संदेह अपनी क्षमता पे मत करना और किसी भी परिस्थिति में निराश न होना | जब तेरे माता पिता तेरे लिए इतने परेशान रहते है और तुझे सबकुछ देने की कोशिश करते हैं तो मैं तो जगत का पिता हूँ ,सब मुझ पर छोड़ दे | कर्मों का फल तुझे अवश्य ही मिलेगा ,हाँ! तू कर्मफल के विषय में सोच के उसका हेतु मत बन वो भी तेरे पुण्यों को क्षीण ही करेगा ,तुझे तो पता ही नहीं है मैं तुझे क्या देना चाहता हूँ | तू कुछ मांग रहा है और मैं उससे भी अधिक देना चाहता हूँ पर तेरी मांग मुझे रोक देगी -सो फल मुझ पे छोड़ |  यही समझाना चाह रहे हैं प्रभु इस श्लोक में कि ' मा फलेषुकदाचन '  फल पे अधिकार मत मान ,फल तो निश्चित ही है पर भविष्य के गर्भ में है , अन्धकार से प्रकाश में जाने पे किसके हिस्से कितना  आये और कौन कहाँ तक पहुंचे ये देश काल परिस्थिति पुरुषार्थ और कुछ हद तक प्रारब्ध पे निर्भर करता है | तो जब हमारे हिस्से कर्तव्य निर्वाह ही है ,फल को  पाने की ईमानदार चेष्टा ही है तो क्यूँ न हम कर्मों पे ही ध्यान दें |" हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ ,या गुरु वशिष्ठ से पंडित ग्यानी सोध के लगन धरी करम गति टारे नाहि टरी "ये हमें अकर्मण्य बनाने के लिए नहीं लिखे गये हैं | ये सूक्त वाक्य हमें प्रेरित करते है शुभकर्मों की ओर | हम कुंडली ,लगन ,मुहूर्त ,ग्रह,नक्षत्र के पाखंड में न फसें और जीवन संग्राम में अपने कर्तव्य को निभाते हुए '' मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोअस्त्वकर्मणि ||  न होवें ,वरन कर्तव्य करने को ही अपना अधिकार मानें ,फल तो मिलेगा ही बस उसे प्रभु पे छोड़ दें यही हमारे बस में है | अंग्रेजी में भी कहते हैं "Hope for the best but prepare for the worst " .
बहुत से लोग दूसरे जन्म में क्या होगा ये किसने देखा है सो इसी जन्म में सारे भोग भोगने के लिए प्रयत्न रत रहते हैं | अब ये दूसरे जन्म की और पाप पुण्य की अवधारणा भी बहुत जटिल है | पर कुछ तो है जो सदियों से है | यदि प्रकृति को ईश्वरीय शक्ति मान के उसकी पूजा का विधान  , अमुक वृक्ष को काटने से ये पाप होता है और वृक्षारोपण से ये पुण्य होता है , हर नदी की एक अपनी कहानी अपनी पवित्रता  ,पर्वतों की परिक्रमा और संरक्षण और उससे मिलने वाला पुण्य ,अमुक जीव शुभ है अमुक अशुभ है ,औषधि युक्त वनस्पति को तोड़ने का विधान  , ये सब न किया गया होता तो मनुष्य जैसे स्वार्थी जीव ने तो अब तक प्रकृति को नष्ट ही कर दिया होता ,और ये डर भारत में ही नहीं हर देश की संस्कृति और संस्कारों में परिलक्षित होते हैं | मानव स्वाभाव की भीरुता और स्वार्थपरता की वृत्तियों और मनोविज्ञान को सूक्ष्मता से  पहचान के ही पाप- पुण्य ,डर और इहलोक- परलोक की रचना की गयी होगी |  जब हम अपना सौ प्रतिशत देके कोई कर्म करते हैं ,निष्ठा से कर्तव्य निभाते है तब भी मनोवांछित नहीं मिलता है तो प्रारब्ध को मानना ही पड़ता है | यही प्रारब्ध की संकल्पना हमें  कर्म में प्रयुक्त होने ,और अच्छा करने ,व्  परलोक सिद्ध करने की प्रेरणा देती है |
प्रभु कह रहे हैं -अपने कर्मों को कल्याणकारी बना ,उठ अपनी पूरी शक्ति से इस जीवन संग्राम को जीतने  और अपनी नियति को सुधारने के लिए कार्य कर , फल तुझे मैं दूंगा फिर जो भी मिले उससे तेरा कल्याण ही होगा ,वही तेरे लिए उपयुक्त होगा -कम या ज्यादा |
  अर्जुन ने भगवान् का शिष्य बनना स्वीकार कर लिया और अपने को पूर्ण रूप से समर्पित कर दिया
कार्पणयदोषोपहत स्वभाव: पृच्छामि त्वां  धर्मसम्मूढ़चेता: |
यच्छ्रेय:स्यानिश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम ||
            तब भगवान् ने उसकी शंकाओं का समाधान किया ,गीता का ज्ञान दिया ,गीता को हम जिस रूप में देखें वो वैसा ही अर्थ देती है | उपर्युक्त श्लोक में अर्जुन पहले धर्म के विषय में पूछते हैं ,दूसरी बार में अपने कल्याण की कामना करते हैं ,तीसरी बार में शिष्य बन जाते है और चौथी बार में शरणागत हो जाते है | अब शरणागत का उद्धार तो प्रभु करते ही हैं पर भगवान् की  सहृदयता और गुरुता है कि वो अर्जुन को उपदेश देने के ,अपना विराट रूप दिखाने के और उसकी सभी शंकाओं का समाधान करने के बाद भी -उसे क्या करना है ? कौन सा मार्ग अपनाना है ? ये उसी पे छोड़ देते है ___
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्यागुह्यतरं  मया |
विमृशयैत द्षेशेण यथेच्छसि तथा कुरू ||  यह गुह्य से भी गुह्य शरणागती का ज्ञान मैंने तुझे कह दिया | अब तू इस पर अच्छी तरह से विचार करके जैसा चाहता है वैसा कर | यहाँ भगवान ने अर्जुन को निराकार से साकार में खींच लिया |क्यूंकि निराकार में साकार का कोई अर्थ नहीं है पर साकार में निराकार भी समाहित है |
 मेरे विचार में -कर्मण्ये वाधिकारस्ते -ये श्लोक ही प्रेरित करता है गीता पढने के लिए और इस गीता गंगा मे अवगाहन करने पे डूबने का खतरा भी नहीं रहता | कर्तव्य के निर्वाहन में यदि कुछ ऊँच-नीच हो गयी हो तो भी भगवान मौजूद है हाथ पकड़  बाहर निकालने के लिए --
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणम् व्रज |
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिश्यामी माँ शुच  || इसका अर्थ ये भी नहीं है कि भगवान कर्तव्य निर्वाहन में कुछ भी करने की छूट दे रहे हैं ,वो तो कह रहे है तू सब धर्मों को छोड़ के मेरी शरणागती ले ले ,अब जो भगवान की शरणागती में है वो असंगत तो कर ही नहीं सकता | माँ शुच ! मेरी शरणागती ले मैं तेरे पापों को हर लूँगा |
अब एक और दीगर बात है यहाँ पे 'सर्वधर्मान्परीत्यज्य '  विश्व के अन्य धर्म तो उस समय थे ही नहीं -तो इससे यही निश्चित होता है कि प्रभु धर्म कर्तव्यों के निर्वाह को ही कह रहे हैं और यदि सभी कर्म प्रभु को पूर्ण समर्पित होके ही किये जाएँ तो फल तो मीठा और कल्याणकारी ही होगा | कर्म के सिद्धांत को और फलकी इच्छा को जानने के लिए  हमें गीता पढनी ही होगी |  पढो गीता ,गुणों गीता ही केवल पुनीता !  


        

Friday, 14 March 2014

          "" मौसम की ह्लचल  होली का व्यंग ""
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 मौसम का असर सभी प्राणियों पे पड़ता ही है | बदलती हवा में अब वाइरस जनित रोग अपरिहार्य हैं ,कोई सौभाग्य शाली ही इनसे बच पाता  होगा | और वाइरस भी एक से एक खतरनाक ,जिनकी कोई दवा ही ईजाद नहीं हुई है -अपना जीवन चक्र पूरा करेंगे ही और खुद ही समाप्त होंगे | कुछ के लिए तो टीके ईजाद हो गये हैं पर अधिकतर से बचाव का तरीका तो सावधानी , शक्तिऔर सुरक्षा ही है ,आज कल हिन्दुस्थान की फिजां में ऐसा  ही एक  वाईरस  तिर रहा है | चुनावी वाईरस ! जो   पूरे  देश को  खतरनाक तरीके से प्रभाव में ले चुका है | ये वाईरस छिट -पुट में तो देश में रहता ही है हमेशा, पर   हर पांच वर्ष में विकराल रूप धारण कर लेता है  | ये चुनाव आयोग की एक सूचना से फैलता है और धीरे-धीरे सभी को अपनी चपेट में ले लेता है | इससे बचाव का कोई तरीका नहीं है | वैज्ञानिक अभी तक कोई टीका नहीं ईजाद कर पाए हैं | कितना ही बचियेआप इसकी चपेट में आयेंगे ही |
     आपको यदि लिखने का शौक है तो लेखनी खुद ब खुद रंग जायेगी  चुनावी माहौल में |  होली के त्यौहार की आहट से  फगुनाये हुए लोग , बुरा न मानने की परम्परा और चुनावी माहौल ,बौराने के लिए और क्या चाहिए | सो मैंने सोचा  होली की इस  बुरा न मानने   की  सदियों पुरानी सांस्कृतिक परम्परा की बहती धारा में मैं भी हाथ धो लू |  अथ नेता चर्चा कथा !  ॐ नमो शुद्धम |  ( "नमो "से जो भी अर्थ लगाना  है, लगायें  ;पाठकगण स्वतंत्र हैं  ) शुद्ध होलूं ,ये जो कथा  है इसमें लेखनी के अशुद्ध होने की सम्भावना रहती ही है | तो साहब चर्चा है आजकल के सबसे चर्चित चेहरों की -ये  -हर गली ,कूचे ,मुहल्ले ,गाँव ,कस्बे ,शहर ,में छाये है | धूर्त ,मक्कार ,लम्पट ,भ्रष्टाचारी ,गुंडे , वोट रूपी मछली पे आँख गडाए श्वेत वस्त्र धारी बगुला भगत ,पलटूराम ,हरी लाल सफ़ेद टोपीवाले ,गमछेवाले , फूलवाले ,हाथ वाले ,हाथी वाले ,साईकलवाले ,झाडू वाले और भी न जाने कितने ,तीर ,कुर्सी ,साबुन ,कैंची अनेकों रूप रंग के नेते, हाथ जोड़ के घूम -घूम के भोली- भाली जनता को समझाने निकले है | बाबूजी पांलागी ,अम्मा सर पे हाथ रखदो बस ,भैया इबके नौकरी पक्की ,लाडो इब जो मुझे जितावेगी तो खूब घूमियो सड़कों पे कोई डर ना रहेगा | भाभीजी अभी तो आपके वोटों का ही सहारा है ,देखो जीते तो बिजली -पानी -गैस -सब सस्ते | अपने बेटे को अच्छे स्कूल में पढ़नाजी | अम्मा -बापू का बड़े हस्पताल में इलाज फ्री होगा हमारी सरकार में ,और न जाने क्या- क्या प्रलोभन | झूठे ,बेईमान ,ढोंगी ,अहंकारी ,अराजक ,दम्भी ,देश को बेच- खाके डकार न लेने वाले सफेदपोश ---वाह इतनी उपमाएं तो कालिदास ने भी न दी होंगी मेघदूत में , वैसे एक शब्द ही काफी है, नेताजी !चले जा रहे है प्रचार के लिए | कमोबेश सभी का अहंकार और विश्वास  से दीप्त  चेहरा ,पीछे -पीछे चमचों की फ़ौज | सबके मन में एक ही विचार आज जो भी हो ज्यादा से ज्यादा मीडिया कवरेज लेना है | नाम हो या बदनाम , येन -केन -प्रकारेण सभी चैनलों में आज के दौरे को बहस का मुद्दा बनना ही चाहिए | नेताजी का चमचों को निर्देश -भाई जनता के बीच खड़े होकर जूता फेंको ,टमाटर फेंको , गालपर रैपट मरवाओ या होली का मौसम है स्याही से मुहं काला नीला करवाओ , पर आज के कार्यक्रम की चर्चा होनी ही चाहिए | कुछ तूफानी सोचो और करो |   जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है | हम कुछ दिनों भी ख़बरों से बाहर हुए तो राम नाम सत  हो जाएगा | मन में दृढ निर्णय ,मैं ही मैं हूँ ,सच्चा  ईमानदार ,बाकी सब झूठ और ऐसा सोचते -सोचते  नेताजी चले जा रहे हैं चले जा रहे हैं ,तरह -तरह के प्रपंच ,कभी सजे हुए मंचों पे चढ़ रहे हैं ,कभी बस में ,कभी ट्रेन में कभी जहाज से निकल सीधे लोकल ट्रेन  में ,कभी नाव में ,कभी नुक्कड़ बहस ,कभी चाय पे चर्चा ,कभी टेम्पो में  सारे नियमों को तोड़ते हुए ,अहं का स्थाई भाव चेहरे पे ,पीछे पीछे  लगभग दौड़ते हुए कैमरा ,माइक ,और बैग लादे सबसे पहली एक बाईट लेने को आतुर मीडिया पर्सन (जिन्हें पहले पत्रकार कहा जाता था ,अब पेड मीडिया के नाम से पहचाने जाते हैं और अपने आकाओं के लिए काम करते हैं ) |   साथ में बेचारे  पुलिस और सुरक्षागार्ड भी ,भागते हुए इनके साथ कदमताल करते हुए नजर आते है ,अब वो आमजनता के लिए हैं  या इन खास लोगों के लिए ये तो उन्ही को पता होगा |
  अगर कोई प्रश्न मन में उठ रहा हो तो उसका समाधान करने की कोशिश होगी ,कथावाचक का अपनी कलम से संबोधन !या वाइरस का प्रभाव होने के कारण गर्वोक्ति |  मन ने प्रश्न उछाला - महाराज  !  आप तो कह रहे थे कि इस  वाइरस ने सभी को ग्रस लिया है पर हमपे तो कोई लक्षण इस बीमारी का है नहीं ?  कथा वाचक ने बड़े गर्व से इधर उधर देखा ,अपने आसपास की हवाको महसूस किया ,और समाधान - सारे दिन फेस -बुक पे राजनीती पढते-पढ़ते दिमाग का दही जम  जाता है | टी वी का स्विच ऑन करो तो नुक्कड़ बहस ,कौन बनेगा प्रधान-मंत्री ,बड़ा-मुद्दा ,बीच बहस में , पोलखोल और न जाने क्या क्या | आज एक ने स्टिंग किया | दूसरे ने पोल खोली | तीसरे ने  गाली दी | फिर पलटवार हुआ , कोई पप्पू ,कोई पलटू ,कोई फेंकू | और सबसे बड़ा लक्षण इस बीमारी का तीसरा मोर्चा जो कमोबेश गर्जी-फर्जी लोगों का जमावड़ा होता है | यही नहीं हर पांच वर्ष में बेचारे गांधीजी और नाथूराम को जीवित करने की कोशिश | अब तो पटेल भी लाइन पे आ लगे हैं | और मेरी कलम तू जो  राजनीती जानती ही नहीं है ,इस मुद्दे पे चर्चा कर रही है वो क्या ये साबित नहीं करता की सभी चपेट में आ चुके हैं | ये  छद्म परिवेशों और ढोंगों के अंदर रहके जनता को  बेवकूफ बनाने की प्रवृति या जनता को बेवकूफ ही समझना भी इस बीमारी का ही एक लक्षण है |पर एक बात जो सब राजनितिज्ञ भूल जाते है --जनता जितनी शीघ्र  मूर्ख बनती है ,उतनी ही शीघ्रता और चतुरता से अपनी मूर्खता के आवरण को  उतार भी फेंकती  है | उसे लफ्फाजी ,नौटंकी ,दार्शिनिक बातों में अब कोई रूचि नहीं है | ये विकसित और मजबूत होते लोकतंत्र की जनता है | यहाँ घर -घर अनुभवी बुजुर्ग हैं ,प्रौढ़ता पूर्ण जवानी है ,जोश, उमंग ,बुद्धि- विवेक युक्त युवाओं की फ़ौज है ,जो यदि एक बार बहक जाए तो शीघ्र ही चैतन्य भी हो जाती  है | वो बहकी भी देश को सुधारने के लिए ही थी और अबकी बार वोट देगी, तो भी  देश के लिए ही |
  अब देश का भविष्य तो लिखा ही जाना है |  तो हर कथा की तरह इस में भी अन्त में प्रार्थना --प्रभु जनता को सद्बुद्धि देना |  इस बार जाति ,सम्प्रदाय ,सेकुलर , सम्प्रदायिक ,प्रलोभन या और किसी भी  कच्चे लालच में जनता न फंसे  | बहुमत की सरकार आये | प्रभु राजनीतिग्यों को भी सद बुद्धि दे कि वो विकास के मुद्दे को प्रमुख मुद्दा बनाएं |  सबसे बड़ी  और अहं बात पार्टियों के बड़े -बूढ़े अबकी बार किसी भी योग्य व्यक्ति की टांग खींचने को अपना मकसद न बनाएं और देश को आगे ले जाने में सहायता करें | देश को विश्व गुरु बनाने की बात कहने वाले   पहले अपना हित साधने के लालच को छोड़ें   पार्टी को मजबूत करें  | इसबार किसी कठपुतली को सिहासन पे बिठाने की जुगत न भिड़ानी पड़े |  अबकी बार बहुमत की सरकार | मजबूत प्रधानमंत्री |  देश हित में सभी देश भक्त मिल जाएँ | यदि ऐसा न हुआ तो इस बीमारी के जो लक्षण अभी जनता में अभी ( dormant  )  सुप्त अवस्था में हैं  हैं वो पांच वर्षों तक नेताओं में dormant और जनता में एक्टिव हो जायेंगे |मैं जानती हूँ ये दिवा स्वप्न है पर सपने देखना भी बीमारी का ही एक लक्षण है ,मैं तो इतना ही देख रही हूँ पता नहीं किस -किस नेता ने तो अपने को प्रधानमंत्री की कुर्सी पे देखना भी शुरू करदिया है और दौड़ में बहनजियाँ ,दीदियाँ ,और आम्मायें भी शामिल है | और छुटभइये तो अपने आकाओं को देवी देवता भी बताने लगे है | ताकि सनद रहे |  अब कथावाचक के व्हाट्सआप में कई मैसेज आ चुके हैं , हो सकता है कोई जरुरी भी हो  | प्रभु कृपा बनी रहे | कथा ऐसी ही थी | होली का उत्सव है सो कुछ भी लिखने और करने पे माफ़ी होती है | ॐ तत्सीदति |   इति श्री चुनाव वाइरस कथा | ..........