Friday, 20 July 2018

सावन का महिना ,भोले का महिना कांवड़ यात्रा का महिना ,पार्वती के दुल्हिन बनने सजने का महिना ---सब कुछ वैसा ही पर हर वर्ष नया -नया------एक बार फिर के अंतर्गत --यादें --
सावन में बस भोला बम ---
''पार्वती तप कीन्ह अपारा ,करहुँ तासु अब अंगीकारा। ''
देवताओं की विनती शिव से ,और शिव का प्रसन्न होके कहना --
''ऐसे ही होऊ कहा सुख मानी ''-
सप्तऋषियों का हिमालय के प्रसाद में आना और पार्वती की परीक्षा ---
देखो तुमने हमारा कहना नहीं सुना ,अब शिव ने काम को भस्म कर दिया ,तुम्हारा प्रण झूठा हो गया --पार्वति मुस्कुराते हुए बोलीं ---
''तुम्हरे जान काम हर जारा ,अब लगि शम्भू रहे सविकारा।
हमरे जान सदा शिव योगी ,अज अनवद्ध्य अकाम अभोगी ''
कितना विशवास जगदम्बा का ,सप्तऋषियों ने उमा को आशीष दे पत्रिका मिलाई और ---''जस दूलह तस बनी बराता ''----रामचरितमानस में भव्य वर्णन शिव-पार्वति विवाह का। जी हाँ महीना सावन का तथा शिव बारात का , --बस इसी लिए सावन शिव मय ,चारों ओर ,नम:शिवाय और बम-बम भोले की गूंज।
महाभारत में भी कृष्ण जब शिव की तपस्या कर वर मांगने हेतु हिमालय में गए --तो शिव स्थान का कितना सुंदर वर्णन कृष्ण के मुहं से ------
''कृष्ण कहते हैं ,पहुंचते ही मैंने हिमालय को तपस्या के अनुकूल पाया ,वहां पर दिव्य आश्रम ,ब्राह्मी से शोभायमान थे। धव ,कुकुभ [अर्जुन ],कदम्ब ,नारियल [जो अब समुद्र के तट पे पाये जाते हैं ],कुरबक ,केतक ,जामुन पाटल बड़ वरुणक ,वत्सनाभ ,बिल्व ,सरल ,कपित्थ ,प्रियाल ,साल ,ताल ,बेर ,कुन्द ,पुन्नाग।,अशोक ,आम्र ,अतिमुक्त ,महुवा ,कोविदार ,चम्पा था कटहल ,केले के कुञ्ज ,नाना प्रकार के पशु पक्षी ,सर्प ,हाथी ,शेर , विशालकाय पशु ,झर -झर झरते झरनों की शीतल फुहारें ,कई तरह की नदिया और भव्य जान्हवी ,नाना प्रकार के फूलों तितलियों भर्मरों से गुंजित वो वन जिसके विषय में दूसरे लोग सोच भी नहीं सकते --''अचिन्त्यं मनसाप्यन्यै ''---अनेकानेक सरोवरों से अलंकृत पुष्पों से आच्छादित विशाल अग्निशालाओं से विभूषित था ---और फिर महाभारत में शिव की पूजा अर्चना तपस्या कैसे की कृष्ण ने सब विस्तार से --साथ ही उमा का आशीर्वाद कृष्ण को --
''-एवं भविशत्यमरप्रभाव नाहं मृषा जातु वदे कदाचित।
भार्या सहस्त्राणि च षोडशैव तासु प्रियत्वं च तथाक्षयं च।
प्रीतिं चाग्रयां बान्धवानाम सकाशाद ददामि तेहं वपुष:काम्यतां च।
भोक्ष्यन्ते वै सप्ततीं वै शतानि गृहे तुभ्यमतिथीनां च नित्यं ''-------जगद्जननी अम्बे का आशीष ठीक वैसे ही जैसे माँ पुत्र को देती है ----तुम सदैव कमनीय बने रहो ,बंधु -बांधवों से प्रसन्नता मिले ,तुम्हारी सोलह हजार रानियाँ और शक्तिशाली पुत्र हों ,घर अक्षय धनधान्य से भरा रहे और प्रतिदिन सातहजार अतिथि तुम्हारे घर में भोजन करें। -----
कृष्ण की विनय ---
'' त्वत्तो जातानि भूतानि स्थावराणि चराणि च।
त्वया सृष्टमिदं कृत्स्नं त्रैलोक्यं सचराचरम् ''-----आज का मेरा शिवार्चन ------
यही सुंदरता है हमारे शास्त्रों की ,ब्रह्मा ,विष्णु महेश सदैव एक दूसरे की पूजा अर्चना करते एक दूसरे के प्रति श्रद्धा रखते हुए देखे जा सकते हैं ------आज सावन के पहले सोमवार को महाभारत ,रामायण में शिवार्चन का ---आनंद लीजिये सभी --आशीष है माँ पार्वती का , सभी का अधिकार है उसपे सो शेयर कर दिया ,कृष्ण के साथ ही मैंने भी अपने लाडले के लिए एक रानी की अर्जी लगाई ---नम:शिवाय --सत्यं शिवं सुंदरम का बोलबाला हो ,सारे देश में और शिव की नगरी उत्तराखंड में --वो उत्तराखंड जिसका मनोरम वर्णन कृष्ण ने किया पूण: अपने वैभव को प्राप्त हो ---वृक्षारोपण से --
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Tuesday, 17 July 2018


==========मन कदरी का पात हुआ जाता है ,


मेह पावस के न भिगो पायें इसको।

देख भानु को अंबर से क्षितज पे आते ,

लगीं बुनने कुछ स्वप्न सुहाने लहरें।

वो होके किरणों के झूले पे सवार ,

छिपे अंक जलधि , उगे भूधर पीछे।

देख पींगे बढ़ाते झूलते उसको

स्मित सीमान्त आह्लादित -खोलता मूँदता पलकें।

उषा- कुमकुम ,संध्या- सिंदूर लिए।,

पथ को केसरी वसन उढ़ा देती हैं।

पर! तुझे कब रंगीनियां बाँध पायीं !

मिटाने को तपिश- थकन दिवसभर की ,

खेलेगा संग जलधि लहरों के तू ,

भिगोना है तुझे तन मन अपना -

जाना भी तो है, निशा सुंदरी के तिमिर महल !

जहां कज्जल चादर में हैं हीरे टंके ,

तकिये पे जहां चाँद का कंगन है कढ़ा ।

सोने चांदी के सितारों की जगमग में-

रूपसी निशा संग -सुख-दुःख मंजरित होंगे।

ठिठक गयी हूँ तेरे रूप के जलवों में मैं

नीलम से चमकते सागर की लहरें

धुन बांसुरी की सुनाती है टूटते-बनते।

घन घूंघट की ओट से हैं झांकते , 

लहराते -रेशमी केश ,कज्जल निशा के.

और ! मैं बावरी -चुपके से -

लहरों के झरोंखों से ताकूँ तुझको।

लालसा मन की तुझे देखने की

जाने आँखों को क्यों गुनाहगार कहते हैं सभी !

संग अम्बुद के तू उतरता है मेरे भीतर भी

मैं तेरे संग-संग ही सोतिजगती हूँ ,

तू मेरा मन है तू देवता मेरा -

तू है तो मैं हूँ -बस ,

इतना सा नाता तेरा- मेरा ।।आभा।।====

-----सागर के अंक में समाते सूरज का दृश्य -मन को लहरों सा चंचल कर देता है -आसमान में बिखरा कुमकुम चूर्ण ,स्वर्णिम रश्मियां और नीलम सा जलधि -मन बावरा हो कविता हो जाता है।इस सुंदर चित्र पे केवल सुंदरता का वर्णन 
क्षितिज के उस पार-प्रोत्साहन के लिये ---
=============


अपनी साँसें मुझको देकर 
तू मुझमें ही छिप जाता है। 
पपीहे सी प्यासी रह जाती 
सुधियों का अमृत पीने को। 
जब तू मेरा होता है ,
मैं भी अपनी होती हूँ। 
जुगों जुगों की रीत यहां 
बस प्यार और अधिकार की है। 
तुझको पाना तुझको जीना 
तेरी ही राहों पे चलना -
तिनका -तिनका जोड़ यहां 
निर्मित अपना संसार किया -
अब पंछी कैद हुआ तड़पे 
चाहे ऊँची उड़ान प्रिये। 
अधखुली पलकों का उन्मीलन 
सुधियाँ लेती आकार प्रिये। 
तू भी अंक में सागर की 
नित आता थकन मिटाने को। 
मैं भी लहरों में मिलकर के 
फिर लेती हूँ आकार प्रिये।।आभा।।-हर बार उजला होने की आस में आत्मा लिहाफ बदलती है ,कुछ भूली बिसरी सुधियों संग -"पुनरपि जननं पुनरपि मरणं' -- साँसों का हवन है जीवन फिर - फिर से सागर के अंक में समाना -जैसे प्रतिदिन सूरज समाता है ,आत्मा की थकन उतारने को -पर अवसान मनभावन हो,रंगभरा हो , ये भी सीख देता है क्षितिज का सूरज --आखिर जीवन तो क्षितिज के उस पार ही है।
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Monday, 16 July 2018

17 july 2015 ---ठीक से याद नही -शायद अथर्वेद को खोल के बैठी होऊँगी--तभी ये लिखा होगा ---आज फिर वही दिन वही आशीष वेदों से लोक में घूमता हुआ उस पीढ़ी से इस पीढ़ी तक पीढ़ी दर पीढ़ी ---
पश्येम शरदः शतम् ।।१।।
जीवेम शरदः शतम् ।।२।।
बुध्येम शरदः शतम् ।।३।।
रोहेम शरदः शतम् ।।४।।
पूषेम शरदः शतम् ।।५।।
भवेम शरदः शतम् ।।६।।
भूयेम शरदः शतम् ।।७।।
भूयसीः शरदः शतात्।।८।।

 हम सौ शरदों को देखें अर्थात सौ वर्षों तक हमारी नेत्र इन्द्रिय स्वस्थ रहे I१ 
 हम सौ शरद ऋतु तक जीयें यानि हम सौ वर्ष तक जीयें I२ 
 सौ वर्ष तक हमारी बुद्धि सक्षम बनी रहे अर्थात मानसिक तौर पर सौ वर्षों तक स्वस्थ रहे I३ 
 वर्षों तक हमारी वृद्धि होती रहे अर्थात हम सौ वर्षों तक उन्नति को प्राप्त करते रहे I४ 
  सौ वर्षों तक हम पुष्टि प्राप्त करते रहें, हमें अच्छा भोजन मिलता रहे I५ 
 हम सौ वर्षों तक बने रहे I यह दूसरे सूक्त की पुनरावृति है I६ 
 सौ वर्षों तक हम पवित्र बने रहें I७ 
 सौ वर्षों के बाद भी ऐसे ही बने रहें ८ 
------------आंचलिक भाषा में अथर्ववेद का ये मंत्र -कुछ यूँ बन गया ----
''जी रये, जागि रये धरती जस आगव, आकाश जस चाकव है जये सूर्ज जस तराण, स्यावे जसि बुद्धि हो दूब जस फलिये, सिल पिसि भात खाये, जांठि टेकि झाड़ जाये।''------
-हरेला की आत्मा अथर्ववेद में बसी है ,पूर्वजों की परम्पराएँ ,संस्कार लोकमन के साथ-साथ यहां तक चले आये। 
ये संस्कार, पर्व आज ज्यादा प्रासंगिक हैं जब जनसंख्या विस्फोट के कारण  सुविधाओं के विस्तार के लिए वृक्षों का अंधाधुंध कटान अपरिहार्य हो गया है -
 विकास की कीमत पे दस वर्ष से अधिक उम्र के वृक्षों का कटान तो प्रतिबंधित होना ही चाहिए साथ ही उससे छोटे जितने भी पेड़ काटे जाएँ उन्हें आधुनिक तकनीक से दूसरी जगहों पे रोपने की कोशिश हो तब ही हरेला जैसे आंचलिक पर्वों की आत्मा का अनुसरण होगा -
कुछ समय तक घरों में गमलों पे पेड़ लगाये जाएँ स्वस्थ होने के बाद उन्हें जमीन दी जाये -पर ऐसी जमीन जहाँ दो तीन वर्ष तक देखभाल हो सके -यही संकल्प हो हमारा -
मेरे जामुन इमली अनार अमृता पीपल तैयार हो रहे है और इस वर्ष भी गमलों में आम लीची प्लम आड़ू करीपत्ता सभी बो दिए गए है -दूसरे वर्ष के लिए -ईश्वर इन पौधों को उम्र दे। 
आषाढ़ी नवरात्रि और हरेला पर्व सभी के लिये सुख-समृद्धि और शांति का पैगाम लेके आए।.आभा।।



Wednesday, 11 July 2018

 जीने की जद्दोजहद में,  हर रोज- जिंदगी
   मौत से करती रही   ,सदा ही  दोस्ती।
 खेल आंखमिचौनी का, चलता रहा सदा
 गमे इश्क को  मेरे ,न मिल सकी ये  जिंदगी।
इश्क के बुतों संग ,  कुछ वक्त तो गुजार
रूह अपनी से इजहारे मुहब्बत है-   जिंदगी।
 मरने से हो शुरू- वो शै है, 'इश्क' - जिंदगी
मरते हैं किसी पे- तो ही ,जीते हैं  जिंदगी
मिट के ही  छू पाउंगी मैं, तुझे ए इश्क
ए री  न   मेरी बन ,आली तू  -जिंदगी  !
 डरा के मौत से मुझे ,खुद ही  तू डर गयी
क्या  जानती  है, तू भी  "तू "मुझसे  है जिंदगी ?
गर्म रेत  सी राहें मेरी  , ये तो ;  मालूम  है तुझे
तो !  हमसफर मुझे ही क्यूँ चाहती है- जिंदगी?
इश्क ख़्वाब है मेरा ,आदत मेरी है वो
इश्क "रूह " है मेरी , "तू "  इबादत है जिंदगी।
दाद ओ तहसीन की ख्वाहिशें हुई तमाम
बुझता हुआ चिराग मैं तेरा हूँ जिंदगी।। आभा।।




Sunday, 17 June 2018

ठाली बैठे -सुधियों के जलधि में गोता लगाना -
'समय '
=====
पग- समय के,
छाया की मानिंद
पथ में ,चलते हैं साथ -
 सृष्टि के।
न आवाज ,
न आकृति
 पारदर्शी -
समय की पदचाप ,
सुनाई नहीं देती -
न आपको न मुझे।
पर हैं सभी -
इसी पथ पे,
फना होना - नियति।
जग से बंधन
कुछ निष्ठुर क्षणों के ,
मन की परतें खोलते -
बोलते -लिखते
पर ----
मज्जा से परत दर परत
अस्थि होती देह  -
 विषाद में जाएगा मन ,
सो न ----
देखने की जिद्द -
 उपेक्षा
या फिर प्रकृति की
अवहेलना !
छीजती देह -
समय संग -
करती कदमताल ,
कब होजाती
कंकाल ?
अब  सभी एक से !
न रूप न रंग
समय के पारदर्शी
रंग में रंगे।
देख कुछ कंकालों को
सुधियाँ करने लगीं
अट्टहास -----
सदियां कौंध गयी
 मन में----
बोल  !शब्द  ! सब
खामोश -आभा -












Wednesday, 13 June 2018


'' शब्द -शब्द ''

अक्षरों की बूंदाबांदी
उजलापन शब्दों का
झरा वाक्यों का झरना
जो हम हैं
वही तो झरेंगे
मन आसमान !
तो
शब्दों का झरना ,
रंग बिखेरेगा
" इंद्रधनुषी "

नदी भावों की
बन बहेगा
कलकल छलछल
छू जिसे शीतल मलय
झंकृत कर प्राण
आलिंगन कर अंबर का
बन शीतल फुहारें
सृजेगा हरियाली
"शब्दों के ओले "
गंदला बरसाती दरिया
वेग से उमड़ा ,
बह चला,दिशा हीन
तोड़ता तट-बंध
लट्ठों -पत्थरों संग
कठोर !शब्दों का वेग
सब बहाने को आतुर
दूरी बढ़ाता किनारों की
तोड़ दे दृढ सेतु को भी
एक उजाड़े दहशत दे
एक मन प्रांगण
अंतर भिगो
पुलकावलि भरे
हरियाली दे आनंद दे
अक्षरों की बूंदा-बांदी
मेघ नभ सी चंचल
शब्द हमें चुनने हैं
वाक्य हमें बनाने हैं
बनाएंगे तो वही न
जो अंतर में होगा
मन के जंगल को
उपवन बनाना ?
दुरूह होता है स्वयं को पाना।।आभा।।